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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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अर्धनिद्रित समय के प्रभु के श्रीमुख की शोभा को देखकर विष्णुप्रिया ठिठक गयीं। थोड़ी देर खड़ी होकर वे उस अनिर्वचनीय अनुपम आनन की अद्भुत आभा को निहारती रहीं। उनकी अधीरता अधिकाधिक बढ़ती ही जाती थी। धीरे से वे प्रभु के पैरों के समीप बैठ गयीं और अपने कोमल करों से शनै:-शनै: प्रभु के पाद-पद्मों के तलवों को सुहारने लगीं। उन चरणों की कोमलता, अरुणता और सुकुमारता को देखकर विष्णुप्रिया का हृदय फटने लगा। वे सोचने लगीं- ‘हाय! प्राणप्यारे इन सुकोमल चरणों से कण्टकाकीर्ण पृथ्वी पर नंगे पैरों कैसे भ्रमण कर सकेंगे? तपाये हुए सुवर्ण के रंग के समान यह राजकुमार का –सा सुकुमार शरीर संन्यास के कठोर नियमों का पालन कैसे कर सकेगा? इन विचारों के आते ही विष्णुप्रिया जी के नेत्रों से मोतियों के समान अश्रुबिन्दु झड़ने लगे।
चरणों में गर्म बिन्दुओं के स्पर्श होने से प्रभु चौंक उठे और तकिये से थोड़ा सिर उठाकर उन्होंने अपने पैरों की ओर निहारा। सामने विष्णुप्रिया को देखकर प्रभु थोडे़ उठ-से पड़े। आधे लेटे-ही-लेटे प्रभु ने कहा- ‘तुम रो क्यों रही हो? इतनी अधीर क्यों बनी हुई हो? तुम्हें यह हो क्या गया है?’
रोते-रोते अत्यन्त क्षीण स्वर में सुबकियाँ भरते हुए विष्णुप्रिया जी ने कहा- ‘अपने भाग्य को रो रही हूँ कि विधाता ने मुझे इतनी सौभाग्यशालिनी क्यों बनाया?’
प्रभु ने कुछ प्रेमविस्मित अधीरता-सी प्रकट करते हुए कहा-‘बात तो बताती नहीं, वैसे ही सुबकियाँ भर रही हो। मालूम भी तो होना चाहिए क्या बात है?’ उसी प्रकार रोते-रोते विष्णुप्रिया जी बोलीं- ‘मैंने सुना है आप घर-बार छोड़कर संन्यासी होंगे, हम सबको छोड़कर चले जायँगे?’
प्रभु ने हंसते हुए कहा- ‘तुमसे यह बे-सिर-पैर की बात कही किसने?’ विष्णुप्रिया जी ने अपनी बात पर कुछ जोर देते हुए और अपना स्नेह-अधिकार जताते हुए कहा- ‘किसी ने भी क्यों न कही हो।
आप बतलाइये क्या यह बात ठीक नहीं है?’
प्रभु ने मुसकराते हुए कहा-‘हाँ, कुछ-कुछ ठीक है?’
विष्णुप्रिया जी पर मानो वज्र गिर पड़ा, वे अधीर होकर प्रभु के चरणों में गिर पड़ी और फूट-फूटकर रोने लगीं। प्रभु ने उन्हें प्रेमपूर्वक हाथ का सहारा देते हुए उठाया और प्रेमपूर्वक आलिंगन करते हुए वे बोले- ‘तभी तो मैं तुमसे कोई बात नहीं। तुम एकदम अधीर हो जाती हो।’
हाय! उस समय की विष्णुप्रिया जी की मनोवेदना का अनुभव कौन कर सकता है? उनके दोनों नेत्रों से निरन्तर अश्रु प्रवाहित हो रहे थे, उसी वेदना के आवेश में रोते-राते उन्होंने कहा- ‘प्राणनाथ! मुझ दुखिया को सर्वथा निराश्रय बनाकर आाप क्या सचमुच चले जायँगे? क्या इस भाग्यहीना अबाला को अनाथिनी ही बना जायँगे? हाय! मुझे अपने सौभाग्यसुख का बड़ा भारी गर्व था। ऐसे त्रैलोक्य-सुन्दर जगद् वन्द्य अपने प्राण प्यारे पति को पाकर मैं अपने को सर्वश्रेष्ठ सौभाग्यशालिनी समझती थी। जिसके रूप-लावण्य को देखकर स्वर्ग की अप्सराएँ भी मुझसे ईर्ष्या करती थीं। नवद्वीप नारियाँ जिस मेरे सौभाग्य-सुख