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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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एक से दूसरे के कान में पहुँचती, जो भी सुनता, वही कीर्तन बंद करके चुप हो जाता। इस प्रकार धीरे-धीरे सभी भक्त चुप हो गये। ढोल-करताल आदि सभी वाद्य भी आप-से-आप ही बंद हो गये। प्रभु ने भी नृत्य बंद कर दिया। इस प्रकार कीर्तन को आप-से-आप ही बंद होते देखकर प्रभु श्रीवास की ओर देखते हुए कुछ कहने लगे- ‘पण्डित जी! आपके घर में कोई दुर्घटना तो नहीं हो गयी है? न जाने क्यों हमारा मन संकीर्तन में नहीं लग रहा है। हृदय में एक प्रकार की खलबली-सी हो रही है।’
अत्यन्त ही दीनभाव से श्रीवास पण्डित ने कहा- ‘प्रभो! जहाँ आप संकीर्तन कर रहे हों, वहाँ कोई दुर्घटना हो ही कैसे सकती है? सम्पूर्ण दुर्घटनाओं के निवारणकर्ता तो आप ही हैं। आप के सम्मुख भला दुर्घटना आ ही कैसे सकती है? आप तो मंगलस्वरूप है। आप की उपस्थिति में तो परम मंगल-ही-मंगल होने चाहिये।’
प्रभु ने दृढ़ता के साथ कहा- ‘नहीं, ठीक बताइये। मेरा मन व्याकुल हो रहा है। हृदय आप-से-आप ही निकल पड़ना चाहता है। अवश्य की कोई दुर्घटना घटित हो गयी है।’
प्रभु के इस प्रकार दृढ़ता के साथ पूछने पर श्रीवास चुप हो गये, उन्होंने कुछ भी उत्तर नहीं दिया। तब धीरे से एक भक्त ने कहा- ‘प्रभो श्रीवास का इकलौता पुत्र परलोकवासी हो गया है।’
सम्भ्रम के साथ श्रीवास के मुख की ओर देखते हुए प्रभु ने चौंककर कहा- ‘हैं क्या कहा? श्रीवास के पुत्र का परलोकवास? कब हुआ? पण्डितजी! आप बतलाते क्यों नहीं? असली बात क्या है?’
श्रीवास फिर भी चुप ही रहे, तब उसी भक्त ने फिर कहा- ‘प्रभो! इस बात को तो ढाई प्रहर होने को आया। आपके आनन्द में विघ्न होगा, इसलिये श्रीवास पण्डित ने यह बात किसी पर प्रकट नहीं की।’
इतना सुनते ही प्रभु की दोनो आँखों से अश्रुओं की धारा बहने लगी। गद्गद-कण्ठ से प्रभु ने कहा- ‘श्रीवास! आपने आज श्रीकृष्ण को खरीद लिया। ओहो! इतनी भारी दृढ़ता! इकलौते मरे पुत्र को भीतर छोड़कर आप उसी प्रेम से कीर्तन कर रहे हैं। धन्य है आपकी भक्ति को और बलिहारी है आपके कृष्ण-प्रेम को। सचमुच आप-जैसे भक्तों के दर्शनों से ही कोटि जन्मों के पापों का क्षय हो जाता है, यह कहकर प्रभु फूट-फूटकर रोने लगे।
प्रभु को इस प्रकार रोते देखकर गद्गद-कण्ठ से श्रीवास पण्डित ने कहा- ‘प्रभो! मैं पुत्रशोक को तो सहन करने में समर्थ हो सकता हूँ, किंतु आपके रुदन को नहीं सह सकता। हे सम्पूर्ण प्राणियों के एकमात्र आश्रसदाता। आप अपने कमल-नयनों से अश्रु बहाकर मेरे हृदय को दु:खी न बनाइये। नाथ! मैं आपको रोते हुए नहीं देख सकता।’
इतने में ही कुछ भक्त भीतर जाकर श्रीवास पण्डित के मृत पुत्र के शरीर को आंगन में उठा लाये। प्रभु उसके सिरहाने बैठ गये और अपने कोमल कर से उसका स्पर्श करते हुए जीवित मनुष्य से जिस प्रकार पूछते हैं, उसी प्रकार पूछने लगे- ‘क्यों जीव! तुम कहाँ हो? इस शरीर को परित्याग करके क्यों चले गये?’ उस समय प्रभु के अन्तरंग भक्तों को मानो स्पष्ट सुनायी देने लगा कि वह मृत शरीर जीवित पुरुष की भाँति उत्तर दे रहा है। उसने कहा- ‘प्रभो! हम तो कर्माधीन हैं! हमारा इस शरीर में इतने ही दिन का संस्कार था। अब हम बहुत उत्तम स्थान में हैं और खूब प्रसन्न हैं।’
प्रभु ने कहा- ‘कुछ काल इस शरीर में और क्यों नहीं रहते?’
