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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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इस प्रकार आचार्य और नित्यानन्द जी में परस्पर विनोद की बातें होती जाती थीं। प्रभु दोनों के प्रेम-कलह को देखकर खूब हंसते जाते थे। इस प्रकार आचार्यदेव की इच्छा के अनुसार प्रभु ने खूब पेटभर भोजन किया। नित्यानन्द जी ने भी अन्य दिनों की अपेक्षा दुगुना-तिगुना भोजन किया। और अन्त में एक मुट्ठी चावल अपनी थाली में से लेकर आचार्य के ऊपर फेंकते हुए कहने लगे- ‘लो, अब आपके ऊपर दया करके उठ पड़ता हूँ, वैसे पेट तो मेरा अभी भरा नहीं है।’
आचार्य ने कुछ बनावटी क्रोध प्रकट करते हुए कहा- ‘श्रीविष्णु! श्रीविष्णु!! यह आपने क्या किया? मेरा सभी धर्म-कर्म नष्ट कर दिया। भला जिसके जाति-कुल का कुछ भी पता न हो, ऐसे घर-घर से मांगकर खाने वाले अवधूत के उच्छिष्ट अन्न का शरीर से स्पर्श हो गया, अब इसका क्या प्रायश्चित किया जाय?’
नित्यानन्द जी ने कहा- ‘उच्छिष्ट-स्पर्श से पाप नहीं हुआ है, विष्णु भगवान के प्रसाद में उच्छिष्ट-भावना रखने का पाप हुआ है। सो इसका यही प्रायश्चित है कि पचास संन्यासी महात्माओं को भोजन कराइये और उनमें मैं अवश्य रहूँ।’
आचार्य बनावटी आश्चर्य प्रकट करते हुए कहने लगे- ‘ना बाबा! संन्यासियों से भगवान दूर ही रखे। ये सबका धर्म-कर्म नष्ट करके अपना-सा ही बनाना चाहते हैं। अपने घर से जो बढ़ती हो वह संन्यासियों को भोजन करावे; मैं तो अपने घर में अकेला ही हूँ।’ इस प्रकार हास-परिहास में ही भोजन समाप्त हुआ। आचार्य ने दोनों संन्यासी भाइयों के हाथ धुलाये और उन्हें लवंग-इलायची आदि खाने के लिये दीं।प्रभु तीन-चार दिन के थके हुए थे, अत: वे भोजन करके विश्राम करने के लिये बाहर वाले मकान में चले गये। एक सुन्दर तख्त पर आचार्य ने शीतलपाटी बिछा दी, उसी के ऊपर अपना काषाय वस्त्र बिछाकर प्रभु आराम करने लगे। आचार्यदेव उनके चरणों को दबाने के लिये बढे़। आचार्य के हाथों से बलपूर्वक अपने चरणों को छुड़ाते हुए प्रभु कहने लगे- ‘आप मुझे इस प्रकार लज्जित करेंगे, तो मुझे बड़ा भारी दु:ख होगा। मैं तो आपके पुत्र अच्युत के समान हूँ। मुझे स्वयं आपके दबाने चाहिये। अब आप हरिदास और मुकुन्ददत्त आदि भक्तों को भोजन कराकर स्वयं भी भोजन कीजिये!’ प्रभु की ऐसी आज्ञा पाकर आचार्य घर के भीतर गये और सभी भक्तों को भोजन कराने के अनन्तर उन्होंने स्वयं भी प्रसाद पाया और फिर प्रभु के ही समीप आकर बैठ गये। तीसरे पहर अत्यधिक थक जाने के कारण प्रभु की कुछ-कुछ आँखें झंपने लगीं, उन्हें थोड़ी-थोड़ी नींद आ गयी थी, सहसा उनके कानों में गगन भेदी हरिध्वनि सुनायी पड़ी। उस तुमुल ध्वनि के सुनते ही प्रभु चौंक पड़े और उठकर बैठ गये। अपने चारों ओर देखते हुए प्रभु आचार्य से पूछने लगे- ‘आचार्यदेव! यह इतनी भारी हरिध्वनि कहाँ से सुनायी पड़ रही है?’
