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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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वह अश्रु बहाता जाता था और क्षौर करता जाता था। कभी क्षौर करते-करते ही रुक जाता और जोरों से भगवन्नामों का उच्चारण करता हुआ रोने लगता। जब प्रभु आग्रहपूर्वक उसे समझाते तब फिर करने लगता। थोड़ी देर पश्चात फिर उठाकर नृत्य करने लगता। इस प्रकार क्षौर करते-करते कभी गाता, कभी नाचता, कभी रोता और कभी हंसता। इस प्रकार कहीं सायंकाल तक वह महाप्रभु के क्षौर-कर्म को कर सका।क्षौर-कर्म समाप्त हो जाने पर प्रभु ने हरिदास नापित का प्रेम के सहित गाढा़लिंगन किया। प्रभु का आलिंगन पाते ही वह एकदम बेहोश होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा और बहुत देर तक वह चेतनाशून्य पुरुष की भाँति पड़ा रहा। थोड़ी देर में होश आने पर वह उठा और उसने क्षौर करने का अपना सभी सामान उसी समय कलिमलहारिणी भगवती भागीरथी के प्रवाह में प्रवाहित कर दिया और जोरों के साथ हरिध्वनि करने लगा।इस प्रकार थोड़ी देर ही प्रभु का संसर्ग होने से वह महाभागवत नापित सदा के लिये अमर बन गया। आज भी कटवा के निकट ‘मधुमोदक’ नाम से उन मुडे़ हुए केशों की और उस परम भाग्यशाली नापित की समाधियाँ लोगों को त्याग, वैराग्य और प्रेम का पाठ पढ़ती हुई उस हरिदास के अपूर्व अनुराग की घोषणा कर रही हैं। गौर-भक्त उन समाधियों के दर्शनों से अपने नेत्रों को सफल करते हैं और वहाँ की पावन धूलि को अपने मस्तक पर चढा़ते हुए उस घटना के स्मरण से रोते-रोते पछाड़ खाकर गिर पड़ते हैं। धन्य हैं। तभी तो कहा है-
पारस में अरू संत में, संत अधिक कर मान।
यह लोहा सुबरन करे, वह करे आप समान।
महाप्रभु गौरांग के गुणों के साथ हरिदास की अहैतु की भक्ति भी अमर हो गयी। गौर-भक्तों में हरिदास भी पूज्य बन गया।
संन्यास के मानी हैं अग्निमय जीवन। पिछले जीवन की सभी बातों का ज्ञानग्नि में जलाकर स्वयं अग्निमय बन जाना- यही इस महान व्रत का आदर्श है। संसार की एकदम उपेक्षा कर दो, जीवमात्र में मैत्री के भाव रखो और सम्पूर्ण संसारी सम्बन्धों और परिग्रहों का परित्याग करके भगवन्नामनिष्ठ होकर वैराग्यरागरसिक बन जाओ। संसारी सभी बातों को हृदय से निकालकर फेंक दो। सत्त्वगुण के स्वरूप सफेद वस्त्रों का भी परित्याग कर दो और रज, तम, सत्त्व से भी ऊपर उठकर त्रिगुणातीतबनकर महान सत्त्व में सदा स्थिर रहो। इसीलिये संन्यासी के वस्त्र अग्निवर्ण के होते हैं। क्योंकि उसने जीवित रहने पर भी यह शरीर अग्नि को सौंप दिया है, वह ‘नारायण’ के अतिरिक्त किसी दूसरे को देखता ही नहीं है। इसीलिये संन्यास के समय पूर्वाश्रम के नाम को भी त्याग देते हैं और गुरुदत्त महाप्रकाशरूपी नवीन नाम से इस शरीर का संकेत करते हैं। वास्तव में तो संन्यासी नामरुप से रहित ही बन जाता है।
महाप्रभु का क्षोर-कर्म समाप्त हुआ। अब वे शिखा सूत्रहीन हो गये। क्षौर हो जाने के पश्चात प्रभु ने सुरसरि के शीतल जल में घुसकर स्नान किया और वस्त्र बदले हुए वे वेदी के समीप आ गये। हाथ जोडे़ हुए अति दीनभाव से वे भारती जी के सम्मुख बैठ गये। भारती जी विजयाहवन आदि सभी संन्यासोचित कर्म कराकर प्रभु को मन्त्र-दीक्षा देने का विचार किया। हाथ जोडे़ हुए विनीतभाव से प्रभु ने संन्यास-मन्त्र ग्रहण करने की जिज्ञासा की। भारती जी ने इन्हें अपने समीप बैठ जाने के लिये कहा। गुरुदेव के आज्ञानुसार प्रभु उनके समीप बैठ गये।
मन्त्र देने में भारती जी कुछ आगा-पीछा-सा करने लगे। तब महाप्रभु ने उत्सुकता प्रकट होते हूए पूछा- ‘भगवन्! मैंने ऐसा सुना है कि संन्यास के मन्त्र को किसी के सामने कहना न चाहिये।’
भारती जी ने कहा- ‘हाँ, संन्यास-मन्त्र को शास्त्रों में परम गोप्य बताया गया है। गुरुजनों के अतिरिक्त उसे हर किसी के सामने प्रकाशित नहीं करते हैं।’
यह सुनकर प्रभु ने कहा- ‘मुझे आपसे एक बात निवेदन करनी है, किंतु वह गुप्त बात है, कान में ही कह सकूँगा।’
भारती जी ने अपना दायाँ कान प्रभु की ओर बढा़ते हुए कहा- ‘हाँ-हाँ, जरूर कहो। कौन-सी बात है?’
