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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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प्रेम ही उनका आराध्‍यदेव था। प्राणियों की श‍कल-सूरत से उनका अनुराग नहीं था, वे तो प्रेम के पुजारी थे! पुजारी क्या थे, प्रेम-स्वरूप ही थे। उन्होंने एकदम संन्यास लेने का निश्‍चय कर लिया। सभी को अपनी-अपनी भूल का अनुभव होने लगा। उस पर हमारे ही समान सभी प्राणियों का समानभाव से अधिकार है, सभी उसके द्वारा प्रेमपीपूष पाकर प्रसन्न हो सकते हैं।

महाप्रभु के संन्यास लेने का समाचार सम्पूर्ण नवद्वीप नगर में फैल गया। बहुत-से लोग प्रभु के दर्शनों के लिये आने लगे। महाप्रभु अब भक्तों के सहित संकीर्तन में सम्मिलित नहीं होते थे। भक्तगण स्वयं ही मिलकर संकीर्तन करते और प्रात:-सायं प्रभु के दर्शनों के लिये उनके घर पर आया करते थे।जिस दिन महामहिम श्रीस्वामी केशव भारती प्रभु के घर आये थे, उसी दिन प्रभु ने संन्यास लेने की तिथि निश्चित कर ली थी। उस समय सूर्य दक्षिणायन थे। दक्षिणायन-सूर्य में शुभ संस्कार और इस प्रकार के वैदिक कृत्य और अनुष्‍ठान नहीं किये जाते, इसलिये प्रभु उत्तरायण-सूर्य होने की प्रतीक्षा करने लगे। समय बीतते कुछ देर नहीं लगती। धीरे-धीरे भक्तों को तथा प्रभु के सम्बन्धियों को शोक-सागर में डूबा देने वाला वह समय सन्निकट आ पहुँचा। प्रभु ने नित्यानन्द जी को गृह-परित्याग करने वाली तिथि की सूचना दे दी और उनसे आग्रहपूर्वक कह दिया- ‘हमारी माता, हमारे मौसा चन्द्रशेखर आचार्य, गदाधर, मुकुन्द और ब्रह्मानन्द- इन पांचों को छोड़कर आप और किसी को भी इस बात को न बतावें।’ नित्यानन्द जी तो इनके स्वरूप ही थे। उन्होंने इनकी आज्ञा शिरोधार्य की और दु:खी होकर उस भाग्यहीन दिन की प्रतीक्षा करने लगे।

महाप्रभु के लिये आज का दिन नवद्वीप में अन्तिम दिन है। कल अब गौरहरि न तो निमाई पण्डित रहेंगे और न शचीपुत्र। वे अकीली विष्‍णुप्रिया के पति न रहकर प्राणिमात्र के प्रिय हो जायेंगे। कल वे भक्तों के ही वन्दनीय न होकर जगद्वन्दनीय बन जायंगे। किसी को क्या पता था कि अब नवद्वीप नदियानागर से शून्य बन जायगा। प्रात:काल हुआ, प्रभु नित्यकर्म से निवृत्त होकर भक्तों के साथ श्रीवास पण्डित के घर चले गये। वहाँ सभी भक्त आकर एकत्रित हुए। सभी ने प्रभु के साथ मिलकर संकीर्तन किया। फिर भक्तों को साथ लेकर प्रभु गंगा-किनारे चले गये और वहाँ देर तक श्रीकृष्‍ण-कथा का रसास्वादन करते रहे। अनन्तर सभी भक्तों के समूह के सहित अपने घर पर आये। न जाने उस दिन सभी के हृदयों में कैसी एक अपूर्व-सी प्रेरणा हुई कि उस रात्रि में प्रभु के प्राय: सभी अन्तरंग भक्त आकर एकत्रित हो गये। खोल बेचने वाले श्रीधर कहीं से थोड़ा चिउरा लेकर आये और बड़े ही प्रेम से आकर प्रभु के चरणों में उसे भेंट किया। अपने अकिंचन भक्त का अन्तिम समय में ऐसा अपूर्व उपहार पाकर प्रभु परम प्रसन्न हुए और हंसते हुए कहने लगे- ‘श्रीधर! ये ऐसे सुन्दर चिउरा तुम कहाँ से ले आये?’ इतना कहकर प्रभु ने उन्हें माता को दिया। उसी समय एक भक्त बहुत-सा दूध ले आया।