आचार्य ने कहा- मालूम पड़ता है नवद्वीप से बहुत-से भक्त प्रभु के दर्शनों के लिये आ रहे हैं।’ यह कहते-कहते आचार्य बाहर निकलकर देखने लगे। थोड़ी देर में उन्हें सामने से श्रीवास, रमाई, पुण्डरीक, विद्यानिधि, गंगादास, मुरारी गुप्त, शुक्लाम्बर ब्रह्मचारी, बुद्धिमन्त खाँ, नन्दनाचार्य, श्रीधर, विजयकृष्ण, वासुदेव घोष, दामोदर, मुकुन्द, संजय आदि बहुत-से भक्त ढोल, करताल लिये हुए और हरिध्वनि करते हुए आते हुए दिखायी देने लगे। उन्होंने उल्लास के साथ जोरों से चिल्लाकर कहा- ‘प्रभो! सब-के-सब आ रहे हैं। कोई भी बाकी नहीं बचा। बाकी कैसे बचे, जहाँ राजा वहाँ ही प्रजा। भक्त भगवान से पृथक रह ही कैसे सकते हैं।’ आचार्य की ऐसी बात सुनकर प्रभु जल्दी से जैसे बैठे थे, वैसे ही बाहर निकल आये। भक्तों को सामने से आते हुए देखकर प्रभु उनकी ओर दौड़े। उस समय प्रभु प्रेम में ऐसे विभोर हो रहे थे कि उन्हें सामने के ऊंचे चबूतरे का ध्यान ही नहीं रहा। वे ऊपर से एकदम कूद पड़े। प्रभु को अपनी ओर आते देखकर भक्त वहीं से प्रभु के लिये साष्टांग करने लगे। बहुत दूर तक भक्तों की लम्बी पड़ी हुई पंक्ति-ही-पंक्ति दिखायी देती थी।प्रभु ने जल्दी से जाकर सबको उठाया। किसी को गले से लगाया, किसी को स्पर्श किया, किसी का हाथ पकड़ा, किसी को स्वयं प्रणाम किया और किसी की ओर ख़ाली देख ही भर दिया। इस प्रकार विविध प्रकार से प्रभु ने सभी को संतुष्ट कर दिया। प्रभु को संन्यासी-वेष में सामने खडे़ देखकर भक्त आनन्द और दु:ख के कारण रुदन कर रहे थे। वे प्रभु के केशशून्य मस्तक को देखकर पछाड़ खा-खाकर गिरने लगे। प्रभु श्रीवास पण्डित का हाथ पकडे़ हुए आगे-आगे चलने लगे। अद्वैताचार्य भी उनके पीछे थे। उनके पीछे सभी नवद्वीप के भक्त चल रहे थे। प्रभु को आगे जाते देखकर चन्द्रशेखर आचार्यरत्न ने आगे बढ़कर कहा- ‘प्रभो! शचीमाता भी आयी हुई हैं। इतना सूनते ही प्रभु चौंककर खडे़ हो गये और सम्भ्रम के सहित पूछने लगे- ‘कहाँ हैं?’
आचार्यरत्न ने धीरे से कहा- ‘इस पास के नीम के समीप ही उनकी पालकी रखी हुई है।’ इस बात को सुनते ही प्रभु जल्दी से पीछे लौट पड़े। अद्वैताचार्य तथा अन्य भक्त भी प्रभु के पीछे-पीछे चले। दूर से ही पालकी में बैठी हुई माता को देखकर प्रभु ने भूमि में लोटकर उन्हें साष्टांग प्रणाम किया। पुत्रवियोग से दु:खी हुई वृद्धा माता ने पालकी में से उतरकर अपने संन्यासी पुत्र का आलिंगन किया और उनके केश शून्य मस्तक पर हाथ फिराती हुई कहने लगी- ‘निमाई! संन्यासी होकर तू मुझे प्रणाम करके और अधिक पाप का भागी क्यों बनाता है? तैंने जो किया सो तो अच्छा ही किया! अब तू मेरे घर रहने योग्य तो रहा ही नहीं, किन्तु बेटा! इस अपनी दु:खिनी बूढ़ी माता को एकदम भूल मत जाना। तू भी विश्वरूप की तरह निष्ठुर मत बन जाना। उसने तो जिस दिन से घर छोड़ा है, आज तक सूरत ही नहीं दिखायी। तू ऐसा मत करना।’ इतना कहते-कहते माता अधीर होकर गिर पड़ी। प्रभु भी अचेत होकर माता की गोदी में पड़ गये और छोटे बालक की भाँति फूट-फूटकर रोने लगे। रोते-रोते वे कहने लगे ‘माँ! मैं चाहे कैसा भी संन्यासी क्यों न हो जाऊँ, तुम मेरी माता हो और मैं तुम्हारा सदा पुत्र ही बना रहूँगा। जननी।
क्रमश:
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