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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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माता की ऐसी दशा देखकर सभी उपस्थित भक्त ढाह मार-मारकर रोने लगे। चन्द्रशेखर आचार्य का घर क्रन्दन की वेदनापूर्ण ध्वनि से गूँजने लगा। माता के मुख में से दूसरा कोई शब्द ही नहीं निकलता था, ‘हा निमाई! मेरे निमाई!’ बस, यही कहकर वह रुदन कर रही थी। बहुत देर इसी प्रकार रुदन करते रहने के अनन्तर भर्रायी हुई आवाज से माता ने रोते-रोते पूछा- ‘आचार्य! मेरे निमाई को कहाँ छोड़ आये? क्या वह सचमुच संन्यासी बन गया? आचार्य! तुम मुझे सच-सच बता दो, क्या उस मेरे दुलारे के वे कन्धों तक लटकने वाले काले-काले सुन्दर घुंघराले बाल सिर से पृथक् हो गये? क्या किसी निर्दयी नापित ने उन्हें छूरे की तीक्ष्ण धार से काट दिया? क्या मेरा सुकुमार निमाई भिखारी बन गया? क्या वह अब मांगकर खाने लगा? आचार्य! मुझ दु:खिनी अबला पर दया करके बता दो मेरा निमाई क्या अब न आवेगा? क्या अब मैं अपने हाथ से दात-भात बनाकर उस न खिला सकूँगी? क्या अब भूख लगने पर वह मुझसे बालाकों की भाँति भोजन के लिये आग्रह न करेगा? क्या अब वह मेरे कलेजे का टुकड़ा मुझसे अलग ही रहेगा?
क्या अब उसे अपनी छाती से चिपटाकर अपने तन की तपन मिटा सकूंगी? क्या अब मैं उसके सुगन्धित बालों वाले मस्तक को सूंघकर सुखी न बन सकूँगी? आचार्य! तुम बताते क्यों नहीं? तुम्हें मुझ कंगालिनी पर दया क्यों नहीं आती? तुम मौन क्यों हो रहे हो? मेरे प्रश्नों को उत्तर क्यों नहीं देते?’
आचार्य माता के इतने प्रश्नों को भी सुनकर मौन ही बने बैठे रहे। केवल वे आँखों से अश्रु बहा रहे थे। आचार्य को इस प्रकार रोते देखकर माता समझ गयी’ कि मेरे निमाई ने जरूर संन्यास ले लिया। इसलिये वह अधीरता प्रकट करती हुई कहने लगी-‘आचार्य! तुम मेरे निमाई का पता मूझे बता तो। वह जहाँ भी कहीं होगा, वहाँ मैं जाऊँगी। वह चाहे कैसा भी संन्यासी क्यों न बन गया हो, है तो मेरा पुत्र ही! मैं उसके साथ-साथ रहूंगी, जिस प्रकार अपने बछड़े के पीछे-पीछे दुबली और वृद्धा गौ रंभाती हुई चलती है, उसी प्रकार मैं निमाई के पीछे-पीछे चलूंगी।आचार्य! मैं निमाई के बिना जीवित नहीं रह सकती। तुम मेरे ऊपर इतनी कृपा करो, मेरा निमाई जहाँ भी हो, वहीं मुझे ले जाकर उसके पास पहुँचा दो। आह! अब वह घर-घर से भात के दाने मांगकर खाता होगा? कोई मेरी-जैसी ही वृद्धा दया करके थोड़ा भात दे देती होगी। कोई-कोई दुत्कार भी देती होगी। कोई-कोई बासी और सूखा भात ही उसकी झोली में डाल देती होगी। यहाँ तो जब तक वह दो-चार मेरे हाथ के बने नहीं खा लेता था, तब तक उसका पेट ही नहीं भरता था। अब उस सूखे और बासी भात को वह किस प्रकार खा सकेगा? वह भूख का बड़ा कच्चा है। तीसरे पहर के जलपान में थोड़ी भी देर हो जाती या कभी घर की बनी मिठाई चुक जाती तो जमीन-आसमान एक कर डालता था। पकौड़ी बनाते-बनाते ही खाने को आ बैठता था, अब उसे तीसरे पहर कौन जलपान करायेगा? हा! मेरे ऐसे जीवन को धिक्कार है? हा! मेरा सर्वगुण सम्पन्न पुत्र! जिसकी भक्त राजा से भी बढ़कर पूजा और प्रतिष्ठा करते थे, वह द्वार-द्वार एक मुट्ठी चावल के लिये घूम रहा होगा। विधाता! तेरे ऐसे कठोर हृदय के लिये तुझे बार-बार धिक्कार है, जो इतना रूप, लावण्य, सौन्दर्य, पाडित्य और मान-सम्मान देने पर भी तैंने निमाई को घर-घर का भिखारी बना दिया।
