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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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मुझे संसार-दु:खों से मुक्त कीजिये। मेरा संसारी-बन्धन छिन्न-भिन्न करके मुझे संन्यासी बना दीजिये। यही मेरी आपके श्रीचरणों में विनम्र प्रार्थना है।’
भारती जी को पिछली बातें स्मरण हो आयीं। निमाई का नाम सुनकर उन्होंने उनका आलिंगन किया और मन-ही-मन सोचने लगे- ‘हाय! इन पण्डित का कैसा सुवर्ण के समान सुन्दर शरीर, कैसा अलौकिक रूप-लावण्य, प्रभु के प्रति कितना प्रगाढ़ प्रेम और कितनी भारी विद्वत्ता है, फिर भी ये मेरे पास संन्यास-दीक्षा लेने आये हैं! इन्हें मैं संन्यासी कैसे बना सकूँगा? घर में असहाया वृद्धा माता है, उसकी यही एकमात्र सन्तान है। परम रूपवती युवती स्त्री इनके घर में है, उसके कोई सन्तान भी नहीं, जिससे आगे के लिये वंश चल सके। ऐसी दशा में भी ये संन्यास लेने आये हैं; क्या इन्हें संन्यास की दीक्षा देकर मैं पाप का भागी न बनूंगा?’ यह सोचकर भारतीजी कहने लगे- ‘निमाई पण्डित! तुम स्वयं बुद्धिमान हो, शास्त्रों का मर्म तुमसे अविदित नहीं है। युवावस्था में विषय-भोगों से भलीभाँति उपरति नहीं होती, इसलिये इस अवस्था में संन्यास-धर्म ग्रहण करना निषेध है। पचास वर्ष की अवस्था के पश्चात जब विषय-भोगों से विराग हो जाय तब संन्यास-आश्रम का विधान है। अत: अभी तुम्हारी संन्यास ग्रहण करने योग्य अवस्था नहीं है। अभी तुम घर में ही रहकर भगवद्भजन करो। घर में रहकर क्या भगवान का भजन नहीं हो सकता? हमारा तो ऐसा विचार है कि द्वार-द्वार से टुकडे़ मांगने की अपेक्षा तो घर में ही निर्विघ्नतापूर्वक भजन हो सकता है। पेट तो कहीं भी भरना ही होगा। रहने को स्थान भी कहीं खोजना ही होगा। इसलिये बने-बनाये घर को ही क्यों छोड़ा जाय। न दस-बीस घरों में भिक्षा मांगी एक ही जगह कर ली। इसलिये हमारी सम्मति में तो तुम अपने घर लौट जाओ।’
अत्यंत ही करूणस्वर से प्रभु ने कहा- ‘भगवन! आप साक्षात ईश्वर हैं। आप शरीर धारी नारायण हैं, मुझ संसारी-गर्त में फंसे हुए जीव का उद्धार कीजिये। आप मुझै इस तरह से न बहकाइये। आप मुझे वचन दे चुके हैं, उस वचन का पालन कीजिये। मनुष्य की आयु क्षणभंगुर है। पचास वर्ष किसने देखे हैं। आप सब कुछ करने में समर्थ हैं, आप मुझे संसार-बंधन से मुक्त कर दीजिये।’
भारती जी प्रभु की बात का कुछ भी उत्तर न दे सके। वे थोड़ी देर के लिये चुप हो गये। इतने में ही नित्यानंद जी भी चन्द्रशेखर आचार्य आदि भक्तों के सहित भारती जी के आश्रम पर आ पहुँचे। उन्होंने एक ओर घुटनों में सिर दिये हुए प्रभु को बैठे देखा। प्रभु को देखते ही वे लोग प्रेम के कारण अधीर हो उठे। सभी ने भारती जी को तथा प्रभु को श्रद्धा-भक्ति सहित प्रणाम किया और वे भी प्रभु के पीछे एक ओर बैठ गये। श्रीपाद नित्यानंद जी को देखकर प्रभु कहने लगे- ‘श्रीपाद! आप अच्छे आ गये। आचार्य के बिना संस्कारों के कार्यों को कौन कराता। आपके आने से ही सम्पूर्ण कार्य भलीभाँति सम्पन्न हो सकेंगे।’ नित्यानंद जी ने प्रभु की बात का कुछ उत्तर नहीं दिया। वे नीचे को दृष्टि किये चुपचाप बैठे रहे।
