cc155

श्री श्री चैतन्य चरितावली 
155-

एक दिन महाप्रभु भावावेश में जोरों से ‘गोपी-गोपी’ कहकर रुदन कर रहे थे। वे गोपी-भाव में ऐसे विभोर हुए कि उनके मुख से ‘गोपी-गापी’ इस शब्द के अतिरिक्‍त कोई दूसरा शब्द निकलता ही नहीं था। उसी समय एक प्रतिष्ठित छात्र इनके समीप इनके दर्शन के लिये आये। वे महाप्रभु के साथ कुछ काल तक पड़े भी थे। वैसे तो शास्त्रीय विद्या में पूर्ण पारंगत पण्डित समझे जाते थे, किंतु भक्ति-भाव में कोरे थे। प्रेम-मार्ग का उन्हें पता नहीं था। प्रभु तो उस समय बाह्य-ज्ञान-शून्य थे, उन्हें भावावेश में पता ही नहीं था कि कौन हमारे पास आया और हमारे पास से उठ गया। उन विद्याभिमानी छात्र ने महाप्रभु की ऐसी अवस्था देखकर कुछ गर्वित भाव से कहा- ‘पण्डित होकर आप यह क्या अशास्त्रीय व्यवहार कर रहे हैं?’ ‘गोपी-गोपी’ कहने से क्या लाभ? कृष्‍ण-कृष्‍ण कहो, जिससे उद्धार हो और शास्त्र की मर्यादा भी भंग न हो।’

महाप्रभु को उस समय कुछ भी पता नहीं था कि यह कौन है। भावावेश में उन्होंने यही समझा कि यह भी कोई उद्धव के समान श्‍याम सुन्दर का सखा है और हमें धोखे में डालने के लिये आया है। इससे प्रभु को उसके ऊपर क्रोध आ गया और एक बड़ा-सा बांस लेकर उसके पीछे मारने के लिये दौडे़। विद्याभिमानी छात्र महाशय अपना सभी शास्त्रीय ज्ञान भूल गये और अपनी जान बचाकर वहाँ से भागे।महाप्रभु भी उनके पीछे-ही-पीछे उन्हें पकड़ने के लिये दौडे़। प्रहार के भय से छात्र महोदय मुट्ठी बांधकर भागे। कन्धे पर का दुपट्टा गिर गया। बगल में से पोथी निकल पड़ी। हांफते और चिल्लाते हुए वे जोरों से भागे जा रहे थे। लोग उन्हें इस प्रकार भागते देखकर आश्‍चर्य के साथ उनके भागने का कारण पूछते, कोई इनकी ऐसी दशा देखकर ठहाका मारकर हंसने लगते, किंतु ये किसी की कुछ सुनते ही नहीं थे। ‘जान बची लाखों पाये, मियां बुद्धु अपने घर आये।’

प्रभु को इस प्रकार इन छात्र महाशय के पीछे दौड़ते देखकर भक्तों ने उन्हें पकड़ लिया! प्रभु उसी भाव में मूर्च्छित होकर गिर पड़े। विद्यार्थी महो दय ने बहुत दूर भागने के अनन्तर पीछे फिरकर देखा। जब उन्होंने प्रभु को अपने पीछे आते हुए नहीं देखा तब वे खडे़ हो गये। उनकी सांसें जोरों से चल रही थी। सम्पूर्ण शरीर पसीने से लथपथ हो रहा था। अंग-प्रत्यंग से पसीने की धारें-सी बह रही थीं, लोगों ने उनकी ऐसी दशा देखकर उनसे भाँति-भाँति के प्रश्‍न करने आरम्भ कर दिये। किंतु ये प्रश्‍नों का उत्तर क्या देते? इनकी तो सांस फूली हुई थी। मुख में से बात ही नहीं निकल सकती थी। कुछ लोगों ने दयार्द्र होकर इन्हें पंखा झला और थोड़ा ठंडा पानी पिलाया। पानी पीने पर इन्हें कुछ होश हुआ, सांसें भी ठीक-ठीक चलने लगीं। तब एक ने पूछा- ‘महाशय! आपकी ऐसी दशा क्यों हूई? किसने आपको ऐसी ताड़ना दी?’

