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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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कुश, दूर्वा, घट, सकोरे आदि सभी सामान फैले हुए रखे थे। वेदी को घेरे हुए बहुत-से ॠत्विज ब्राह्मण और संन्यासी बैठे हुए थे, इतने में ही एक आदमी हरिदास नाम के नापित को साथ लिये हुए आश्रम पर आ पहुँचा। हरिदास को देखते ही भारती जी जल्दी से कहने लगे- ‘बड़ा अतिकाल हो गया है, अभी बहुत-सा कृत्य शेष है, आप जल्दी से क्षौर करा लीजिये।’
प्रभु वेदी के निकट से उठकर एक ओर चटाई पर क्षौर कराने के लिये बैठे। हरिदास नापित भी पास में ही अपनी पेटी को रखकर बैठ गया। हरिदास वैसे तो जाति का नापित था, किन्तु उसका कटवा ग्राम में बड़ा भारी प्रभाव था। वह पहले से ही भगवद्भक्त था और सभी नाइयों का पंच था। नाइयों की बड़ी-बड़ी पंचायतों में उसे ही निर्णय करने के लिये बुलाया जाता और सभी लोग उसकी बातों को मानते थे।

नापित ने पहले तो एक बार सजे हुए सम्पूर्ण आश्रम की ओर देखा। फिर संन्यासी और ब्राह्मणों से घिरी हुई वेदी की ओर उसने दृष्टि डाली और फिर बड़े ही ध्‍यान से महाप्रभु के मुख-कमल की ओर निहारने लगा। महाप्रभु के दर्शन से उसकी तृप्ति ही नहीं होती थी, वह ज्यों-ज्यों प्रभु की मनोहर मूर्ति को देखता त्यों-ही-त्यों उसका हृदय प्रभु की ओर अत्यधिक आ‍कर्षित होता जाता था। थोड़ी देर तक वह इसी प्रकार टकटकी लगाये अविचल भाव से प्रभु के श्रीमुख की ओर निहारता रहा। तब प्रभु ने देखा यह तो काठ की मूर्ति ही बन गया तब आप उसे सम्बोधन करके बोले- ‘भाई! देर क्यों करते हो? विलम्ब हो रहा है। जल्दी कार्य करो।’
नापित ने कुछ अन्यमनस्कभाव से कहा- ‘क्या करूँ महाराज? 
प्रभु ने कहा- ‘क्षौर करो और क्या करते, इसीलिये तो तुम्हें बुलाया है?’
नापित ने कहा- ‘आपके बाल तो बहुत बड़े-बड़े़ हैं, मालूम पड़ता है आप तो बालों को बनवाते ही नहीं।’
प्रभु ने कहा- ‘यह तो ठीक है, किन्तु संन्यास के समय सम्पूर्ण बालों को बनवाने का शास्त्रीय विधान है।’
नापित ने कहा- ‘तो महाराज जी! साफ बात है, आप चाहे बुरा मानिये या भला। मुझसे यह निर्दय काम कभी न होगा। आप आज्ञा करें तो मैं अपने छुरे से अपने प्रिय पुत्र का वध कर सकता हूँ; किन्तु इन काले-काले घुंघराले बालों को काटने की मुझमें सामर्थ्‍य नहीं। प्रभो! इन रेशम-से लच्छेदार केशों के ऊपर मेरा छूरा नहीं चलेगा। वह फिसल जायगा। यह काम मेरी शक्ति से बाहर है। कटवा ग्राम में और भी बहुत-से नाई रहते हैं, उनमें से किसी को बुला लीजिये। मुझसे इस काम की स्वप्न में भी आशा न रखिये।’
प्रभु ने अधीरता प्रकट करते हुए कहा- ‘हरिदास! तुम मेरे इस शुभ कार्य में रोडे़ मत अटकाओ। मैं श्रीकृष्‍ण से मिलने के लिये व्याकुल हो रहा हूँ, तुम मेरे इस काम में सहायक बनकर अक्षय सुख के भागी बनो।मेरे इस काम में सहायता करने से तुम्हारा कल्याण होगा। भगवान तुम्हें यथेच्छ धन-सम्पत्ति प्रदान करेंगे और मेरे आशीर्वाद से तुम सदा सुखी बने रहोगे।’
हरिदास नापित ने सूखी हंसी हंसकर कहा- ‘धन तो मेरे है नहीं, सन्तान चाहे मेरी आज ही मर जायँ और मेरे सम्पूर्ण शरीर में चाहे गलित कुष्‍ठ ही क्यों न हो जाय, प्रभो! मुझसे यह काम नहीं होने का। धन, सम्पत्ति और स्वर्ग का लोभ देकर आप किसी और को बह‍का सकते हैं, मुझे इनकी इच्छा नहीं। आप नगर से दूसरा नापित बुला क्यों नहीं लेते?’