प्रभु अपना मुख भारती जी के कान के समीप ले गये और धीरे-धीरे कहने लगे- ‘एक दिन मैंने स्वप्न में एक ब्राह्मण को देखा था। वह भी संन्यासी ही थे और उनका रुप-रंग आपसे बहुत कुछ मिलता-जुलता था। स्वप्न में ही उन्होंने मुझे संन्यासी बनने का आदेश दिया और स्वयं उन्होंने मेरे कान में संन्यास-मन्त्र दिया। वह मन्त्र मुझे अभी तक ज्यों-का-त्यों याद है, आप उसे पहले सुन लें कि वह गलत है या ठीक।’ यह कहकर प्रभु ने भारती जी के कान में वही स्वप्न में प्राप्त मन्त्र पढ़ दिया। मानों उन्होंने प्रकारान्तर से भारती जी को पहले स्वयं अपना शिष्य बना लिया हो। प्रभु के मुख से यथावत शुद्ध-शुद्ध संन्यास-मन्त्र को सुनकर भारती जी को कुछ आश्चर्य-सा प्रकट करते हुए प्रेम में गद्गद-कण्ठ से कहने लगे- ‘जब तुम्हें श्रीकृष्ण-प्रेम प्राप्त है, तब फिर तुम्हारे लिये अगम्य विषय ही कौन-सा रह जाता है?’ कृष्ण-प्रेम ही तो सार है, जप-तप, पूजा-पाठ, वानप्रस्थ, संन्यस्त आदि धर्म सभी उसी की प्राप्ति के लिये होते हैं। जिसे कृष्ण-प्रेम की प्राप्ति हो चुकी, उसके लिये मन्त्र ग्रहण करना, दीक्षा आदि लेना केवल लोकशिक्षणार्थ है। तुम तो मर्यादारक्षा के लिये संन्यास ले रहे हो इस बात को मैं खूब जानता हूँ।
कृष्ण-कीर्तन तो तुम घर में भी रहकर कर सकते थे, किंतु यह दिखाने के लिये कि गृहस्थ में रहते हुए लौकिक तथा वैदिक कर्मों को, जिनका कि वेदशास्त्रों में गृहस्थी के लिये विधान बताया गया है, अवश्य ही करते रहना चाहिये। तुम्हारे द्वारा अब वे स्मृतियों में कहे हुए धर्म नहीं हो सकते। इसीलिये तुम संन्यास-धर्म का अनुसरण कर रहे हो। ‘जब तक ज्ञान में पूर्ण निष्ठा न हो, जब तक भगवत-गुणों में भलीभाँति रति न हो, तब तक स्मृतियों में ऋषियों के बताये हुए धर्मों का अवश्य ही पालन करते रहना चाहिये। इसलिये गृहस्थी में रहकर तुमने वैदिक कर्मों का यथावत पालन किया और अब कर्म-परित्याग के साथ ही पूर्व आश्रम का परित्याग कर रहे हो और संन्यास-धर्म के अनुसार सदा दण्ड धारण करके संन्यास-धर्म की कठोरता को प्रदर्शित करोगे।
क्रमशः
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