cc 174

श्री श्री चैतन्य चरितावली 
174-

तुम्हारे वे सभी काम लोक-शिक्षार्थ ही है।’
इस प्रकार प्रभु की भाँति-भाँति से स्तुति करके भारती जी उन्हें मन्त्र-दीक्षा देने के लिये तैयार हुए। एक छोटे-से वस्त्र की आड़ करके भारती जी ने प्रभु के कान में संन्यास-मन्त्र कह दिया। बस, उस मन्त्र के सुनते ही प्रभु बेहोश होकर पृथ्‍वी पर गिर पड़े और ‘‍हा कृष्‍ण! हा कृष्‍ण!!’ इस प्रकार जोरों से चिल्ला-चिल्लाकर क्रन्दन करने लगे। पास ही में बैठे हुए नित्यानन्द जी ने उन्हें संभाला और होश में लाने की चेष्‍टा की।
भारती जी ने प्रभु के सभी पुराने श्‍वेत वस्त्र उतारवा दिये थे और उन्हें अग्निवर्ण के काषाय-वस्त्र पहनने के लिये दिये। एक बर्हिवास (ओढ़ने का वस्त्र), दो कौपी नें एक भिक्षा मांगने को वस्त्र, एक कन्था और एक कटिवस्त्र- इतने कपड़े भारती जी ने प्रभु के लिये दिये। रक्त-वर्ण के उन चमकीले वस्त्रों को पहनकर प्रभु की उस समय ऐसी शोभा हुई मानो शरत्काल में सबके मन को हरने वाले, शीत से दु:खी हुए लोगों के दु:ख को दूर करते हुए अरुण रंग के बाल-सूर्य आकाश में उदित हुए हों।

सुवर्ण-वर्ण के उनके शरीर पर काषाय-रंग के वस्त्र बड़े ही भले मालूम पड़ते थे। कंधे पर कन्था पड़ा हुआ था, छोटा वस्त्र सिर से बंधा हुआ था। एक हाथ में काठ का कमण्‍डलु शोभा दे रहा था, दूसरे हाथ से अपने संन्यास-दण्‍ड को लिये हुए थे और मुख से ‘श्री कृष्‍ण-श्रीकृष्‍ण’ इस प्रकार कहते हुए अश्रु बहाते हुए खडे़ थे। प्रभु के इस त्रैलोक्य-पावन सुन्दर स्वरूप को देखकर सभी उपस्थित दर्शकवृन्द अवाक-से हो गये। उस समय सब-के-सब काठ की मूर्ति बने हुए बैठे थे। प्रभु के अद्भुत रूप-लावण्‍ययुक्त श्रीविग्रह को देखकर सबका मन अपने-आप ही प्रेमानन्द में विभोर होकर नृत्य कर रहा था। सभी की आँखों से प्रेम के अश्रु निकल रहे थे। प्रभु कुछ थोडे़ झुककर खडे़ हुए थे। भारती जी सामने ही एक उच्चासन पर स्थिर भाव से गम्भीरतापूर्वक बैठे हुए थे।

उस समय यदि कोई जोरों से सांस भी लेता तो वह भी सुनायी पड़ता। मानो उस समय पक्षियों ने भी बोलना बंद कर दिया हो और पवन भी रुककर प्रभु की अद्भुत शोभा के वशीभूत होकर उनके रूप लावण्‍यरूपी रस का पान कर रहा हो।
उस समय भारती जी महाप्रभु के संन्यास के नाम के सम्बन्ध में सोच रहे थे। वे प्रभु की प्रकृति के अनुसार अपने परमप्रिय शिष्‍य का सार्थक नाम रखना चाहते थे। उन्हें कोई सुन्दर-सा नाम सूझता ही नहीं था। उसी समय मानो साक्षात सरस्वती देवी ने उन्हें उनके इस काम में सहायता दी। सरस्वती ने उन्हें सुझाया कि इन्होंने श्रीकृष्‍णभक्ति-विहीन जीवों को चैतन्यता प्रदान की है। जिस जीवन में श्रीकृष्‍ण-भक्ति नहीं वह जीवन अचेतन है। इन्होंने भगवन्नाम द्वारा अचेतन प्राणियों को चेतन बनाया है, अत: इनका नाम ‘श्रीकृष्‍ण-चैतन्य भारती’ ठीक रहेगा।

