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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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तब उन्होंने आचार्य से पूछा- ‘क्या प्रभु यहाँ नहीं आये?’ प्रभु के आगमन की बात सुनकर अद्वैताचार्य प्रेम में गद्गद हो उठे। रुंधे हुए कण्ठ से उन्होंने कहा- ‘क्या प्रभु इस दीन-हीन कंगाल के ऊपर कृपा करेंगे? क्या प्रभु अपनी चरण-धूलि से इस अकिंचन के घर को पावन बनावेंगे?’
नित्यानन्द जी ने कहा- ‘मुझे वे नवद्वीप भेजकर स्वयं फुलिया होते हुए आपके यहाँ आने वाले थे। यहीं पर माता तथा भक्तों को भी बुलाया है। आते ही होंगे।’ इतना सुनते ही वृद्ध आचार्य आनन्द में विभोर होकर उछल-उछलकर नृत्य करने लगे। उस समय उनकी दशा विचित्र थी, वे हर्ष और शोक दोनों के बीच में पड़े हुए थे। वे प्रभु के संन्यास का स्मरण करके तो दु:खित भाव से रुदन कर रहे थे और प्रभु के पधारने और उनके दर्शन पाने के सुख के कारण भीतर-ही-भीतर परम प्रसन्न हो रहे थे। उसी समय उन्होंने अपनी धर्मपत्नी सीतादेवी से प्रभु के लिये भाँति-भाँति के भोजन बनाने को कहा। आचार्यरत्न सीतादेवी तो उसी समय नाना प्रकार के व्यजनों के बनाने में लग गयी और आचार्य देव अपने पुत्र हरिदास, नित्यानन्द तथा अन्य भक्तों के सहित प्रभु को देखने के लिये गंगा-किनारे पहुँचे।
गंगा-किनारे पहुँचकर दूर से ही आचार्य ने देखा बहुत-से भक्तों से घिरे हुए हाथ में दण्ड-कमण्डलु धारण किये गेरुए रंग के वस्त्र पहने प्रभु जल्दी-जल्दी शान्तिपुर की ओर आ रहे हैं। दूर से देखते ही आचार्य ने पृथ्वी पर लोटकर साष्टांग प्रणाम किया। जल्दी से आकर प्रभु भी दण्ड-कमण्डलु के सहित आचार्य के चरणों में गिर पड़े। उनके चरणों में हरिदास जी पड़े और इसी प्रकार एक-दूसरे के चरणों को पकड़कर भक्त जोरों के सहित क्रन्दन करने लगे। घाट पर के स्त्री-पुरुष इस प्रेमदृश्य को देखकर आश्चर्यचकित हो गये। सभी इस अपूर्व प्रेम की प्रशंसा करने लगे। बहुत देर के अनन्तर प्रभु स्वयं उठे। उन्होंने अद्वैताचार्य को अपने हाथों से उठाया और अपने चरणों के समीप पड़े हुए आचार्य अद्वैत के पुत्र अच्युत को प्रभु ने गोदी में उठा लिया और अपने रँगे वस्त्र से उसके शरीर की धूलि पोंछते हुए कहने लगे- ‘आचार्य तो हमारे पिता हैं, तुम्हारे भी वे पिता हैं क्या? तब तो हम-तुम दोनों भाई-भाई ही हुए? क्यों ठीक है न? बताओ, हम तुम्हारे भाई नहीं हैं? हमें पहचानते हो?’