‘बड़ी देर तक माता इसी प्रकार प्रलाप करती रही। कुछ धैर्य धारण करके आचार्य ने संन्यास की सभी बातें बता दीं। उनके सुनते ही माता फिर बेहोश हो गयी और विष्णुप्रिया भी अचेतन होकर शचीदेवी के चरणों में गिर पड़ी।
इस प्रकार रुदन करते-करते आधी से अधिक रात्रि बीत गयी। शचीमाता की बहिन ने खाने के लिये बहुत अधिक आग्रह किया, किंतु माता ने कुछ भी नहीं खाया। उसी हालत में वह विष्णुप्रिया को लिये हुए रात्रि भर पड़ी रोती रही। प्रात:काल आचार्य उन्हें घर पहुँचा आये। इस प्रकार श्रीवास, वासुदेव, नंदनाचार्य, गंगादास आदि सभी बिना कुछ खाये-पीये प्रभु के ही लिये अधीर होकर विलाप करते रहते थे। इस प्रकार तीसरे ही दिन नित्यानंद जी भी नवद्वीप आ पहुँचे।
नित्यानंद जी के आगमन का समाचार सुनकर बात-की-बात में सम्पूर्ण नगर के नर-नारी, बालक-वृद्ध तथा सभी श्रेणी के पूरूष उनके पास आ-आकर प्रभु का समाचार पूछने लगे। कोई पूछता- ‘प्रभु कहाँ है?’ कोई कहता- ‘यहाँ कब आवेंगे?’ कोई कहता- ‘हमें स्थान बता दो हम अभी जाकर उनके दर्शन कर आवें।’ जो लोग महाप्रभु से द्वेषभाव रखते थे, वे भी अपने कुकृत्यपर पश्चात्ताप करते हुए नित्यानन्द जी से रोते-रोते अत्यन्त ही दीनभाव से सरलतापूर्वक कहने लगे- ‘श्रीपाद! हम दुष्टों ने ही मिलकर प्रभु को गृहत्यागी-विरागी बनाया। हमारे ही कारण संन्यासी हुए। हमीलोग प्रभु को नवद्वीप से निर्वासित करने में कारण हैं। प्रभो! हमारी निष्कृति का भी कोई उपाय हो सकता है? दयालु गौरांग क्या हम-जैसे पापियों को भी क्षमा प्रदान कर सकते हैं? वे क्षमा चाहे न करें, हम अपने पापों का फल भोगने के लिये तैयार हैं, किंतु वे एक बार कृपा की दृष्टि से हमारी ओर देखभर लें। क्या प्रभु के दर्शन हम लोगों को कभी हो सकेंगे? क्या इस जीवन में गौरचन्द्र के सुन्दर तेजयुक्त श्रीमुख के दर्शनों का सौभाग्य हम लोगों को कभी प्राप्त हो सकता है?’
लोगों के मुख से ऐसी बात सुनकर नित्यानन्द जी सभी से कहते- ‘महाप्रभु बड़े दयालु हैं, उनके हृदय में प्राणिमात्र के प्रति दया के भाव हैं, उनका शत्रु या अप्रिय कोई भी नहीं। वे अपने अपकार करने वाले के प्रति भी प्रेम प्रदर्शित करते हैं, वे तुम लोगों के ही प्रेम के वशीभूत होकर फुलिया होते हुए शान्तिपुर जा रहे हैं। शान्तिपुर में वे आचार्य अद्वैत के घर ठहरेंगें तुम सभी लोग वहीं जाकर प्रभु के दर्शन कर सकते हो।’
नित्यानन्द जी के मुख से यह बात सुनकर कि ‘प्रभु इस समय फुलिया में हैं, हरिदास के आश्रम होंगे और वहाँ से शान्तिपुर जायेंगे’ बस, इस बात को सुनते ही लोग फुलिया की ओर दौड़ने लगे।
क्रमशः
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