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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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महाप्रभु के समीप में ही चन्द्रशेखर आचार्य तथा नित्यानन्द जी आदि एक पुरानी-सी फटी चटाई पर बैठे थे। भारती के समीप बैठकर लोग परस्पर एक-दूसरे के मुख की ओर देखने लगे। सब लोगों के अभिप्राय को जानकर उसी विचारवान वृद्ध पुरुष ने हाथ जोडे़ हुए कहा- ‘स्वामी जी महाराज! हम लोग आपसे कुछ निवेदन करना चाहते हैं।’ प्रसन्नता प्रकट करते हुए जल्दी से भारती जी महाराज बोल उठे- ‘हाँ, हाँ कहो, जरूर कहो। जो कहना चाहते हो, निस्संकोच-भाव से कह डालो।’
वृद्ध ने कहा- ‘महाराज! आप सब कुछ जानते हैं, आपसे कोई बात छिपी थोडे़ ही है। हमें इन ब्राह्मण-कुमार के ऊपर बड़ी दया आ रही है। इनकी घर में वृद्धा माता है, युवती स्त्री है, घर पर दूसरा कोई आदमी नहीं। उनके निर्वाह के लिये कोई बंधी हुई वृत्ति नहीं। इनकी स्त्री के अभी तक कोई संतान नहीं। ऐसी अवस्था में भी ये आवेश में आकर संन्यास ले रहे हैं, इससे हम सबों को बड़ा दुख हो रहा है। ये सभी बातें हमने इनके सम्बन्धियों के ही मुख से सुनी है। आपसे भी ये बातें छिपी न होंगी। इसलिये हमारी यही प्रार्थना है कि ये चाहे कितना भी आग्रह करें आप इन्हें संन्यास-दीक्षा कभी न दें।

उन सब लोगों की बातें सुनकर भारती जी ने बड़े ही दु:ख के साथ विवशता-सी प्रकट करते हुए कहा- ‘भाइयो! तुमने जितनी बातें कही हैं, वे सब मुझे पहले से ही मालूम हैं। मैं स्वयं इन्हें संन्यास देने के पक्ष में नहीं हूँ और न मैं अपनी राजी से इन्हें दीक्षा दे रहा हूँ। एक तो इनकी इच्छा को टाल देने की मुझमें सामर्थ्‍य नहीं। दूसरे इन्हें कोई धर्म का तत्त्व समझा ही नहीं सकता। ये स्वयं बड़े भारी पण्डित हैं, यदि कोई मूर्ख होता, तो आप लोग सन्देह भी कर सकते थे कि मैंने बहका दिया हो। ये धर्माधर्म के तत्त्व को भलीभाँति जानते हैं।

गृहस्थी में रहते हुए भी वर्णाश्रम-धर्म का पालन करते हुए ये वेदों में बताये हुए कर्मों के द्वारा अपने धर्म का आचरण कर सकते हैं। किन्तु अब तो ये महात्याग की दीक्षा के ही लिये तुले हुए हैं! मेरी शक्ति के बाहर की बात है। हाँ, आप लोग स्वयं इन्हें समझावें, यदि ये आप लोगों की बात मानकर घर लौटने को राजी हो जायंगे तो मुझे बड़ी भारी प्रसन्नता होगी। आप लोग इस बात को तो हृदय से निकाल ही दीजिये कि मैं स्वयं इन्हें दीक्षा दे रहा हूँ। यह देखो, इनके सामने जो ये आचार्य बैठे हुए हैं ये इनके पिता के समान सगे मौसा होते हैं, जब ये ही इन्हें न समझा सके और उलटे इनके आज्ञानुसार सभी संन्यास के कर्मों को कराने के लिये तैयार बैठे हैं तो फिर मेरी-तुम्हारी तो सामर्थ्‍य ही क्या है?’
भारती जी के मुख से ऐसी युक्ति युक्त बातें सुनकर सभी प्रभु के मुख की ओर कातर-दृष्टि से निहारने लगे। बहुत-से पुरुष तो प्रभु की ऐसी दशा देखकर रो रहे थे। प्रभु ने उस सभी ग्रामवासियों को अपने स्नेह के कारण दु:खी देखकर बड़ी ही कातर वाणी में कहा- ‘भाइयो! आप मेरे आत्मीय हैं, सखा हैं, बन्धु हैं। आपका मेरे ऊपर इतना अधिक स्नेह है, यह सोचकर मेरा हृदय गद्गद हो उठा है। आप लोग जो कह रहे हैं, उन सभी बातों को मैं स्वयं समझ रहा हूं, किन्तु भाइयो! मैं मजबूर हूँ, मैं अब अपने वश में नहीं हूँ। श्रीकृष्‍ण मुझे पकड़कर ले आये हैं। आप सभी भाई ऐसा आशीर्वाद दीजिये कि मैं अपने प्यारे श्रीकृष्‍ण को पा सकूं। मैं वृन्दावन में जाऊंगा, व्रजवासियों के घरों से टुकडे़ मांगकर खाऊंगा। वृन्दावन के बाहर कदम्ब के वृक्षों के नीचे वास करूंगा। यमुना जी का सुन्दर श्‍याम रंगवाला स्वच्छ जल पीऊंगा और अहर्निश श्रीकृष्‍ण के सुमधुर नामों का संकीर्तन करूंगा। जब तक मेरे प्राणप्यारे श्रीकृष्‍ण न मिलेंगे तब तक मैं सुखी नहीं हो सकता। मुझे शान्ति नहीं मिल सकती। श्रीकृष्‍ण-विरह में मेरा हृदय जल रहा है, वह श्रीकृष्‍ण के सुन्दर, शीतल सम्मिलन मुख से ही शान्त हो सकेगा। आप सभी एक बार हृदय से मुझे आशीर्वाद दें।’ यह कहते-कहते प्रभु जोरों से भगवान के नामों का उच्चारण करते-करते बड़े ही करूण-स्वर से क्रन्दन करने लगे। सभी मनुष्‍य मन्त्रमुग्ध-से बन गये। आगे और किसी को कुछ कहने का साहस ही नहीं हुआ।

