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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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इस प्रकार संकीर्तन करते हुए प्रभु केला खोल वाले श्रीधर भक्त के घर के सामने पहुँचे। भक्त-वत्सल प्रभु उस अकिंचन दीन-हीन भक्त के घर में घुस गये। गरीब भक्त एक ओर बैठा हुआ भगवान के सुमधुर नामों का उच्च स्वर से गायन कर रहा था। प्रभु को देखते ही वह मारे प्रेम के पुलकित हो उठा और जल्दी से प्रभु के पाद-पद्मों में गिर पड़ा।श्रीधर को अपने पैरों के पास पड़ा देखकर प्रभु उससे प्रेमपूर्वक कहने लगे- ‘श्रीधर! हम तुम्हारे घर आये हैं, कुछ खिलाओगे नहीं?’ बेचारा गरीब-कंगाल सोचने लगा ‘हाय! प्रभु तो ऐसे असमय में पधारे है कि इस दीन-हीन कंगाल के घर में दो मुट्ठी चबेना भी नहीं। अब प्रभु को क्या खिलाऊं।’ भक्त यह सोच ही रहा था कि उसके पास के ही फूटे लोहे के पात्र में रखे हुए पानी को उठाकर प्रभु कहने लगे- ‘श्रीधर! तुम सोच क्या रहे हो। देखते नहीं हो, अमृत भरकर तो तुमने इस पात्र में ही रख रखा है।’ यह कहते-कहते प्रभु उस समस्त जल को पान कर गये। श्रीधर रो-रोकर कह रहा था- ‘प्रभो! यह जल आपके योग्य नहीं है, नाथ! इस फूटे पात्र का जल अशुद्ध है।’ किंतु प्रभु कब सुनने वाले थे। उनके लिये भक्त की सभी वस्तुएँ शुद्ध और परम प्रिय हैं। उनमें योग्यायोग्य और अच्छी-बुरी का भेदभाव नहीं। सभी भक्त श्रीधर के भाग्य की सराहना करने लगे और प्रभु की भक्त वत्सलता की भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे। श्रीधर भी प्रेम में विह्वल होकर पृथ्वी पर गिर पड़े।
काजी यहाँ तक प्रभु के साथ-ही-साथ आया था। अब प्रभु ने उससे लौट जाने के लिये कहा। वह प्रभु के प्रति नम्रतापूर्वक प्रणाम करके लौट गया। उस दिन से उसने ही नहीं, किंतु उसके सभी वश के लोगों ने संकीर्तन का विरोध करना छोड़ दिया। नवद्वीप में अद्यावधि चाँदखाँ क़ाज़ी का वश विद्यमान हैं क़ाज़ी के वश के लोग अभी तक श्रीकृष्ण-संकीर्तन में योगदान देते हैं। वेलपुकर या ब्राह्मणपुकर-स्थान में अभी तक चाँदखाँ क़ाज़ी की समाधि बनी हुई है। उस महाभागवत सौभाग्यशाली क़ाज़ी की समाधि के निकट अब भी जाकर वैष्णवगण वहाँ की धूलि को अपने मस्तक पर चढा़कर अपने को कृतार्थ मानते हैं। वह प्रेम-दृश्य उसकी समाधि के समीप जाते ही भावुक भक्तों के हृदयों में सजीव होकर ज्यों-का-त्यों ही नृत्य करने लगता है। धन्य है महाप्रभु गौरांगदेव के ऐसे प्रेम को, जिसके सामने विरोधी भी नतमस्तक होकर उसकी छत्र-छाया में अपने को सुखी बनाते हैं और धन्य है ऐसे महाभाग क़ाज़ी के जिसे मामा कहकर महाप्रभु प्रेमपूर्वक गाढालिंगन प्रदान करते हैं।
भक्तों की लीलाएँ……