इतने में ही ग्राम के दस-पांच आदमी भारती जी के आश्रम में आ गये। उन्होंने देखा एक देव-तुल्य परम सुकुमार युवक एक ओर संन्यासी बनने के लिये बैठा है, उसके आसपास कई भद्रपुरुष बैठे हुए आंसू बहा रहे हैं, सामने शोकसागर में डूबे हुए-से भारती कुछ सोच रहे हैं।
महाप्रभु के उस अद्भुत रूप-लावण्य को देखकर ग्रामवासी भौचक्के-से रह गये। उन्होंने मनुष्य-शरीर में ऐसा अलौकिक रूप और इतना भारी तेज आज तक देखा ही नहीं था। बात-की-बात में यह बात आसपास के सभी ग्रामों में फैल गयी। प्रभु के रूप, लावण्य और तेज की ख्याति सुनकर दूर-दूर से लोग उनके दर्शनों के लिये आने लगे। कटवा-ग्राम के तो स्त्री–पुरुष,बूढ़े-जवान तथा बाल-बच्चे सभी भारती के आश्रम पर आकर एकत्रित हो गये। जो स्त्रियाँ कभी भी घर से बाहर नहीं निकलती थीं , वे भी प्रभु के देवदुर्लभ दर्शनों की अभिलाषा से सब कुछ छोड़-छाड़कर भारती जी के आश्रम पर आ गयीं।
प्रभु एक ओर चुपचाप बैठे हुए थे। उनके काले-काले घुंघराले बाल बिना किसी नियम के स्वाभाविक रूप से इधर-उधर छिटके हुए थे। वे अपनी स्वाभाविक दशा में प्रभु के मुख की शोभा को और भी अत्यधिक आलोकमय बना रहे थे। प्रभु की दोनों आँखें ऊपर चढ़ी हुई थी। शरीर के गीले वस्त्र शरीर पर ही सूख गये थे। वे अपने एक घोंटूपर सिर रखे ऊर्ध्वदृष्टि से आकाश की ओर निहार रहे थे। उनकी दोनों आँखों की कोरों में से निरंतर अश्रु बह रहे थे। पीछे नित्यानंद आदि भक्त भी चुपचाप बैठे हुए अश्रुविमोचन कर रहे थे।
नगर की स्त्रियों ने महाप्रभु के रूप को देखा। वे उनके रूप-लावण्य को देखते ही बावली-सी हो गयीं ओर परस्पर में शोक प्रकट करते हुए कहने लगीं- ‘हाय! इनकी माता कैसे जीवित रही होगी। जिसका सर्वगुण-सम्पन्न इतना सुंदर और सुशील इकलौता पुत्र घर से संन्यासी होने के लिये चला आया हो, वह जननी किस प्रकार प्राण धारण कर सकती हैं। जब अपरिचित होने पर हमारा ही हृदय फटा जा रहा है तब जिसने इन्हें नौ महीने गर्भ में धारण किया होगा, उसकी तो वेदना का अनुमान लगाया ही नहीं जा सकता। हाय! विधाता को धिक्कार है, जो ऐसा अद्भुत रूप देकर इनकी ऐसी मति बना दी। हाय! इनकी युवती स्त्री की क्या दशा हुई होगी।’
वृद्धा स्त्रियां इनको इस प्रकार आँसू बहाते देखकर इनके समीप जाकर कहतीं- ‘बेटा! तुझे क्या सूझी है, तेरी मां की क्या दशा होगी। तेरी दशा देखकर हमारा हृदय फटा जाता है। तू अपने घर को लौट जा। संन्यासी होने में क्या रखा है। जाकर माता-पिता की सेवा कर।’ युवती स्त्रियां रोते-रोते कहतीं- ‘हाय! इनकी स्त्री के ऊपर तो आज वज्र ही टुट पड़ा होगा। जिसका त्रैलोक्य-सुन्दर पति युवावस्था में उसे छोड़कर संन्यासी बनने के लिये चला आया हो- उस दु:खिनी नारी को दु:ख को कौन समझ सकता है। पति ही कुलवती स्त्रियों के लिये एकमात्र आधार और आश्रय है।
क्रमशः
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