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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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हृदय त्याग के लिये इस प्रकार अकुलाता रहे, जिस प्रकार जल में बहुत देर डूब की लगाये रहने पर प्राण श्‍वास लेने के लिये अकुलाने लगते हैं।
महाप्रभु को संन्यास-दीक्षा देने के लिये भारती महाराज राजी हो गये। यह देखकर प्रभु की प्रसन्नता का पारावार नहीं रहा। वे प्रेम में बेसूध बने हुए सम्पूर्ण रात्रि भगवन्नाम का कीर्तन करते रहे और आनन्द के उल्लास में आसन से उठ-उठकर पागल की तरह नृत्य करते रहे। जिस प्रकार नवागत वधू से मिलने के लिये अनूरागी युवक बेचैनी के साथ रात्रि होने की प्रतीक्षा करता रहता है, उसी प्रकार महाप्रभु संन्यास-धर्म में दीक्षित होने के लिये उस रात्रि के अन्त होने की प्रतीक्षा करते रहे। उस रात्रि में प्रभु को क्षणभर के लिये भी निद्रा नहीं आयी। निरन्तर संकीर्तन करते रहने के कारण प्रभु के नेत्र कुछ आप-से-आप ही मुंदने-से लगे। इतने में ही आम्र की डालों पर बैठे हुए पक्षियों ने अपने कोमल कण्‍ठों से भाँति-भाँति के स्वरों में गायन आरम्भ किया। मानो वे महाप्रभु के संन्यास ग्रहण करने के उपलक्ष्‍य में पहले से ही मंगलाचरण कर रहे हों।
पक्षियों के कलरव को सुनकर प्रभु की तन्द्रा दूर हूई और वे आसन पर से उठकर बैठ गये। पास में ही बेसूध पड़े हुए आचार्यरत्न, नित्यानन्द आदि को प्रभु ने जगाया। सबके जग जाने पर प्रभु नित्यकर्मों से निवृत्त हुए। गंगा जी में स्नान करने के निमित्त अपने सभी साथियों के सहित प्रभु ने अपने भावी गुरुदेव के चरण-कमलों में प्रणाम किया और बड़ी ही नम्रता से दोनों हाथों की अंजलि बांधे हुए उनसे निवेदन किया- ‘भगवन्! मैं उपस्थित हूँ, अब आज्ञा दीजिये मुझे क्या-क्या करना होगा।’
कुछ विवशता-सी प्रकट करते हुए भारती जी ने कहा- ‘अब संन्यास-दीक्षा के निमित्त जिन-जिन सामग्रियों की आवश्‍यकता हो, उन्हें एकत्रित करना चाहिये। इसका प्रबन्ध मैं अभी किये देता हूँ।’ यह कहकर उन्होंने एक आदमी को सब सामान लाने के निमित्त कटवा के लिये भेजा।

कण्‍टक-नगर-निवासी नर-नारियों को कल तक यही पता था कि भारती जी उस युवक संन्यास-दीक्षा के लिए को देने के लिये कभी सहमत न होंगे; किंतु आज जब प्रात: ही उन लोगों ने यह समाचार सुना कि भारती तो उस ब्राह्मण-युवक को संन्यासी बनाने के लिये राजी हो गये और आज ही उसे शिखा-सूत्र से रहित करके द्वार-द्वार से भिक्षा मांगने वाला गृह-त्यागी विरागी बना देंगे, तब तो उनके दु:ख का ठिकाना नहीं रहा। न जाने उन ग्रामवासियों को प्रभु के प्रति दर्शन मात्र से ही क्यों ममता हो गयी थी। वे सभी प्रभु को अपना घर का-सा सगा-सम्बन्धी ही समझने लगे। बात-ही-बात में बहूत-से स्त्री-पुरुष आश्रम में आकर एकत्रित हो गये। स्त्रियाँ एक ओर खड़ी होकर आंसू बहा रही थीं। पुरुष आपस में मिलकर भाँति-भाँति की बातें कर रहे थे।

