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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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जिस बात में मैं प्रसन्‍न रह सकूँ, तुम सदा ऐसा ही आचरण करती रही हो।अब तुम मुझे दु:खी बनाना क्‍यों चाहती हो? यदि तुम मुझे जबरदस्‍ती यहाँ रहने का आग्रह करोगी तो मुझे सुख न मिल सकेगा। रही माता की बात, सो उनसे तो मैं अनुमति ले भी चुका और उन्‍होंने मुझे संन्‍यास के निमित्त आज्ञा दे भी दी। अब तुमसे ही अनुमति लेनी और शेष रही है। मुझे पूर्ण आशा है, तुम भी मेरे इस शुभ काम में बाधा उपस्थित न करके प्रसन्‍नतापूर्वक अनुमति दे दोगी।’   कठोर हृदय करके और अपने दु:ख के आवेग को बलपूर्वक रोकते हुए विष्‍णुप्रिया ने कहा- ‘यदि माता ने आपको संन्‍यास की आज्ञा दे दी है, तो मैं आपके काम में रोड़ा न अटकाऊंगी। आपकी प्रसन्‍नता में ही मेरी प्रसन्‍नता है। आप जिस दशा में भी रहकर प्रसन्‍न हों वही मुझे स्‍वीकार है, किंतु प्राणेश्‍वर! मुझे हृदय से न भुलाइयेगा। आपके श्रीचरणों का निरंतर ध्‍यान बना रहे ऐसा आशीर्वाद मुझे और देते जाइयेगा। प्रसन्‍नतापूर्वक तो कैसे कहूं, किंतु आपकी प्रसन्‍नता के सम्‍मुख मुझे सब कुछ स्‍वीकार है। आप समर्थ है, मेरे स्‍वामी हैं, स्‍वतंत्र हैं और पतितों के उद्धारक हैं। मैं तो आपके चरणों की दासी हूँ। स्‍वामी के सुख के निमित्त दासी सब कुछ स‍हन कर सकती है। किंतु मेरा स्‍मरण बना रहे, यही प्रार्थना है।’

प्रभु ने प्रिया जी को प्रेमपूर्वक आलिंगन करते हुए कहा- ‘धन्‍य है, तुमने एक वीरपत्‍नी के समान ही यह बात कही है। इतना साहस तुम-जैसी पतिपरायणा सती-साध्‍वी स्त्रियाँ ही कर सकती हैं। तुम सदा मेरे हृदय में बनी रहोगी और अभी मैं जाता थोड़े ही हूँ। जब जाना होगा तब बताऊँगा।’ इस प्रकार प्रेम की बातें करते-करते ही वह सम्‍पूर्ण रात्रि बीत गयी। प्रात:काल प्रभु उठकर नित्‍य-कर्म के चले गये।

परम सहृदय निमाई की निर्दयता….

पता नहीं, भगवान ने विषमता में ही महानता छिपा रखी है क्या? ‘महतो महीयान्’ भगवान ‘अणोरणीयान्’ भी कहे जाते हैं। निराकर होने पर भी प्रभु साकार-से दीखते हैं। अ‍कर्ता होते हुए भी सम्पुर्ण विश्‍व की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय के एकमात्र कारण वे ही कहे जाते हैं। अजन्मा होने पर भी उनके शास्त्रों में जन्म कहे और सुने जाते हैं। इस प्रकार की विषमता में ही तो कहीं ईश्‍वरता छिपी हुई नहीं रहती। महापुरुषों के जीवन में भी सदा ऐसी ही विषमता देखने में आती हैं। मर्यादापुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के सम्पूर्ण चरित्र का पढ़ जाइये, उसमें स्थान-स्थान पर भारी विषमता ही भरी हुई मिलेगी।

