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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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वे सास की बातों को न सूनती हुई जोरों से रुदन करने लगीं। दु:खिनी माता उठी और लड़खड़ाती हुई प्रभु के शयन-भवन में पहुँची। वहाँ उसने प्रभु के पलंग को सूना देखा। विष्णुप्रिया नीचे पड़ी हुई रुदन कर रही थीं। माता की अधीरता का ठिकाना नहीं रहा। वे जोरों से रुदन करने लगीं- ‘बेटा निमाई! तू कहाँ चला गया? अरे, अपनी इस बूढ़ी माता को इस तरह धोखा मत दे। बेटा! तू कहाँ छिप गया है, मुझे अपनी सूरत तो दिखा जा। बेटा! तू रोज प्रात:काल मुझे उठकर प्रणाम किया करता था। आज मैं कितनी देर से खड़ी हूँ, उठकर प्रणाम क्यों नहीं करता!’ इतना कहकर माता दीपक को उठाकर घर के चारों ओर देखने लगी। मानो मेरा निमाई यहीं कहीं छिपा बैठा होगा। माता पलंग के नीचे देख रही थीं। बिछौना को बार-बार टटोलतीं, मानो निमाई इसी में छिप गया।
वृद्धा माता के दु:ख के कारण काँपते हुए हाँथों से दीपक नीचे गिर पड़ा और वे भी विष्णुप्रिया के पास ही बेहोश होकर गिर पड़ीं और फिर उठकर चलने को तैयार हुईं और कहती जाती थीं- ‘मैं तो वहीं जाऊंगी जहाँ मेरा निमाई होगा। मैं तो अपने निमाई को ढुंढ़ूगी, वह यदि मिल गया तो उसके साथ रहूंगी, नहीं तो गंगा जी में कूदकर प्राण दे दूंगी।’ यह कहकर वे दरवाजे की ओर जाने लगीं। विष्णुप्रिया जी भी अब होश में आ गयीं और वे भी माता के वस्त्र को पकड़कर जिस प्रकार गौ के पीछे उसकी बछिया चलती है, उसी प्रकार चलने लगीं। वृद्धा माता द्वार पर भी नहीं पहुँचने पायीं कि बीच में ही मूर्च्छित होकर गिर पड़ीं। इतने में ही कुछ भक्त उषा-स्नान करके प्रभु के दशनों के लिये आ गये। द्वार पर माता को बेहोश पड़े देखकर भक्त समझ गये कि महाप्रभु आज जरूर चले गये। इतने में ही नित्यानन्द, गदाधर, मुकुन्द, चन्द्रशेखर आचार्य तथा श्रीवास आदि सभी भक्त वहाँ आ गये। माता को और विष्णुप्रिया को इस प्रकार विलाप करते देखकर भक्त उन्हें भाँति-भाँति से समझा-समझाकर आश्वासन देने लगे।
श्रीवास ने माता से कहा- ‘माता! तुम सोच मत करो। तुम्हारा निमाई तुमसे जरूर मिलेगा। तुम्हारा पुत्र इतना कठोर नहीं है।’ माता संज्ञा शून्य-सी पड़ी हुई थी। नित्यानन्द जी ने माता के अपने हाथ से उठाया। उनके सम्पूर्ण शरीर में लगी हुई धूलि को अपने वस्त्र से पोंछा और उसे धैर्य दिलाते हुए वे कहने लगे- ‘माता! तुम इतना शोक मत करो। हमारा हृदय फटा जाता है। हम तुम्हारे दूसरे पुत्र हैं। हम तुमसे शपथपूर्वक कहते हैं, तुम्हारा निमाई जहाँ भी कहीं होगा, वहीं से लाकर हम उसे तुमसे मिला देंगे। हम अभी जाते हैं।’ नित्यानन्द जी की बात सुनकर माता ने कुछ धैर्य धारण किया। उन्होंने रोते-रोते कहा- ‘बेटा! मैं निमाई बिना जीवित न रह सकूंगी। तुम कहीं से भी उसे ढ़ूंढ़कर ले आ। नहीं तो मैं विष खाकर या गंगा जी में कूदकर अपने प्राणों को परित्याग कर दूंगी।’
नित्यानन्द जी ने कहा- ‘माँ! इस प्रकार के तुम्हारे रुदन को देखकर हमारी छाती फटती है। तुम धैर्य धरो। हम अभी जाते हैं।’ यह कहकर नित्यानन्द जी ने श्रीवास पण्डित को तो माता तथा विष्णुप्रिया जी की देख-रेख के लिये वहीं छोड़ा। वे जानते थे कि प्रभु कटवा (कण्टक नगर) में स्वामी केशव भारती से संन्यास लेने की बात कर रहे थे, अत: नित्यानन्द जी अपने साथ वक्रेश्वर, गदाधर, मुकुन्द और चन्द्रशेखर आचार्य को लेकर गंगा पर करके कटवाकी ही ओर चल पड़े।
गौरहरि का संन्यास के लिये आग्रह….
