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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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भावी बड़ी प्रबल है, जो होनहार होता है, वैसे ही उसके लिये साधन भी जुट जाते हैं, रात्रि भर की जागी हुई विष्‍णुप्रिया को नींद आ गयी। वह प्रभु की शय्यापर ही उनके चरणों में पड़कर सो गयीं। रात्रि भर की जागी हुई थीं, इसलिये पड़ते ही गाढ़ निद्रा ने आकर उनके ऊपर अपना अधिकार जमा लिया।

प्रभु ने इसे ही बड़ा अच्छा सुअवसर समझा। बहुत ही धीरे से प्रभु ने अपने चरणों को विष्‍णुप्रिया जी की गोद में से उठाया। पैर के उठाते ही विष्‍णुप्रिया जी कुछ हिलीं। उसी समय प्रभु ने दूसरे पैर को ज्यों-का-त्यों ही उनकी छाती पर रखा रहने दियां थोड़ी देर में फिर धीरे-धीरे दूसरे भी पैर को उठाया। अब के विष्‍णुप्रिया जी को कुछ भी पता नहीं चला। प्रभु बहुत ही धीरे से शय्या पर से नीचे उतरे। पास में खूंटी पर टंगे हुए अपने वस्त्र पहने और एक बार फिर अपनी प्राणप्यारी की ओर दृष्टिपात किया। सामने एक क्षीण ज्योति का दीपक टिमटिमा रहा था। मानो वह भी प्रभु के वियोगजन्य दु:ख के कारण दु:खी होकर रो रहा है। दीपक मन्द-मन्द प्रकाश विष्‍णुप्रिया जी के मुख पर पड़ रहा था, इससे उनके मुख की कान्ति और भी अधिक शोभायमान हो रही थी। प्रभु इस प्रकार गाढ़ निद्रा में पड़ी हुई अपनी प्राणप्यारी के चन्द्रमा के समान खिले हुए मुख को देखकर एक बार कुछ झिझके।

वे सोचने लगे- ‘मैं इस अबोध बालिका के ऊपर यह कैसा अनर्थ कर रहा हूँ। इसे बिना सूचित किये हुए इसकी बेहोशी में मैं इसे सदा के लिये त्याग रहा हूँ। यह मेरा काम बड़ा ही कठोर और निन्दनीय है।’ फिर अपने को सावधान करके वे सोचने लगे- ‘जीवों के कल्याण के निमित्त ऐसी कठोरता मुझे करनी ही पड़ेगी। जब एक ओर से कठोर न बनूँगा तो संसार का कल्याण कैसे होगा? माया में बंधे हुए जीवों को त्याग-वैराग्य का पाठ कैसे पढा़ सकूंगा? लोग मेरे इसी कार्य से तो त्याग-वैराग्य की शिक्षा प्राप्त कर सकेंगें।’

इतना सोचकर वे मन-ही-मन विष्‍णुप्रिया जी को आशीर्वाद देते हुए शयन-घर से बाहर हुए। दरवाजे पर शचीमाता बेहोश-सी पड़ी रुदन कर रही थीं। उनकी आँखों में भला नींद कहाँ? वे तो पुत्र-विछोहरूपी शोक-सागर में डुबकियाँ लगा रहीं थीं। कभी ऊपर उछल आतीं और कभी फिर जल में डुबकियाँ लगाने लगतीं। प्रभु ने बेहोश पड़ी हुई दु:खिनी माता के चरणों में मन-ही-मन प्रणाम किया। धीरे से उनकी चरण-धूलि उठाकर मस्तक पर चढा़यी, फिर उनकी प्रदक्षिणा की और मन-ही-मन प्रार्थना की- ‘हे माता! तुमने मेरे लिये बड़े-बड़े़ कष्‍ट उठाये। मुझे खिला-पिलाकर, पढा़-लिखाकर इतना बड़ा किया। फिर भी मैं तेरी कुछ भी सेवा नहीं कर सका। माता! मैं तुम्हारा जन्म-जन्मान्तरों तक ऋणी रहूँगा, तुम्हारे ऋण से कभी भी मुक्त नहीं हो सकूंगा।’ इतना कहकर वे जल्दी से दरवाजे के बाहर हुए और दौड़कर गंगा-किनारे पहुँचे।
वे ही जाडे़ के दिन थे, जिन दिनों प्रभु के अग्रज विश्‍वरूप घर छोड़कर गये थे वही समय था और वही घाट उस समय नाव कहाँ मिलती। विश्‍वरूप जी ने भी हाथों से तैरकर ही गंगा जी को पार किया था। प्रभु ने भी अपने बड़े भाई के ही पथ का अनुसरण करना निश्‍चय किया। उन्होंने घाट पर खडे़ होकर पीछे फिरकर एक बार नवद्वीप नगरी के अन्तिम दर्शन किये। वे हाथ जोड़कर गद्गदकण्‍ठ से कहने लगे- ‘हे ताराओं से भरी हुई रात्रि! तू मेरे गृह-त्याग की साक्षी है। ओ दसों दिशाओ! तुम मुझे घर से बाहर होता हुआ देख रही हो। हे धर्म! तुम मेरी सभी चेष्‍टाओं को समझने वाले हो। मैं जीवों के कल्याण के निमित्त घर-बार छोड़ रहा हूँ।

