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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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भगवान श्रीरामचन्द्रजी की माता ने पुत्र वधू सहित अपने इकलौते पुत्र को वन जाने की अनुमति दे दी थी। सुमित्रा ने दृढ़तापूर्वक घर में पुत्रवधू रहते हुए भी लक्ष्मण को आग्रहपूर्वक श्रीरामचन्द्र जी के साथ वन में भेज दिया था। मदालसा ने अपने सभी पुत्रों को संन्यास धर्म की दीक्षा दी थी। तुम क्या उन माताओं से कुछ कम हो? जननि! तुम्हारें चरणों में मेरा कोटि-कोटि प्रणाम है। तुम मेरे काम में पुत्रस्नेह के कारण बाधा मत पहुँचाओ! मुझे प्रसन्नतापूर्वक संन्यास ग्रहण करने की अनुमति दो और ऐसा आशीर्वाद दो कि मैं अपने इस व्रत को भलीभाँति निभा सकूँ।’
माता ने आंसुओं को पोंछते हुए कहा- ‘बेटा! मैंने आज तक तेरे किसी भी काम में हस्तक्षेप नहीं किया। तू जिस काम में प्रसन्न रहा, उसी में मैं यदा प्रसन्न बनी रही। मैं चाहे भूखी बैठी रही, किंतु तुझे हजार जगह से लाकर तेरी रुचि के अनुसार सुन्दर भोजन कराया। मैं तेरी इच्छा के विरुद्ध कोई काम नहीं कर सकती। किंतु घर में रहकर क्या भगवद्भजन नहीं हो सकता? यहीं पर श्रीवास, गदाधर, मुकुन्द, अद्वैताचार्य- इन सभी भक्तों को लेकर दिन-रात्रि भजन-कीर्तन करता रह। मैं तुझे कभी भी न रोकूँगी। बेटा! तू सोच तो सही, इस अबोध बालिका विष्णुप्रिया की क्या दशा होगी? इसने तो अभी संसार का कुछ भी सुख नहीं देखा। तेरे बिना यह कैसे रह सकेगी? मेरा तो विधान ने वज्र का हृदय बनाया है। विश्वरुप के जाने पर भी यह नहीं फटा और तेरे पिता के परलोक-गमन करने पर भी यह ज्यों-का-त्यों ही बना रहा।मालूम पड़ता है, तेरे चले जानेपर भी इसके टुकडे़-टुकडे़ नहीं होंगे। रोज सुनती हूँ, अमुक मर गया, अमुक चल बसा। न जाने मेरी आयु विधाता ने कितनी बड़ी बना दी है, जो अभी तक वह सुध ही नहीं लेता। विष्णुप्रिया के आगे के लिए कोई आधार हो जाय और मैं मर जाऊँ, तब तू खुशी से संन्यास ले लेना। मेरे रहते हुए और उस बालिका को जीवित रहने पर भी विधवा बनाकर तेरा घर में जाना ठीक नहीं। मैं तेरी माता हूँ। मेरे दु:ख की ओर थोड़ा भी तो खयाल कर! तू जगत के उद्धार के लिये काम करता है। क्या मैं जगत में नहीं हूँ? मुझे जगत से बाहर समझकर मेरी उपेक्षा क्यों कर रहा है? मुझ दु्:खिनी को तू इस तरह विलखती हुई छोड़ जायगा तो तुझे माता को दु:खी करने का पाप लगेगा।’
प्रभु ने धैर्य के साथ कहा- ‘माता! तुम इतनी अधीर मत हो। भाग्य को मेटने की सामर्थ्य मुझ में नहीं है। विधाता ने मेरा-तुम्हारा संयोग इतने ही दिन का लिखा था। अब आगे लाख प्रयत्न करने पर भी मैं नहीं रह सकता। भगवान वासुदेव सबकी रक्षा करते हैं। उनका नाम विश्वम्भर है। जगत के भरण-पोषण का भार उन्हीं पर है। तुम हृदय से इस अज्ञानजन्य मोह को निकाल डालो और मुझे प्रेमपूर्वक हृदय से यति-धर्म ग्रहण करने की अनुमति प्रदान करो।’
