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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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शिष्‍टाचार की रक्षा के निमित्त चाहे वह अपने प्राणनाथ के इस स्थूल शरीर के दर्शन न कर सके, किन्तु उसके आराध्‍यदेव तो सदा उसके हृदय-मन्दिर में निवास कर रहे थे। वहीं पर वह उनकी पूजा करती और अपनी श्रद्धांजलि चढा़कर भक्तिभाव से सदा उन्हें प्रणाम करती रहती। उसने वीरपत्नी की भाँति अपनी सास से कहा- ‘माता जी! आप जायं और उन्हें देख आवें। मेरे भाग्य में उनके दर्शन नहीं बदे हैं तो नहीं! मेरा इससे बढ़कर और क्या सौभाग्य होगा कि जो सदा हमारे रहे हैं और आगे भी जो सर्वदा हमारे ही रहेंगे, उनके दर्शन के लिये आज शत्रु-मित्र सभी जा रहे हैं। मैं तो उन्हीं की हूँ और उन्हीं की रहूँगी, चाहे वे संन्यासीवेश में रहें या गृहस्थवेश में! मेरे हृदय में इन बाह्य चिह्नों से भेदभाव नहीं हो सकता। मेरे तो वे एक ही हैं, चाहे जिस अवस्था में रहें। अपनी पुत्रवधु की ऐसी बात सुनकर माता मन-ही-मन उसकी प्रशंसा करती हुई पालकी पर चढ़कर भक्तों से घिरी हुई शान्तिपुर की ओर चली।

इधर महाप्रभु के घर पहुँचते ही अद्वैताचार्य की धर्मपत्नी सीतादेवी ने बात-की-बात में ही भाँति-भाँति के व्यंजन बनाकर तैयार कर लिये। जितने व्यंजन उसने बनाये थे, उतने व्यंजनों को अनेकों स्त्रियां मिलकर कई दिनों में भी नहीं बना सकती थीं। खट्टे, मीठे, चरपरे, नमकीन तथा भाँति-भाँति के अनेक पदार्थ बनाये गये, बीसों प्रकार के साग थे, एक केले के ही साग कई प्रकार से बनाये गये। चावल की, मखानों की, रामतोरई की, केले की तथा तीकुर की कई प्रकार की खीरें थीं। मूंग के, उड़द के, घुहियों के और भी कई प्रकार के बड़े थे। कद्दू का, बथुए का, पोदीने का, धनिये का और नुक्तियों के अलग-अलग पात्रों में रायता रखा हुआ था। भाँति-भाँति की मिठाइयाँ थीं। विविध प्रकार के अचार तथा मुरब्बे थे। बहुत बढ़िया चावल बनाये गये थे। मूंग, उड़द, अरहर, मोंठ, चना आदि कई प्रकार की अलग-अलग दालें बनायी गयी थीं। दही-चूरा, दुध-चूरा, नारिकेल, दूध आदि विभिन्न प्रकार के द्रव्य तैयार किये गये। आचार्य ने तीन स्थानों में सभी पदार्थ सजाये और भगवान का भोग लगाकर प्रभु से भोजन करने की प्रार्थना की।

प्रभु के बैठने के लिये आचार्य ने दो आसन दिये और उन्हें हाथ पकड़कर भोजन के लिये बिठाया। भाँति-भाँति की इतनी सामग्रियों को देखकर प्रभु कहने लगे- ‘धन्य है, जिनके घर में इतने सुन्दर-सुन्दर पदार्थों का नित्यप्रति भगवान को भोग लगता हो, उनकी चरण-धूलि से पापी-से-पापी पुरुष भी पावन बन सकते हैं। सीतामाता तो साक्षात अन्नपूर्णा मातेश्वरी हैं, उनके लिये इतने व्यजनों का बनाना कौन कठिन है?’
आचार्य देव ने कहा- ‘शिव जी भी विष्‍णु की शरण में गये बिना अन्नपूर्णा को अगस्त्य के शाप से छुटाने में समर्थ नहीं हैं, फिर चाहे वे कितने भी अधिक व्यंजन बनाना क्यों न जानती हों।’[1] आचार्य की ऐसी गूढ़ बात को सुनकर प्रभु मन-ही-मन मुसकराये और नित्यानन्द जी की ओर देखने लगे। नित्यानन्द जी बालकों की तरह कहने लगे- ‘इधर आठ-दस दिन से ठीक-ठीक भोजन ही नहीं मिला। व्रत-सा ही हुआ है, आज व्रत का खूब पारण होगा। आचार्य महाराज जल्दी से क्यों नहीं लाते?’

