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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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प्रात:काल प्रभु ने नित्यानन्द जी से कहा- ‘श्रीपाद! आप नवद्वीप में जाकर शचीमाता को और अन्यान्य भक्तों को सूचित कर दें कि मैं यहाँ आ गया हूँ।
आप नवद्वीप जायँ, तब तक हम अद्वैताचार्य जी के दर्शनों के लिये शान्तिपुर चलते हैं। वहीं सबसे भेंट करेंगे। आप शीघ्र जाइये। विलम्ब करने से काम न चलेगा।’ प्रभु की आज्ञा शिरोधार्य करके नित्यानन्द जी तो गंगा पार करके नवद्वीप की ओर गये और प्रभु गंगा जी के किनारे-किनारे शान्तिपुर के इस पार हरिदास जी के आश्रम में फुलिया नामक ग्राम में आकर ठहर गये।
शान्तिपुर में अद्वैताचार्य के घर ….
इधर महाप्रभु से विदा होकर दु:खित हुए चन्द्रशेखर आचार्य नवद्वीप की ओर चले। उनके पैर आगे नहीं पड़ते थे, कभी तो वे रोने लगते, कभी पीछे फिरकर देखने लगते कि सम्भव है, प्रभु दया करके हमारे पीछे-पीछे आ रहे हों। कभी भ्रमवश होकर आप-ही-आप कहने लगते- ‘प्रभो! आप आ गये अच्छा हुआ।’ फिर थोड़ी देर में अपने भ्रम को दूर करने के निमित्त चारों ओर देखने लगते। थोड़ी दूर चलकर बैठ जाते और सोचने लगते- ‘अब मेरे जीवन को धिक्कार है।
प्रभु के बिना अब मैं नवद्वीप में कैसे रह सकूँगा? अब मैं अकेला ही लौटकर नवद्वीप कैसे जाऊँ? पुत्र-वियोग से दु:खी वृद्धा शचीमाता जब मुझसे आकर पूछेगी कि मेरे लाल को, मेरे प्राणप्यारे पुत्र को, मेरी वृद्धावस्था के एकमात्र सहारे को, मेरी आँख के तारे को, मेरे दुलारे निमाई को तुम कहाँ छोड़ आये?’ तब मैं उस दु:खिनी माता का क्या उत्तर दूंगा? जब भक्त चारों ओर से मुझे घेरकर पूछेंगे- ‘प्रभु कहाँ हैं? वे कितनी दूर हैं, कब तक आ जायंगे?’ तब इन हृदय को विदीर्ण करने वाले प्रश्नों का मैं क्या उत्तर दूँगा। क्या मैं उनसे यह कह दूँगा कि ‘प्रभु अब लौटकर नहीं आवेंगे, वे तो वृन्दावन को चले गये? हाय! ऐसी कठिन बात मेरे मुख से किस प्रकार निकल सकेगी? यदि वज्र का हृदय बनाकर मैं इस बात को प्रकट भी कर दूँ, तो निश्चय ही बहूत-से भक्तों के प्राणपखेरू तो उसी समय प्रभु के समीप ही प्रस्थान कर जायंगे। भक्तों के बहुत-से प्राणरहित शरीर ही मेरे सामने पड़े रह जायंगे।
उस समय मेरे प्राण किस प्रकार शरीर में कैसे रह सकते हैं? खैर, इन सब बातों को तो मेरा वज्र हृदय सहन भी कर सकता हैं, किंतु उस पतिपरायणा पतिव्रता विष्णुप्रिया के करुण-क्रन्दन से तो पत्थर भी पिघलने लगेंगे। जब वह मेरे लौट आने का समाचार सुनेगी, तो अपने हृदय-विदारक रुदन से दिशा-विदिशाओं को व्याकुल करती हुई, पति के सम्बन्ध में जिज्ञासा करती हुई एक ओर खड़ी होकर रुदन करने लगेगी तब तो निश्चय ही मैं अपने को संभालने में समर्थ न हो सकूँगा। सभी लोग मुझे धिक्कार देंगे, सभी मेरे काम की निन्दा करेंगे। जब उन्हें पता चलेगा, कि प्रभु के संन्यास-सम्बन्धी सभी कृत्य मैंने ही अपने हाथ से कराये हैं, जब उन्हें यह बात विदित होगी कि मैंने ही प्रभु को संन्यासी बनाया है तो वे सभी मिलकर मुझे भाँति-भाँति से धिक्कारेंगे।’