की सदा भूरि-भूरि प्रशंसा किया करती थीं, वे ही कालांतर में मुझे भाग्यहीन-सी द्वार-द्वार भटकते देखकर मेरी दशा पर दया प्रकट खेवेगा? पति ही स्त्रियों का एकमात्र आश्रय-स्थान है, पति के बिना स्त्रियों को और दूसरी गति हो ही क्या सकती है? प्रभु ने विष्णुप्रिया जी को समझाते हुए कहा- ‘देखो, संसार में सभी जीव प्रारब्धकर्मों के अधीन हैं। जितने दिन तक जिसका जिसके साथ संस्कार होता है, वह उतने ही दिन तक उसके साथ रह सकता है। सबके आश्रयदाता तो वे ही श्रीहरि है। तुम श्रीकृष्ण का सदा चिंतन करती रहोगी तो तुम्हें मेरे जाने का तनिक भी दु:ख न होगा।‘
रोते-रोते विष्णुप्रियाजी ने कहा- ‘देव! आपके अतिरिक्त कोई दूसरे श्रीकृष्ण हैं, इसे मैं आज तक जानती ही नहीं और न आगे जानने की ही इच्छा है। मेरे तो ईश्वर, हरि और परमात्मा जो भी कुछ हैं, आप ही हैं। आपके श्रीचरणों के चिंतन के अतिरिक्त दूसरा चिंतनीय पदार्थ मेरी दृष्टि में है ही नहीं। मैं आपकी चरण-सेवा में ही अपना जीवन बिताना चाहती हूँ और मुझे किसी प्रकार के संसारी सुख की इच्छा नहीं है।'
प्रभु ने कुछ अधीरता प्रकट करते हुए कहा- ‘प्रिये! मैं सदा से तुम्हारा हूँ और सदा तुम्हारा रहूँगा। तुम्हारा यह नि:स्वार्थ प्रेम कभी भुलाया जा सकता है? कौन ऐसा भाग्यहीन होगा जो तुम-जैसी सर्वगुण सम्पन्ना जीवन की सहचरी का परित्याग करने की मन में इच्छा भी करेगा, किंतु विष्णुप्रिये! मैं सत्य-सत्य कहता हूँ, मेरा मन अब मेरे वश में नहीं है। जीवों का दु:ख अब मुझसे देखा नहीं जा सकता। मैं संसारी होकर और घर में रहकर जीवों का उतना अधिक कल्याण नहीं कर सकता। जीवों के लिये मुझे शरीर से तुम्हारा त्याग करना ही होगा। मन से तो तुम्हारा प्रेम कभी भुलाया नहीं जा सकता। तुम निरंतर विष्णुचिंतन करती हुई अपने नाम को सार्थक बनाओ और अपने जीवन को सफल करो।’
बहुत ही अधीर स्वर में विष्णुप्रिया जी ने कहा- ‘मेरे देवता! यदि जीवों के कल्याण में मैं ही बाधकरूप हूँ तो मैं आपके श्री चरणों का स्पर्श करके कहती हूँ कि मैं सदा अपने पितृगृह में ही रहा करूंगी। जब कभी आप गंगास्नान को जाया करेंगे, तो कहीं से छिपकर दर्शन कर लिया करूँगी। माता को तो कम-से-कम आधार रहेगा। खैर, मैं तो अपने हृदय को वज्र बनाकर इस पहाड़-जैसे दु:ख को सहन भी कर लूँ, किंतु उन वृद्धा माता की क्या दशा होगी? उनके तो आगे-पीछे कोई नहीं है। उनका जीवन तो एकमात्र आपके ही ऊपर निर्भर है। वे आपके बिना जीवित न रह सकेंगी। निश्चय ही वे आत्मघात करके अपने प्राणों को गवाँ देंगी।’
प्रभु ने कुछ रूंधे हुए कण्ठ से रुक-रूककर कहा- ‘सबके आगे-पीछे वे ही श्रीहरि हैं। उनके सिवाय प्राणियों का दूसरा आश्रय हो ही नहीं सकता। प्राणिमात्र के आश्रय वे ही हैं। उनके स्मरण से सभी का कल्याण होगा। प्रिये! मैं विवश हूँ, मुझे नवद्वीप को परित्याग करके अन्यत्र जाना ही होगा। संन्यास के सिवाय मुझे दूसरे किसी काम में सुख नहीं। तुम सदा से मुझे सुखी बनाने की ही चेष्टा करती रही हो। तुमने मेरी प्रसन्नता के निमित्त अपने सभी सुखों का परित्याग किया है।
क्रमशः
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