जब लोगों ने देखा कि महाप्रभु किसी प्रकार भी बिना संन्यास लिये नहीं मानेंगे, तो सभी ने उनके इस शुभ काम में सहायता करने का निश्‍चय किया। भारती जी से पूछकर कोई तो आस-पास के संन्यासियों को बुलाने चला गया। कोई पूजन की साम्रगी के ही लिये दौड़ा गया। कोई जल्दी से केला और आम्रपल्लव ही ले आया। कोई दूध की हांड़ी ही उठा लाया। कोई बहुत-सी मिठाई ही ले आया। इस प्रकार बात-की-बात में ही भारती जी का सम्पूर्ण आश्रम खाद्य पदार्थों से तथा पूजन की साम्रगी से भर गया। जिसके घर में जो भी चीज थी वह उसी को लेकर आश्रम पर आ पहुँचा। एक ओर हलवाई भण्‍डार के लिये भोज्य पदार्थ बनाने लगा और दूसरी ओर संन्यासी और पण्डित मिलकर संन्यास की दीक्षा के निमित्त वेदी आदि बनाने लगे।आश्रम के सामने आम्र के सुन्दर बगीचे में हवन की वेदियाँ बनायी गयीं। वे रोली, हल्दी, चूना तथा लाल, पीले, हरे आदि विविध प्रकार के रंगों से चित्रित की गयीं। स्थान-स्थान पर कदलीस्तम्भ गाडे़ गये। प्रभु ने सभी कर्म करने के निमित्त पं० चन्द्रशेखर आचार्यरत्न को अपना प्रतिनिधि बनाया। आचार्यरत्न ने डबडबाई आँखों से बड़े ही कष्ट के साथ विवश होकर प्रभु की इस कठोर आज्ञा का भी पालन किया। महाप्रभु ने गंगाजी में स्नान करके पहले देवता और ऋषियों को तृप्त किया, फिर अपने पितरों को शास्त्र-मर्यादा के अनुसार श्राद्ध-तर्पणद्वार सन्तुष्‍ट किया। प्रभु ने प्रत्यक्ष देखा‍ कि पितृलोक से उनके पिता-पितामह आदि पूर्वजों ने स्वयं आकर उनके दिये हुए पिण्‍डों को ग्रहण किया और प्रसन्नता प्रकट करते हुए उन्हें आशीर्वाद दिया।

वेदी के चारों ओर सुन्दर-सुन्दर अनेकों याग-वृक्षों की समिधाएँ, भाँति-भाँति के सुगन्धित पुष्‍प, मालाएँ, अक्षत, धूप, नैवेद्य, पूगीफल, नारिकेल, ताम्बूल, कई प्रकार के मेवे, तिल, जौ, चावल, घृत आदि हवन की सामग्रीथी।
क्रमशः

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