भारती जी को बड़ी प्रसन्नता हुई। वे उस नीरवता को भंग करते हुए सब लोगों को सुनाकर कहने लगे- इन्होंने श्रीकृष्‍ण के सुमधुर नामों द्वारा लोगों में चैतन्यता का संचार किया है और आगे भी करेंगे, अत: आज से इनका नाम ‘श्रीकृष्‍ण-चैतन्य’ हुआ। भारती हमारी गुरुपरम्परा की संज्ञा है, अत: संन्यासियों में ये दण्‍डी स्वामी ‘श्रीकृष्‍ण-चैतन्य भारती’ कहे जायंगे।’
इतना सुनते ही प्रभु भावावेश में आकर यह कहते हुए कि ‘मैं तो अपने प्यारे श्रीकृष्‍ण से मिलने के लिये वृन्दावन जाऊँगा’ दूसरी ओर भागने लगे। उस समय भागने के कारण हिलता हुआ काषाय-वस्त्र की ध्‍वजावाला दण्‍ड और काले रंग का कमण्‍डलू प्रभु के हाथों में बड़ा ही भला मालूम पड़ता था। प्रभु जोरों से ‘हरि-हरि’ पुकारते हुए भागने लगे। यह देखकर बहुत-से लोगों ने आगे जाकर प्रभु का मार्ग रोक दिया। सामने अपने रास्ते में लोगों को खड़ा हुआ देखकर प्रभु रोते-रोते कहने लगे- ‘भाइयो! तुम मुझे श्रीवृन्दावन का रास्ता बता दो। मैं अपने प्यारे श्रीकृष्‍ण के दर्शनों के लिये बहुत ही अधिक व्याकुल हो रहा हूँ। मुझे जब तक श्रीकृष्‍ण के दर्शन न होंगे तब तक शान्ति नहीं मिलेगी। तुम सभी भाई मेरा रास्ता छोड़ दो और मुझे ऐसा आशीर्वाद दो कि मैं अपने प्राण-प्यारे प्रियतम को पा सकूं।’

नित्यानन्द जी ने कहा- ‘प्रभो! आप पहले अपने पूज्य गुरुदेव के चरणों में प्रणाम तो कर आइये। फिर वे जिस प्रकार की आज्ञा करें वही कीजियेगा। बिना गुरु की आज्ञा लिये कहीं जाना ठीक नहीं है।’ इतना सुनते ही प्रभु कुछ सोचने लगे और बिना ही कुछ उत्तर दिये चुपचाप आश्रम की ओर लौट पड़े। और सब लोग भी प्रभु के पीछे-पीछे चले। आश्रम में पहुँचकर प्रभु ने दण्‍डी संन्यासी की विधि के अनुसार अपने गुरुदेव के चरणों में साष्‍टांग प्रणाम किया और भारती महाराज का आदेश पाकर उन्होंने उस रात्रि में वहीं गुरु-सेवा करते हुए निवास किया। संकीर्तन का रंग आज कल से भी बढ़कर रहा। इस प्रकार प्रभु संन्यास ग्रहण करके लोक शिक्षा के निमित्त गुरु-सेवा के माहात्म्य दिखाने लगे। प्रभु की व‍ह रात्रि भी श्रीकृष्‍ण-कीर्तन और भागवत-चरित्रों के चिन्तन में व्यतीत हुई।

राढ़-देश में उन्मत्त-भ्रमण……

निशा का अन्त हुआ, पूर्व-दिशा में अरुणोदय की लालिमा छा गयी, मानो प्रभु के लाल वस्त्रों का प्रतिबिम्ब पूर्व-दिशा में पड़ गया हो। भगवान भुवन-भास्कर नवीन संन्यासी, श्रीकृष्ण-चैतन्य के दर्शनों को उतावले-से प्रतीत होने लगे। वे आकाश में द्रुतगति से गमन कर रहे थे। नित्य-कर्म से निवृत्त होकर प्रभु ने अपने गुरुदेव के चरणों में प्रणाम किया और उनसे वृन्दावन जाने की आज्ञामांगी। प्रेम में पागल हुए संन्यासी प्रवर भारती महाराज अपने नवीन शिष्‍य के वियोग-दु:ख को स्मरण करके बड़े ही दु:खी हुए, उनकी दोनों आँखों में आंसू भर आये। आँसुओ को पोंछते हुए भारती जी ने कहा- ‘कृष्‍ण-चैतन्य! मैं समझता था, कुछ काल तुम्हारी संगति में रहकर मैं भी श्रीकृष्‍ण-प्रेम-रसामृत का पान कर सकूँगा, किन्तु तुम आज ही अन्यत्र जाने की तैयारियाँ कर रहे हो, इससे मेरा हृदय विदीर्ण हुआ जाता है। यद्यपि मैं गृहत्यागी वीतरागी संन्यासी कहलाता हूँ, तो भी न जाने क्यों तुम्हारी विछोह से मेरा दिल धड़क रहा है।
क्रमशः

Comments

Popular posts from this blog

cc 201

362

cc 90