आचार्य ने कुछ हंसते हुए भाँति-भाँति के पदार्थों को दोनों भाइयों के सामने रखा। प्रभु उनमें खट्टे, मीठे, चरपरे और अनेक प्रकार के मीठे और घृत में सने हुए पदार्थों को देखकर कहने लगे- ‘आचार्य देव! आप ही तो सोंचे इतने सुन्दर-सुन्दर पदार्थों को खाकर संन्यासी अपने धर्म की रक्षा किस प्रकार कर सकता है? क्या इन पदार्थों को खाकर संन्यासी अपनी इन्द्रियों का संयम कर सकेगा? आपने इतने पदार्थ क्यों बनवाये।’
हंसते हुए आचार्य ने कहा- ‘आप जैसे संन्यासी हैं, उसे तो मैं खूब जानता हूँ। मेरे सामने बहुत मत बनिये। चुपचाप जैसा मेरे घर में रूखा-सूखा मुट्ठी भर अन्न है, उसे ही ग्रहण कर लीजिये।’

प्रभु ने कहा- ‘तब फिर आप भी हमारे साथ बैठकर भोजन कीजिये। और आपने यह दस-दस आ‍दमियों के खाने योग्य पदार्थ हम लोगों के सामने क्यों परोस दिये हैं, इन्हें कौन खायँगे?’

हंसकर आचार्य ने कहा- ‘जगन्नाथ जी में तो भक्तों के अर्पण किये हुए भाँति-भाँति के कई मन पदार्थों को अनेकों बार उड़ा जाते हो, यहाँ इतना अन्न भी न खा सकोगे? जगन्नाथ जी की अपेक्षा तो ये दो ग्रास भी नहीं है।’

प्रभु आचार्य की इस अत्युक्ति से कुछ लज्जित-से हुए और कहने लगे- ‘नहीं, सचमुच पदार्थ बहुत अधिक हैं, थोडे़ निकाल लीजिये। संन्यासीको उच्छिष्‍ट छोड़ने का विधान नहीं है, यदि मुझे और आवश्‍यकता होगी तो फिर ले लूंगा।’
प्रभु के अत्यन्त आग्रह करने पर आचार्य उस आहार में से कुछ कम करने लगे। इतने में ही नित्यानन्द जी बोल उठे- ‘आप दोनों झगड़ा करते रहें। मेरी तो इन इतने सुन्दर-सुन्दर व्यंजनों को देखकर लार टपकी पड़ती है, मैं तो खाता हूँ। यह देखो, यह लड्डू गपक! यह देखो, यह रबड़ी साड़ सड़ाबड़ सड़बड़-सड़बड़ सूँ। ऐसा कहते-कहते और हंसते-हंसते वे रबड़ी और खीर को सबड़ने लगे। प्रभु ने भी भोजन करना आरम्भ किया। प्रभु के पात्रों से जो वस्तु चुक जाती उसे उसी समय आचार्य उतनी ही मात्रा में फिर परोस देते। प्रभु बहुत मना करते, किन्तु आचार्य उनकी एक भी नहीं सुनते थे। इस प्रकार उनके सामने सब पदार्थ ज्यों-के-त्यों ही बने रहते और आचार्य उनसे पुन: खाने के लिये आग्रह करते।’
बीच-बीच में आचार्य देव नित्यानन्द जी से विनोद भी करते जाते थे। आचार्य देव कहने लगे- ‘अवधूत महाराज! आपका पेट भर देना तो अत्यन्त ही कठिन है, क्योंकि आप अगस्त्य जी से कुछ कम नहीं हैं, किन्तु देखना उच्छिष्‍ट न रहने पावे।’ नित्यानन्द जी कहते- ‘उच्छिष्‍ट क्यों रहेगा, परोसते जाओ आज ही तो बहुत दिनों में भोजनों का सुयोग प्राप्त हुआ है। आज ऐसे ही थोडे़ उठकर जाऊँगा। आज तो खूब भरपेट भोजन करूँगा।’

आचार्य बनावटी दीनता दिखाकर हाथ जोडे़ हुए बोले- ‘दया करो बाबा! आपका पेट भरना सहज काम नहीं है। मैं ठहरा गरीब ब्राह्मण! मैं कहाँ से आपके लिये इतना अन्न लाऊंगा? मुट्ठी-दो-मुट्ठी जो कुछ रुखा-सूखा अन्न है उसे ही खाकर सन्तुष्‍ट हो रहो।’
क्रमशः

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