श्रीमद्रामायण में विषमता का भारी भण्‍डार ही हैं अत्यन्त सुकुमार होने पर भी राम भंयकर राक्षसों का बात-की-बात में वध कर डालते हैं। तपस्वी होते हुए भी धनुष-बाण को हाथ से नहीं छोड़ते। मैत्री करने पर भी सुग्रीव को भय दिखाते हैं। सम्पूर्ण जीवन ही उनका विषमतामय है। जो राम अपनी माताओं को प्राणों से भी प्यारे थे, जो पिता की आज्ञा को कभी नहीं टालते थे, जिनका कोमल हृदय किसी को दु:खी देख ही नहीं सकता था, वे ही वन जाते समय इतने कठोर हो गये कि उन पर माता के वाक्य-बाणों का, उनके अविरत बहते हूए अश्रुओं का, पिता की दीनता से ही हुई प्रार्थना का, विलखते हुए नगरवासियों के करूण-क्रन्दन का, तपस्वी और ॠत्विज वृद्ध ब्राह्मणों के हंस के समान श्‍वेत बालों वाली दुहाई का, राजकर्मचारी और भगवान वसिष्ठ की भाँति-भाँति की नगर में रहने वाली युक्तियों का तनिक भी असर नहीं पड़ा। वे सभी को रोते-विलखते छोड़कर, सभी को शोकसागर में डुबाकर अपने हृदय को वज्र से भी अधिक कठोर बनाकर वन के लिये चले ही गये। इससे उनकी कठोरता का परिचय मिलता है।

सीतामाता के हरण के समय के उनके क्रोध को पढ़कर कलेजा काँपने लगता है, मानो वे अपनी प्राणप्यारी प्रिया के पीछे सम्पुर्ण विश्‍व-ब्रह्माण्‍ड को बात-की-बात में अपने अमोघ बाणों से नष्‍ट ही कर डालेंगे। स्फटि‍क-शिला पर बैठकर अपनी प्रिया के लिये वे कितने अधीरता को सुनकर पाषाण भी पिघल गये थे। लंका पर चढ़ाई के पूर्व, हनुमान के आने पर सीता जी के लिये वे कितने व्याकुल-से दिखायी पड़ते थे! उनकी छोटी-छोटी बातों को स्मरण करके रोते रहते थे। उस समय कौन नहीं समझता था कि सीता को पाते ही ये एकदम उन्हें गले से लगाकर खूब रुदन न करेंगे और उन्हें प्रेमपूर्वक अपने अंक में न बिठा लेंगे। किंतु रावण के वध के अनन्तर उनका रंग ही पलट गया।सीता के सामने आने पर उन्होंने जैसी कठोर, कड़ी और अकथनीय बातें कह डालीं, उन्हें सुनकर कौन उन्हें सहृइय और प्रेमी कह सकता है? यथार्थ में देखा जाय तो यही उनकी महत्ता का द्योतक है? जिसे हम प्राणों से भी अधिक प्यार करते हैं यदि उसके परित्याग करने का समय दैवात आकर उपस्थित हो जाय, तो बात-की-बात में हंसते हुए उसे त्याग देना इसी का नाम तो यथार्थ प्रेम है। जो दृढ़ता के साथ ‘स्वीकार’ करने की सामर्थ्‍य रखता है उसमें त्याग की भी उतनी ही अधिक शक्ति होनी चाहिये।

भक्तों के साथ महाप्रभु का ऐसा अपूर्व प्रेम देखकर कोई स्वप्न में भी इस बात का अनुमान नहीं कर सकता था कि ये एक दिन इन सबको त्यागकर भी चले जांयगे। वे भक्तों से हृदय खोलकर मिलते। भक्तों के प्राणों के साथ अपने प्राणों को मिला देते। उनके आलिंगन में, नृत्य में, नगर-भ्रमण में, ऐश्‍वर्य में, भक्तों के साथ भोजन में, सर्वत्र ओत-प्रोत भाव से प्रेम-ही-प्रेम भरा रहता।

विष्‍णुप्रिया जी समझती थी, पतिदेव मुझसे ही अत्यधिक स्नेह करते हैं, वे मेरे प्रेमपाश में दृढ़ता से बंधे हुए हैं। माता समझती थीं, निमाई मुझे छोड़कर कहीं जा ही नहीं सकता। उसे मेरे बिना एक दिन भी तो कहीं रहना अच्छा नहीं लगता। दूसरे के हाथ से भोजन करने में उसका पेट ही नहीं भरता! जब तक मेरे हाथ से कुछ नहीं खा लेता तब तक उसकी तृप्ति ही नहीं होती। इस प्रकार सभी प्रभु को अपने प्रेम की रज्जु में दृढ़ता के साथ बँधा हुआ समझते थे। किंतु वे महापुरुष थे। उनके लिये यह सब लीला थी। उनका कौन प्रिय और कौन अप्रिय? वे तो चराचर विश्‍व में अपने प्यारे प्रेम का ही दर्शन करते थे।
क्रमशः

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