प्रकृति से परे जो भाव हैं, उन्हें शास्त्रों में अचिन्त्य बताया गया है! वहाँ जीवों की साधारण प्राकृतिक बुद्धि से काम नहीं चलता, उन भावों में अपनी युक्ति लड़ाना व्यर्थ-सा ही है। यह तो प्रकृति के परे के भावों की बात हैं बहुत-सी प्राकृतिक घटनाएँ भी ऐसी होती हैं, जिनके सम्बन्ध में मनुष्य ठीक-ठीक कुछ कह ही नहीं सकता। क्योंकि कोई मनुष्य पूर्ण नहीं है। पूर्ण तो वही एकमात्र परमात्मा है। मनुष्य की बुद्धि सीमित और संकुचित है। जितनी ही जिसकी बुद्धि होगी, वह उतना ही अधिक सोच सकेगा। तर्क की कसौटी पर कसकर किसी बात की सत्यता सिद्ध नहीं हो सकती। किसी बात को किसी ने तर्क से सत्य सिद्ध कर दिया, किंतु उसी को उससे बड़ा तार्किक एकदम खण्डन कर सकता है। अत: इसमें श्रद्धा ही मुख्य कारण है; जिस स्थान पर जिसकी जैसी भी श्रद्धा जम गयी, उसे वहाँ सत्य और ठीक मालूम पडने लगा। रागानुगा भक्ति की उत्पत्ति हो जाने पर मनुष्य को अपने इष्ट की लीलाओं के प्रति लोभ उत्पन्न हो जाता है। लोभी अपने कार्य के सामने विघ्न-बाधाओं की परवा ही नहीं करता। वह तो आँख मूँदे चुप-चाप बढा़ ही चलता है।
भक्तों की श्रद्धा में और साधारण लोगों की श्रद्धा में आकाश-पाताल का अन्तर है, भक्तों को जिन बातों में कभी शंका का ध्यान तक भी नहीं होता, उन्हीं बातों को साधारण लोग ढोंग, पाखण्ड, झूठ अथवा अर्थवाद कहकर उसकी उपेक्षा कर देते हैं। वे करते रहें, भक्तों को इससे क्या? जब वे शास्त्र और युक्तियों तक की अपेक्षा नहीं रखते तब साधारण लोगों की उपेक्षा की ही परवा क्यों करने लगे। महाप्रभु के संकीर्तन के समय भी भक्तों को बहुत-सी अद्भुत घटनाएं दिखायी देती थीं, जिनमें से दो-चार नीचे दी जाती हैं।
एक दिन प्रभु ने श्रीवास के घर संकीर्तन के पश्चात आम की एक गुठली को लेकर आंगन में गाड़ दिया। देखते-ही-देखते उसमें से अकुंर उत्पन्न हो गया और कुछ ही क्षण में वह अकुंर बढ़कर पूरा वृक्ष बन गया। भक्तों ने आश्चर्य के सहित उस वृक्ष को देखा। उसी समय उस पर फल भी दीखने लगे और वे बात-की-बात में पके हुए-से दीखने लगे। प्रभु ने उन सभी फलों को तोड़ लिया और सभी भक्तों को एक-एक बांट दिया। आमों को देखने से ही तबीयत प्रसन्न होती थी, बड़े-बड़े़ सिंदूरिया-रंग के वे आम भक्तों के चित्तों को स्वत: ही अपनी ओर आकर्षित कर रहे थे। उनमें से दिव्य गन्ध निकल रही थी।भक्तों ने उनको प्रभु का प्रसाद समझकर प्रेम से पाया। उन आमों में न तो गुठली थी, न छिलका। बस, चारों ओर ओतप्रोत भाव से अद्भुत माधुर्यमय रस-ही-रस भरा था। एक आम के खाने से ही पेट भर जाता, फिर भक्तों को अन्य कोई वस्तु खाने की अपेक्षा नहीं रहती। रहना भी न चाहिये, जब प्रेम-वाटिका के सुचतुर माली महाप्रभु गौरांग के हाथ से लगाये हुए वृक्ष का भक्ति-रस से भरा हुआ आम खा लिया, तब इन सांसारिक खाद्य-पदार्थो की आवश्यकता ही क्या रहती है? इस प्रकार यह आम्र-महोत्सव श्रीवास के घर बारहों महीने होता था, किंतु जिसे इस बात का विश्वास नहीं होता, ऐसे अभक्त को उस आम्र के दर्शन भी नहीं होते थे, मिलना तो दूर रहा। आज तक भी नवद्वीप में एक स्थान आम्रघट्ट या आम्र घाटा नाम से प्रसिद्ध होकर उन आमों का स्मरण दिला रहा है।
क्रमशः
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