हे विश्वब्रह्माण्‍ड के पालनकर्ता! मैं अपनी वृद्धा माता और युवती पत्नी को तुम्हारे ही सहारे पर छोड़ रहा हूँ। तुम्हारा नाम विश्‍वम्भर है। तुम सभी प्राणियों का पालन करते हो और करते रहोगे। इसलिये मैं निश्चित होकर जा रहा हूँ।’ यह कहकर प्रभु ने एक बार नवद्वीप नगरी को और फिर भगवती भागीरथी को प्रणाम किया और जल्दी से गंगा जी के शीतल जल के बहते हुए प्रवाह में कूद पड़े और तैरकर उस पार हुए। उसी प्रकार वे गीले वस्त्रों से ही कटवा (कण्‍टक नगर) केशव भारती के गंगा तट वाले आश्रम पहुँच गये। जिस निर्दय घाटने विश्‍वरूप और विश्‍वभर दोनों भाइयों को पार करके सदा के लिये नवद्वीप के नर-नारियों से पृथक कर दिया, वह आज तक भी नवद्वीप में ‘निर्दय घाट’ के नाम से प्रसिद्ध होकर अपनी लोक-प्रसिद्ध निर्दयता का परिचय दे रहा है।

हाहाकार……

निद्रा में पड़ी हुई विष्‍णुप्रिया जी ने करवट बदलीं। सहसा वे चौक पड़ीं और जल्दी से उठ‍कर बैठ गयीं। मानो उनके ऊपर चौडे़ मैदान में बिजली गिर पड़ी हो, अथवा सोते समय किसी ने उनका सर्वस्व हरण कर लिया हो। वे भूली-सी, पगली-सी, बेसुधि-सी, आँखों को मलती हुई चारों ओर देखने लगीं। उन्हें जागते हुए भी स्वप्नका-सा अनुभव होने लगा। वे अपने हाथों से प्रभु की शय्या को टटोलने लगीं, किंतु अब वहाँ था ही क्या! शुक तो पिंजड़ा परित्याग करके वनवासी बन गया। अपने प्राणनाथ का पंलग पर न पाकर विष्‍णुप्रिया जी ने जोरों के साथ चीत्कार मारी और ‘हा नाथ! हा प्राणप्यारे! मुझ दु:खिनी को इस प्रकार धोखा देकर चले गये।’ यह कहते-कहते जोरों से नीचे गिर पड़ीं और ऊपर से गिरते ही बेसूधि हो गयीं। उनके क्रन्दन की ध्‍वनि शचीमाता के कानों में पड़ी। उनकी उस करुणक्रन्दन से बेहोशी दूर हुई। वहीं पड़े-पड़े उन्होंने कहा- ‘बेटी! बेटी! क्या मैं सचमूच लुट गयी? क्या मेरा इकलौता बेटा मुझे धोखा देकर चला गया? क्या वह मेरी आँखों का तारा निकलकर मुझ विधवा को इस वृद्धावस्‍था में अन्धी बना गया? मेरी आँखों के दो तारे थे। एक के निकल जाने पर सोचती थी, एक आँख से ही काम चला लूंगी। आज तो दूसरा भी निकल गया। अब मुझ अन्धी को संसार सूना-ही-सूना दिखायी पड़ेगा। अब मुझ अन्धी की लाठी कौन पकडे़गा? बेटी! विष्‍णुप्रिया! बोलती क्यों नहीं? क्या निमाई सचमुच चला गया?’ विष्‍णुप्रिया बेहोश थीं, उनके मुख में से आवाज ही नहीं निकलती थी।
क्रमशः

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