गंगापार करके प्रभु मत्त गजेन्द्र की भाँति द्रुत गति से महामहिम केशव भारती की कुटिया के लिये कटवा-ग्राम की ओर चले। कटवा या कण्टक-नगर गंगा जी के उस पार एक छोटा-सा ग्राम था। ग्राम से थोड़ी दूर पर श्रीगंगा जी के ठीक किनारे पर एक बड़ा भारी वटवृक्ष था। उस वटवृक्ष के नीचे एक कुटिया बनाकर संन्यासिप्रवर स्वामी केशव भारती निवास करते थे। भारती महाराज विरक्त और भगवद्भक्त थे। ग्राम के सभी स्त्री-पुरुष उनका अत्यधिक आदर करते थे। उनकी कुटिया के नीचे ही गंगा जी का सुन्दर घाट था। ग्रामवासी उसी घाट पर स्नान करने और जल भरने आया करते थे। भारती की कुटिया के चारों ओर बड़ा ही सुन्दर आम के वृक्षों का बगीचा था।
भारती जी अपने लिपे-पुते स्वच्छ आश्रम के चबूतरे पर धूप में आसन बिछाये बैठे थे। चारों ओर से आमों के मौर की भीनी-भीनी गन्ध आ रही थी। दूर से ही उन्होंने प्रभु को अपने आश्रम की ओर आते देखा। वे प्रभु की उस उन्मत्त चालको देखकर विस्मित-से हो गये और मन-ही-मन सोचने लगे- ‘यह अद्भुत रूप-लावण्ययुक्त युवक कौन है? इसके मुखमण्डल पर दिव्य प्रकाश आलोकित हो रहा है। मालूम पड़ता है साक्षात देवराज इन्द्र युवक का रूप धारण करके मेरे पास आये हैं, या ये दोनों अश्विनीकुमारों में से कोई एक हैं, अपने भाई को अपने से बिछुड़ा देखकर उन्हें ढुंढ़ने के निमित्त मेरे आश्रम की ओर आ रहे हैं। या ये साक्षात श्रीमन्नारायण हैं, जो मुझे कृतार्थ करने और दर्शन देने इधर आ रहे हैं।’ भारती जी मन-ही-मन यह सोच ही रहे थे कि इतने में ही गीले वस्त्रों के सहित प्रभु ने भूमि पर पड़कर भारती के चरणों में साष्टांग प्रणाम किया। भारती जी सम्भ्रम के साथ ‘नारायण, नारायण’ कहने लगे।
प्रभु बहुत देर तक भारती जी के चरणों में पड़े ही रहे। प्रेम के कारण उनके सम्पूर्ण शरीर में रोमांच हो रहे थे। दोनों नेत्रों में से अश्रु बह रहे थे। लम्बी-लम्बी सांसें छोड़ते हुए प्रभु जोरों से उसास ले रहे थे। भारतीजी ने उन्हें उठाते हुए पूछा- ‘भाई! तुम कौन हो? कहाँ से आये हो? इतने व्याकुल क्यों हो रहे हो? अपने दु:ख का कारण बताओ?’ भारती जी के प्रश्नों को सुनकर प्रभु उठकर बैठ गये और धीरे-धीरे कहने लगे- ‘भगवन! आपने मुझे पहचाना नहीं? मेरा नाम निमाई पण्डित है।मैं नवद्वीप में रहता हूँ, आपने एक बार नवद्वीप पधारकर मेरे ऊपर कृपा की थी और मेरे यहाँ भिक्षा पाकर मुझे कृतार्थ किया था। मेरी प्रार्थना पर आपने मुझे संन्यास-दीक्षा देने का भी वचन दिया था। अब मैं इसीलिये आपके शरणापन्न हुआ हूँ।
क्रमशः
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