उन्होंने अपने हृदय की द्वेषाग्नि को उगलते हुए कहा- ‘अजी! क्या बताऊँ? हमने सुना था कि जगन्नाथ मिश्र का लड़का निमाई बड़ा भक्त बन गया है। वह पहले हमारे साथ पढ़ता था।’ हमने सोचा- ‘चलो, वह भक्त बन गया है, तो उसके दर्शन ही कर आवें। इसीलिये हम उसके दर्शन करने गये थे, किंतु वह भक्ति क्या जाने?’ हमने देखा, ‘वह अशास्त्रीय पद्धति से ‘गोपी-गोपी’ चिल्ला रहा है।’ हमने कहा- ‘भाई! तुम पढे़-लिखे होकर ऐसा शास्त्रविरुद्ध काम क्यों कर रहे हो।’ बस, इतने पर ही उसने आव गिना न ताव लट्ठ लेकर जंगलियों की तरह हमारे ऊपर टूट पड़ा। यदि हम जान लेकर वहाँ से भागते नहीं, तो वह तो हमारा वहीं काम तमाम कर डालता। इसी का नाम भक्ति है? इसका नाम तो क्रूरता है। क्रूर हिंसक व्याध ही ऐसा व्यवहार करते हैं। भक्त तो अहिंसा-प्रिय, शान्त और प्राणिमात्र पर दया करने वाले होते हैं।’
उनके मुख से ऐसी बातें सुनकर कुछ हंसने वाले तो धीरे से कहने लगे- ‘पण्डित जी! थोड़ा-सा और भी उपदेश क्यों नहीं किया?’ कुछ हंसते हुए कहते- ‘पण्डित जी! उपदेश की दक्षिणा तो बड़ी सख्‍त मिली। घाटे में रहे। क्यों ठीक है न, चलो, खैर हुई बच आये। अब सवा रूपये का प्रसाद जरूर बांटना।’

कुछ ईर्ष्‍या रखने वाले खल पुरुष अपनी छिपी हुई ईर्ष्‍या को प्रकट करते हुए कहने लगे- ‘ये दुष्‍ट और कोई भला काम थोडे़ ही करेंगे? बस, साधु-ब्राह्मणों पर प्रहार करना ही तो इन्होंने सीखा है। रात्रि में तो छिप-छिपकर न जाने क्या-क्या करते रहते हैं और दिन में साधु-ब्राह्मणों को त्रास पहुँचाते हैं। यही इनकी भक्ति है। पण्डित जी! तुम्हारे हाथ नहीं है क्या? उनके साथ दस-बीस बुद्धिहीन भक्त हैं तो तुम्हारे कहने में हजारों विद्यार्थी हैं। एक बार इन सबकी अच्छी तरह से मरम्मत क्यों नहीं करा देते। बस, तब ये सब कीर्तन-फीर्तन भूल जायंगे। जब तक इनकी नसें ढीली न होंगी, तब तक ये होश में गुस्से में दुर्वासा बने हुए उन विद्याभिमानी छात्र महाशय ने गर्जकर कहा- ‘मेरे कहने में हजारों छात्र हैं। मेरे आँख के इशारे से ही इन भ‍क्तों में से किसी की भी हड्डी तक देखने को न मिलेगी। आप लोग कल ही देंखे, इसका परिणाम क्या होता है। कल बच्चुओं को मालूम पड़ जायगा कि ब्राह्मण के ऊपर प्रहार करने वाले की क्या दशा होती है?’

इस प्रकार वे महाशय बड़बड़ाते हुए अपनी छात्र-मण्‍डली में पहुँचे। छात्र तो पहले से ही महाप्रभु के उत्कर्ष को न सह सकने के कारण उनसे जले-भुने बैठे थे। उनके लिये महाप्रभुका इतना बढ़ता हुआ यश असहनीय था। उनके हृदय में महाप्रभु की देशव्यापी कीर्ति के कारण डाह उत्पन्न हो गयी थी। अब इतने बड़े योग्य विद्यार्थी के ऊपर प्रहार की बात सुनकर प्राय: दुष्‍ट स्वभाव के बहुत-से छात्र एकदम उत्तेजित हो उठे और उसी समय महाप्रभु के ऊपर प्रहार करने जाने के लिये उद्यत हो गये। कुछ समझदार छात्रों ने कहा- ‘भाई! इतनी जल्दी करने की कौन-सी बात है, इन पर प्रहार भी नहीं हुआ है। दो-चार दिन और देख लो।
क्रमशः

Comments

Popular posts from this blog

cc 201

362

cc 90