प्रभु दूध को देखते ही खिलखिलाकर हंस पड़े और प्रसन्नता प्र‍कट करते हुए कहने लगे- ‘श्रीधर! तुम बड़े शुभ मूहुर्त में चिउरा लेकर चले थे, लो दूध भी आ गया।’ यह कहकर प्रभु ने माता को चिउरा की खीर बनाने को कहा। माता ने जल्दी से भोजन बनाया, प्रभु ने भक्तों के स‍हित महाभागवत श्रीधर के लाये हुए चिउरे की खीर खायी। वही उनका नवद्वीप में शचीमाता के हाथ का अन्तिम भोजन था। भोजन के अनन्तर सभी भ‍क्त अपने-अपने घरों को चले गये। महाप्रभु जी भी अपने शयन-गृह में जाकर लेट गये।
वियोगजन्य दु:ख की आशंका से भयभीता हिरणों की भाँति डरते-डरते विष्‍णुप्रिया ने प्रभु के शयन-गृह में प्रवेश किया। उनकी आँखों में से निरन्तर अश्रु बह रहे थे।
प्रभु ने हंसते हुए कहा- ‘प्रिये! मैं तुम्हारे हंसते हुए मुख-कमल को एक बार देखना चाहता हूँ। तुम एक बार प्रसन्न होकर मेरी ओर देखो।’
विष्‍णुप्रिया जी चुप ही रहीं, उन्होंने प्रभु की बात का कुछ भी उत्तर नहीं दिया। तब प्रभु आग्रह के स्वर में कहने लगे- ‘विष्‍णुप्रिया! तुम बोलती क्यों नहीं, क्या सोच रही हो?’

आँसू पोछते हुए विष्‍णुप्रिया ने कहा- ‘प्रभो! न जाने क्यों आज मेरा दिल धड़क रहा है। मेरा हृदय आप-से-आप ही फटा-सा जाता है। पता नहीं क्या बात है?’
प्रभु ने बात को टालते हुए कहा- ‘तुम सदा सोच करती रहती हो, उसी का यह परिणाम है। अच्छा, तुम हँस दो, देखो अभी तुम्हारा सभी शोक-मोह दूर होता है या नहीं?’
विष्‍णुप्रिया जी ने प्रेमपूर्ण कुछ रोष के स्वर में कहा- ‘रहने भी दो! तुम तो ऐसे ही मुझे बनाया करते हो। ऐसे समय में तो तुम्हें ही हँसी आ सकती है। मेरा तो हृदय रुदन कर रहा है। फिर कैसे हँसूँ? हँसी तो भीतर की प्रसन्नता से आती है।’

विष्‍णुप्रिया जी को पता चल गया कि अवश्‍य ही पतिदेव आज ही मुझे अनाथिनी बनाकर गृह-त्याग करेंगे, किंतु उन्होंने प्रभु के सम्मुख इस बात को प्र‍कट नहीं किया। वे रात्रि भर प्रभु के चरणों को दबाती रहीं। प्रभु ने भी आज उन्हें बड़े प्रेम के साथ अनेकों बार गाढ़लिंगन कर-कर के परम सुखी बना दिया। किंतु विष्‍णुप्रिया को पति के आज के इन आलिंगनों में विशेष सुख का अनुभव नहीं हुआ। जिस प्रकार शूली पर चढ़ने वाले को उस समय भाँति-भाँति की स्वादिष्‍ट मिठाइयाँ रुचिकर प्रतीत नहीं होतीं, उसी प्रकार विष्‍णुप्रिया को वह पति का इतना अधिक स्नेह और अधिक पीड़ा पहुँचाने लगा।
माता को तो पहले से ही पता था कि निमाई आज घर छोड़कर चला जायगा, वे दरवाजे की चौखट पर पड़ी हुई रात्रिभर आह भरती रहीं। विष्‍णुप्रिया भी प्रभु के पैरों को पकडे़ रात्रि भर ज्यों-की-त्यों बैठी रहीं।

माघ का महीना था, शुक्लपक्ष का चन्द्रमा अस्त हो चुका था। दो घड़ी रजनी शेष थी। सम्पूर्ण नगर के नर-नारी सुख की निद्रा में सोये हुए थे; किंतु महाप्रभु को नींद कहाँ, वे तो संन्यास की उमंग में भूख-प्यास, सुख-निद्रा आदि को एकदम भुलाये हुए थे। विष्‍णुप्रिया उनके पैरों को पकडे़ बैठी हुई थीं। प्रभु उनसे छूटकर भाग निकलने का सुअवसर ढूढ़ रहे थे।
क्रमशः

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