उन सभी प्रभु के भक्तों के दिये हुए अभिशाप को मैं किस प्रकार सहन कर सकूँगा। इससे तो यही उत्तम है कि मैं गंगा जी में कूदकर अपने प्राणों को गँवा दूँ। यह सोचकर वे जल्दी से गंगा-किनारे पहुँचे और गंगा जी में कूदने के लिये उद्यत हुए। उसी समय उन्हें प्रभु की बातों का स्मरण हो आया। ‘प्रभु ने माता के लिये और भक्तों के लिये बहुत-बहुत करके प्रेम-संदेश भेजा है, उनके संदेश को न पहुँचाने से मुझे पाप लगेगा। मैं प्रभु के सम्मुख कृतघ्न कहलाऊँगा। कौन जाने प्रभु लौटकर आते ही हों। मेरी दायीं भुजा फड़क रही है। दायीं आँख लहक रही है, इससे मेरे हृदय में इस बात का विश्वास-सा हो रहा है कि प्रभु अवश्य लौटकर आयेंगे और वे भक्तों ये मिलकर ही जहाँ जाना चाहेंगे जायँगे।’ इन विचारों के मन में आते ही उन्होंने गंगा जी में कूदकर आत्माघात करने का अपना विचार त्याग दिया और वहीं गंगा जी की रेती में प्रभु का चिन्तन करते हुए बैठ गये। उन्होंने मन में स्थिर किया कि ‘खूब रात्रि होने पर घर जाऊँगा। तब तक सब लोग सो जायंगे और मैं चुपके से अपने घर में जाकर छिप रहूँगा।
मेरे नवद्वीप आने का किसी को पता ही न चलेगा।’ इसीलिये गंगा जी की बालुका में अकेले बैठे-ही-बैठे उन्होंने सम्पूर्ण दिन बिता दिया। खूब अन्धकार होने पर वे गंगा जी के पार हुए और लोगों से आँख बचाकर अपने घर पहुँचे। घर पहुँचते ही नगर भर में इनके लौट आने का समाचार बात-की-बात में बिजली की तरह फैल गया। जो भी सुनता वही इनके पास दौड़ा आता और आते ही प्रभु के सम्बन्ध में पूछता। ये सबको धैर्य बताते हुए कहते- ‘हाँ, प्रभु शीघ्र ही लौट कर आयेंगे।’ इतने में ही पुत्र के समाचारों के लिये उत्सुक हुई वृद्धा माता अपनी पुत्रवधू को साथ लिये हुए आचार्यरत्न के घर आ पहुँची। जिस दिन से उनका प्यारा निमाई घर छोड़कर गया है, उसी दिन से माता के अपने मुख में अन्न का दाना तक नहीं दिया है। उसकी दोनों आँखें निरन्तर रोते रहने के कारण सूज गयी हैं, गला बैठ गया है, सम्पूर्ण शरीर शक्तिहीन हो गया है, उठकर बैठने की भी शक्ति नहीं रही है; किन्तु चन्द्रशेखर आचार्य के आगमन का समाचार सुनते ही न जाने माता के शरीर में कहाँ से बल आ गया, वह दौड़ी हुई आचार्य के घर आयी। विष्णुप्रिया जी भी उसका वस्त्र पकडे़ पीछे-पीछे रोती हुई आ रही थीं।माता को आते देखकर आचार्य सम्भ्रक के सहित एकदम खडे़ हो गये। चारों ओर से भक्तों ने आप-से-आप माता के लिये रास्ता छोड़ दिया। माता ने आते ही चन्द्रशेखर को स्पर्श करना चाहा, किन्तु अपने शोक के आवेग को न सह सकने के कारण बीच में ही ‘हा निमाई!’ ऐसी कहती हुई पृथ्वी पर गिर पड़ी! जल्दी से आचार्यरत्न ने बढ़कर वृद्धा माता को संभाला, विष्णुप्रिया जी भी सास के चरणों के समीप बैठकर रुदन करने लगीं।
उस समय का दृश्य बड़ा ही करुणापूर्ण था।
क्रमशः
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