रोते-रोते माता ने कहा- ‘बेटा! मैं बालकपन से ही तेरे स्वभाव को जानती हूँ। तू जिस बात को ठीक समझता है, उसे ही करता है। फिर चाहे उसके विरुद्ध साक्षात ब्रह्मा भी आकर तुझे समझावें तो भी तू उससे विचलित नहीं होता। अच्छी बात है, जिसमें तुझे प्रसन्नता हो, वही कर। तेरी प्रसन्नता में ही मुझे प्रसन्नता हैं। कहीं भी रह, सुखपूर्वक रह। चाहे गृहस्थी बनकर रह या यति बनकर। मैं तो तुझे कभी भुला ही नहीं सकती। भगवान तेरा कल्याण करें। किंतु तुझे जाना हो तो मुझसे बिना ही कहे मत जाना। मुझे पहले से सूचना दे देना।
महाप्रभु ने इस प्रकार माता से अनुमति लेकर उसकी चरणवन्दना की और उसे आश्वासन देते हुए कहने लगे- ‘माता! तुमसे मैं ऐसी ही आशा करता था, तुमने योग्य माता के अनुकूल ही बर्ताव किया है। मैं इस बात का तुम्हें विश्वास दिलाता हूँ कि तुमसे बिना कहे नहीं जाऊँगा। जिस दिन जाना होगा, उससे पहले ही तुम्हें सूचित कर दूँगा।’ इस प्रकार प्रभु ने माता को तो समझा-बुझाकर उससे आज्ञा ले ली। विष्णुप्रिया को समझाना थोड़ा कठिन था। वह अब तक अपने पितृगृह में थीं, इसलिये उनके सामने यह प्रश्न उठा ही नहीं था। प्रभु के संन्यास ग्रहण करने की बात सम्पूर्ण नवद्वीप नगर में फैल गयी थी। विष्णुप्रिया ने भी अपने पिता के घर में ही यह बात सुनी। उसी समय वह अपने पिता के घर से पतिदेव के यहाँ आ गयीं।
विष्णुप्रिया और गौरहरि…..
पितृगृह से जिस दिन विष्णुप्रिया पतिगृह में आयी थीं, उस दिन प्रभु भक्तों के साथ कुछ देर में गंगाजी से लौटे थे। आते ही भक्तों के सहित प्रभु ने भोजन किया। भोजन के अनन्तर सभी भक्त अपने-अपने स्थानों को चले गये। प्रभु भी अपने शयनगृह में जाकर शय्यापर लेट गये। इधर विष्णुप्रिया का हृदय धक्-धक् कर रहा था। उनके हृदय-सागर में मानो चिन्ता और शोक का बवण्डर-सा उठ रहा था। एक के बाद एक विचार आते और उनकी स्मृतिमात्र से विष्णुप्रिया कांपने लगतीं। ऐसी दशा में भूख-प्यास का क्या काम? मानो भूख-प्यास तो शोक और चिन्ता के भय से अपना स्थान परित्याग करके भाग गयी थीं। प्रात:काल से उन्होंने कुछ भी नहीं खाया था। पति के निकट बिना कुछ प्रसाद पाये जाना अनुचित समझकर उन्होंने प्रभु के उच्छिष्ट पात्रों में से दो-चार ग्रास अनिच्छापूर्वक माता के आग्रह से खा लिये। उनके मुख में अन्न भीतर जाता ही नहीं था। जैसे-तैसे कुछ खा-पीकर वे धीरे-धीरे पतिदेव की शय्या के समीप पहुँचीं। उस समय प्रभु को कुछ निन्द्रा-सी आ गयी थी। दुग्ध के स्वच्छ और सुन्दर झागों के समान सुकोमल गद्दे के ऊपर बहुत ही सफेद वस्त्र बिछा हुआ था। दो झालरदार स्वच्छ सफेद कोमल तकिये प्रभु के सिराहने रखे हुए थे। एक बाँह तकिये के ऊपर रखी थी। उस पर प्रभु का सिर रखा हुआ था। कमल के समान दोनों बड़े-बड़े़ नेत्र मुँदे हुए थे। उनके मुख के ऊपर घुंघराली काली-काली लटें छिटक रही थीं। मानो मकरन्द के लालची मत्त मधुपों की काली-काली पंक्तियाँ एक-दूसरे का आश्रय लेकर उस अनुपम मुख-कमल की मन-मोहक मधुरिमा का प्रेमपूर्वक पान कर रही हों।
क्रमशः
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