मानो जीव ने उत्तर दिया- ‘प्रभो! आप सर्वसमर्थ हैं। आप प्रारब्ध को भी मेट सकते हैं, किंतु हमारा इस शरीर में इतने ही दिन का भोग था। अब हमारी इस शरीर में रहने की इच्छा भी नहीं है, क्योंकि अब हम जहाँ हैं, वहाँ यहाँ से अधिक सुखी हैं।’
जीव का ऐसा उत्तर सुनकर सभी लोगों का शोक-मोह दूर हो गया। तब प्रभु ने श्रीवास पण्डित को सान्त्वना देते हुए कहा- ‘पण्डित जी! आप तो स्वयं सब कुछ जानते हैं। आपका इस पुत्र के साथ इतने ही दिनों का संस्कार था। अब तक आप इस एक को ही अपना पुत्र समझते थे। अब हम और श्रीपाद नित्यानन्द आपके दोनों ही पुत्र हुए। आज से हम दोनों को आप अपने सगे पुत्र ही समझें।’ प्रभु की ऐसी बात सुनकर श्रीवास प्रेम के कारण विह्वल हो गये और उनकी आँखों में से प्रेमाश्रु बहने लगे। इसके अनन्तर भक्तों ने उस मृत शरीर का विधिवत संस्कार किया।
ओहो! कितना ऊँचा आदर्श है? इकलौते पुत्र के मर जाने पर भी जिनके शरीर को संताप-पीड़ा नहीं हो सकती, क्या वे संसारी मनुष्य कहे जा सकते हैं? क्या उनकी तुलना मायाबद्ध जीव के साथ की जा सकती है? सचमुच में वे श्यामसुन्दर के सदा के सुहृद और सखा हैं। ऐसे भगवान के प्राणप्यारे भक्तों को संताप कहाँ? जिनका मन-मधुप उस मुरलीमनोहर के मुखरूपी कमल की मकरन्द मधुरिमा का पान कर चुका है, उसे फिर संसारी संतापरूपी वनवीथियों में व्यर्थ घूमने से क्या लाभ? वह तो उस अपने प्यारे की प्रेमवाटिका में विचरण करता हुआ सदा आनन्द का रसास्वादन करने में ही मस्त बना रहेगा। श्रीमद्भागवत में हरिनामक योगेश्वर ठीक ही कहा है-
भगवत उरुविक्रमाङ्घ्रिशाखा-
नखमणिचन्द्रिकया निरस्ततापे।
हृदि कथमुपसीदतां पुन: स
प्रभवति चन्द्र इवोदितेअर्कताप:।
अर्थात भगवत-सेवा से परम सुख मिलने के कारण, उन भगवान के अरुण कोमल चरणारविन्दों के मणियों के समान, चमकीले नखों की चन्द्रमा के समान शीतल किरणों की कान्ति से एक बार जिसके हृदय के सम्पुर्ण संताप नष्ट हो चुके हों, ऐसे भक्त के हृदय में संसारी सुखों के वियोगजन्य दु:ख-संताप की स्थिति हो ही कैसे सकती है? जिस प्रकार रात्रि में चन्द्रमा के उदय होने पर सूर्य का ताप किंचिन्मात्र भी नहीं रहता, उसी प्रकार भगवत-कृपा के होने पर संसारी तापों का अत्यन्तभाव हो जाता है।इस प्रकार भक्तों की सभी लीलाएँ अचिन्त्य हैं, वे मनुष्य की बुद्धि के बाहर की बातें हैं। जिनके ऊपर भगवत-कृपा होती है, जिन्हें भगवान ही अपना कहकर वरण कर लेते हैं, उन्हीं की किसी महापुरुष के प्रति भगवत-भावना होती है और वे ही उस अनिर्वचनीय आनन्द के रसास्वादन के अधिकारी भी बन सकते हैं। प्रभु की सभी लीला में प्रेम-ही-प्रेम भरा रहता था।
क्रमशः
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