कोई तो कहता- ‘अजी! इस युवक को ही समझाना चाहिये। जैसे बने, समझा-बुझाकर इसे इसकी माता के समीप पहुँचा आना चाहिये।’ इस पर दूसरा कहता- ‘वह समझे तब तो समझावें। जब उसके सगे-सम्बन्धी ही उसे नहीं समझा सके, तो हम-तुम तो भला समझा ही क्या सकते हैं।’

इतने ही में एक बूढा़ बोल उठा- ‘अजी! हम सब इतने आदमी हैं, संन्यास का कार्य ही न होने देंगे, बस, निबट गया किस्सा।’ इस पर किसी विचारवान ने क‍हा- ‘भाई! यह कैसे हो सकता है। हम ऐसे शुभ काम में जबरदस्ती कैसे कर सकते हैं। ऐसे पुण्‍य-कर्मों में यदि कुछ सहायता न बन सके तो इस तरह विघ्‍न करना तो ठीक नहीं है। हम लोग मुंह से ही समझा सकते हैं। जबरदस्ती करना हमारा धर्म नहीं।’   इस पर उद्धत स्वभाव का युवक जोरों से बोल उठा- ‘अजी! धर्म गया ऐसी-तैसी में। ऐसे धर्म में तो तेल डालकर आग लगा देनी चाहिये। बने हैं, कहीं के धर्मात्मा। यदि ऐसी ही बात है, तो तुम ही क्यों नहीं संन्यास ले लेते। क्यों दिनभर यह ला, वह ला, इसे रख, उसे उठा करते रहते हो।’ ‘औरों को बुढ़िया सिख-बुधि देय, अपनी खाट भीतरो लेय।’
तुम अपने बेटा-बेटियों को छोड़कर संन्यासी हो जाओ तब तो हम भी जानें।’ इतना कहकर वह लोगों की ओर देखता हुआ उसी आवेश के साथ कहने लगा- ‘देखो भाई! इन्हें बकने दो, इनकी तो बुद्धि सठिया गयी है। भला, जिसके घर में युवती स्त्री हो, दूसरी सन्तान से रहित बूढ़ी विधवा माता हो ऐसे चौबीस वर्ष के नवयुवक को घर-घर का भिखारी बना देना किस धर्मशास्त्र में लिखा होगा। यदि किसी में लिखा भी हो तो बाबा! हम ऐसे धर्मशास्त्र को दूर से ही दण्‍डवत करते हैं। ऐसा धर्मशास्त्र इन बाबा को ही मुबारक हो। ये अपने बड़े लड़के को संन्यासी बना दें या इनकी अवस्था है, ये ही बन जायँ। हम अपनी आँखों के सामने तो इस ब्राह्मणकुमार को शिखा-सूत्रत्याग कर गेरूए रंग के वस्त्र न पहनने देंगे।

भारती महाराज यदि सीधी तरह मान जायँ तब तो ठीक ही है, नहीं तो भारती जी का गला दबाकर तो मैं इन्हें गांव से बाहर कर आऊंगा और आप लोग नाव में बिठाकर इस युवक को इसके घर पर पहुँचा आयें। भारती को मना लेने का ठेका तो मैं अपने जिम्मे लेता हूँ।’

उस युवक की ऐसी जोशपूर्ण बातें सुनकर सुनने वालों में से बहुतों को जोश आ गया और वे ‘ठीक है, ठीक है, ऐसा ही करना चाहिये।’ ऐसा कह-कहकर उसकी बातों का समर्थन करने लगे।

इस पर उसी विचारवान वृद्ध ने कहा- ‘भाई! ऐसा करने से काम न चलेगा। यदि हम अपनी कमज़ोरी से धर्म न कर सकें तो क्या उसे दूसरों को भी न करने दें। यदि अपने भाग्य-दोष से हम नकटे हो तो दूसरे की नाक को भी न देख सकें। ये सब जोश की बातें हैं। हम लोग इतना ही कर सकते हैं कि भारती जी को समझा-बुझाकर दीक्षा देने से रोक दें।’ वृद्ध की यह बात सबको पसंद आयी और सभी मिलकर भारती जी के पास पहुँचे। सभी भारती जी को प्रणाम करके बैठ गये। दूसरी ओर महाप्रभु नीचे को सिर किये हुए बैठे थे।
क्रमशः

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