प्रभु ने कहा- ‘हरिदास! बिना मुण्‍डन-संस्कार के संन्यास-कर्म सम्पन्न ही नहीं हो सकता। संन्यास-कर्म में तुम्हीं तो एक प्रधान साक्षी हो। तुम मुझ दीन-हीन-दु:खी कंगाल पर दया क्यों नहीं करते? मेरे प्राण श्रीकृष्‍ण के लिये तड़प रहे हैं। तुम इस प्रकार मुझे निराश कर रहे हो। भैया! देखो, मैं अपनी धर्मपत्नी से अनूमति ले आया हूँ, मेरी माता ने मुझे संन्यासी होने की आज्ञा दे दी है। मेरे पितृतुल्य पूज्य मौसा आचार्यरत्न स्वयं अपने हाथों से संन्यास के कृत्य करा रहे हैं। पूज्यपाद गुरुवर भारती जी ने भी मेरी प्रार्थना स्वीकार कर ली है। अब तुम क्यों मेरे इस शुभ कार्य में विघ्‍न उपस्थित करते हो? तुम मुझे संन्यासी होने से क्यों रोकते हो?’
नापित ने कहा- ‘प्रभो! मैं आपको कब रोकता हूँ। आप भले ही संन्यासी बन जाइये, किन्तु मेरा कथन इतना ही है, कि मुझसे यह पाप-कर्म नहीं हो सकता। किसी दूसरे नापित से आप करा सकते हैं।’
प्रभु ने कहा- ‘यह बात नहीं है। हरिदास! यह काम तुम्हारे ही द्वारा होगा। तुम्हें जो भय हो उसे मुझसे कहो।’
आँखों में आंसू भरे हुए नापित ने कहा- ‘सबसे बड़ा भय तो मुझे इन इतने सुन्दर घुँघराले बालों को सिर से पृथक करने में ही हो रहा है। दूसरे मैं इसमें अपने धर्म की प्रत्यक्ष क्षति देख रहा हूँ। जिस छुरे से भी आपके पवित्र बालों का मुण्‍डन करूंगा, उसे ही फिर सर्वसाधारण लोगों के सिरों से कैसे छुवाऊंगा? जिस हाथ से आपके सिर का स्पर्श करूँगा, उससे फिर सब किसी की खोपड़ी नहीं छू सकता। बाल बनाकर ही मैं अपने परिवार का भरण-पोषण करता हूँ। फिर मेरा काम किस प्रकार चलेगा?’

प्रभु ने कहा- ‘हरिदास! तुम आज से इस नापितपने के कार्य को छोड़कर और कोई दूसरा छोटा-मोटा रोजगार कर लेना। मेरे इस संन्यास के प्रधान कार्य में तुम्हें ही सहायक बनना पड़ेगा।’
अब त‍क तो नापित अपने-आपको रोके हुए था; किन्तु अब उससे नहीं रहा गया। वह जोरों के साथ रुदन करने लगा। रोते-रोते वह कहने लगा- ‘प्रभो! आप यह तो मेरी गर्दन पर छूरी चला रहे हैं। हाय! इन सुन्दर केशों को मैं आपके सिर से किस प्रकार अलग कर सकूँगा? प्रभो! मुझे क्षमा कीजिये, मैं इस काम को करने में एक दम असम‍र्थ हूँ।’
प्रभु ने जब देखा कि यह तो किसी भी तरह से राजी नहीं होता, तब उन्होंने अपने ऐश्‍वर्य से काम लिया और उसे क्षौर करने के लिये आज्ञा देते हुए कहा- ‘हरिदास! अब देर करने का काम नहीं है, जल्दी से क्षौर करो।’
हरिदास अब विवश था, उसने कांपते हुए हाथों से प्रभु के चिकने और घुंघराले बालों को स्पर्श किया।
क्रमशः

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