बालक अच्युत ने उत्तर दिया- ‘प्रभो! आप चराचर जीवों के पिता हैं। आपके पिता कौन हो सकते हैं? आप तो वैसे ही मुझसे हंसी कर रहे हैं।’
बालक के ऐसे अद्भुत उत्तर को सुनकर अद्वैताचार्य आदि सभी भक्त प्रसन्न होकर उस बालक की बुद्धि की सराहना करने लगे। प्रभु ने भी कई बार अच्युत के मुंह को चूमा और आप सभी भक्तों के सहित आचार्य के घर पहुँचे। घर पहुँचने पर आचार्य ने प्रभु के चरणों को धोया और अक्षत, धूप, दीप, नैवेद्य, चन्दन, पुष्पमाला आदि पूजन की सामग्रियों से विधिवत उनकी पूजा की। फिर प्रभु के पादोदाक का स्वयं पान किया, भक्तों को बांटा और अपने सम्पुर्ण घर में उसे छिड़का। प्रभु ने पधारने के कारण आचार्य के आनन्द का ठिकाना नहीं रहा, वे बार-बार अपने सौभाग्य की सराहना करने लगे।
माता को संन्यासी पुत्र के दर्शन…
उस शचीदेवी के सौभाग्य की सराहना करने की सामर्थ्य भला किस पुरुष में हो सकती है, जिसके गर्भ से दो संसार-त्यागी, विरागी संन्यासी महापुरुष उत्पन्न हुए? जगन्माता शचीदेवी की कोख ही मातृकोख कही जा सकती है। सौ पुत्रों को जनने वाली शूकरी माताओं की इस संसार में कुछ कमी नहीं है, किन्तु उनका गांव-से-गांव में और मुहल्ले-से-मुहल्ले में भी कोई नाम नहीं जानता, पर गौरांग को उत्पन्न करके शचीमाता जगज्जननी बन गयीं। गौर भक्त संकीर्तन के समय-
जय शचीनन्दन गौर गुणाकर। प्रेम परशमणि भाव रससागर।।
-आदि संकीर्तन के पदों को गा-गाकर आज भी जगन्माता शचीदेवी के सौभाग्य की सराहना करते हुए उन्हें भगवान की बात कह-कहकर रुदन करते हैं।
पुत्रों के संन्यासी होने पर स्वाभाविक मातृस्नेह के कारण जगन्माता शचीदेवी को अपार दु:ख हुआ था। उस दु:खने ही उन्हें जगन्माता के दुर्लभ पद तक पहुँचा दिया। उस महान दु:ख को उन्होंने धैर्य के साथ सहने किया। सच है भगवान जिसे जितना ही भारी दु:ख देते हैं, उसे उतने ही अधिक सहनशक्ति भी प्रदान कर देते हैं। जिसका एक युवावस्थापन्न पुत्र अविवाहित-दशा में ही घर-बार छोड़कर चला गया हो, पति परलोकवासी हो गये हों, जिस पुत्र के ऊपर जीवन की सम्पूर्ण आशाएँ लगी हुई थीं, वही वृद्धावस्था का एकमात्र सहारा, प्राणों से भी अधिक प्रिय पुत्र घर में सन्तानहीन युवती स्त्री को छोड़कर सदा के लिये संन्यासी बन गया हो, उस माता का हृदय बिना फटे कैसे रह सकता था? किन्तु जिसके गर्भ में प्रेमावतार गौरांग ने नौ महीने नहीं, तेरह महीने निवास किया हो, उस वीरप्रसविनी माता के लिये इतनी अधीरता का अनुमान कर ही कौन सकता है? फिर भी मातृस्नेह बड़ा ही अद्भुत होता है, पुत्रवियोग रूपी दु:ख को हंसते हुए सहने करने वाली माता पृथ्वी पर पैदा ही नहीं हुई! मदालसा आदि तो अपवादस्वरूप हैं।
देवकी, यशोदा, कौसल्या, देवहूति आदि सभी अवतार जननी माताओें को पुत्रवियोग से विलखना पड़ा। सभी ने अपने करूण-क्रन्दन से स्वाभाविक और सहज मातृस्नेह का परिचय देते हुए सर्वसमर्थ पुत्रों के लिये आँसू बहाये। फिर शचीदेवी किस प्रकार बच सकती थी। वह भी चन्द्रशेखर आचार्य तथा श्रीधर आदि भक्तों से जल्दी ही शान्तिपुर को चलने का आग्रह करने लगी। आचार्य ने उसी समय एक पालकी का प्रबन्ध किया और उस पर माता को चढ़ाकर शान्तिपुर की ओर चलने लगे। माता तो पालकी पर चढ़कर संन्यासी पुत्र को देखने के लिये चल दी, किन्तु पतिप्राणा बेचारी विष्णुप्रिया क्या करती। उसे तो अपने संन्यासी पति के दूर से दर्शन करने तक की भी आज्ञा नहीं थी। वह तो गेरुआ वस्त्र पहने अपने प्राणनाथ को आँख भरकर देख भी नही सकती थी। उसके लिये तो उसके जीवन-सर्वस्व अन्य लोगों की भी अपेक्षा बिराने बन गये, किन्तु यह बात नहीं थी।
लोकदृष्टि से उसके पति चाहे संन्यासी भले ही बन गये हों।
क्रमशः
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