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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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मैं तुम्हारे ऋण से कभी भी उऋण नहीं हो सकता। माता! मैंने जल्दी में बिना सोचे-समझे ही संन्यास ग्रहण कर लिया है, फिर भी मैं तुमसे पृथक नहीं होऊँगा, जहाँ तुम्हारी आज्ञा होगी, वहीं रहूँगा।’
प्रभु के ऐसे सान्त्वनापूर्ण प्रेम-वचनों को सुनकर माता को कुछ संतोष हुआ, उन्होंने अपने अंचल से प्रभु के अश्रुओं को पोंछा और उन्हें छोटे बच्चे की भाँति पुचकारने लगीं।
अद्वैताचार्य ने प्रभु से घर पर चलने की प्रार्थना की। प्रभु खडे़ हो गये और कहार पालकी उठाकर आचार्य के घर की ओर चलने लगे। महाप्रभु पालकी के पीछे-पीछे चलने लगे। उनके पीछे बहुत-से भक्त जोरों से संकीर्तन करते हुए चल रहे थे। द्वार पर पहुँचकर आचार्यदेव की धर्मपत्नी सीता देवी ने आगे बढ़कर शचीमाता को पालकी से नीचे उतारा और अपने साथ उन्हें भीतर घर में ले गयीं। भक्तवृन्द बाहर खडे़ होकर संकीर्तन करने लगे।
शचीमाता का संन्यासी पुत्र के प्रति मातृ-स्नेह…….
पुत्र ही माता की आत्मा है, पुत्र माता के शरीर का एक प्रधान भाग है। पुत्र की सन्तुष्टि में माता को सन्तोष होता है। पुत्र की प्रसन्नता से माता को प्रसन्नता होती और पुत्र की तृष्टि में माता स्वयं अपने तन-मन की तृष्टि का अनुभव करती है। माता की एक ही सबसे बड़ी साध होती है, वह अपने प्रिय पुत्र को अपने सामने खाते हुए देखना चाहती हैं। अपनी शक्ति के अनुसार जितने अच्छे-अच्छे पदार्थ वह अपने पुत्र को खिला सकती है, उतने पदार्थों को उसे खिलाकर वह इतनी प्रसन्न होती है, जितनी प्रसन्नता उसे स्वयं खाने से प्राप्त नहीं होती। पुत्र चाहे बूढा़ भी क्यों न हो जाय, उसके पाण्डित्य का, उसकी बुद्धि का, उसके ऐश्वर्य का चाहे सम्पूर्ण संसार ही लोहा क्यों न मान ले, किन्तु माता कि लिये वह पुत्र सदा छोटा बालक ही बना रहता है, वह आते ही उसके पेट को देखने लगती है कि कहीं भूखा तो नहीं है। जाते समय वह उससे वस्त्रों को ठीक तौर साँभालकर रखने का आदेश करती है। छोटी-छोटी बातों को वह इस तरह से बताती है, मानो उसे मार्ग के सम्बन्ध में कुछ बोध ही न हो। पुत्र के लिये जलपान का सामान बांधना वह नहीं भूलती। इसीलिये नीतिकारों ने कहा है-
मात्रा समानं न शरीरपोषणम्।
अर्थात माता के समान शरीर का पोषण करने वाला दूसरा व्यक्ति नहीं है। शचीमाता ने अपने निमाई को संन्यासी-वेष में देखा। यद्यपि अब प्रभु पहले की भाँति श्वेत वस्त्र धारण नहीं कर सकते थे। उनके सिर के सुन्दर बाल अब सुगन्धित तैलों से नहीं सींचे जाते थे, अब वे धातु के पात्रों में भोजन नहीं कर सकते थे, अब उनके लिये एकका ही अन्न खाते रहना निषेध है, तब भी इन बाहरी बातों से क्या होता है? माता के लिये तो उसका पुत्र वही पुराना निमाई ही है। सिर मुड़ाने और कपड़े रंग लेने से उसके निमाई में कोई परिवर्तन नहीं हुआ। माता उसी तरह प्रभु के ऊपर प्यार करती।
वह स्वयं अपने हाथों से प्रभु के भोजन के लिये भाँति-भाँति के व्यंजन बनाती। वह प्रभु के स्वभाव से पूर्णरीत्या परिचित थी। उसे इस बात का पता था कि निमाई किन-किन पदार्थों को खूब प्रेमपूर्वक खाता है, उन्हीं सब पदार्थों को माता खूब सावधानी के साथ बनाती और अपने हाथ से परोसकर प्रभु को खिलाती। प्रभु भी माता के सन्तोष के निमित्त सभी पदार्थों को खूब रुचिपूर्वक खाते और भोजन करते-करते पदार्थों की प्रशंसा भी करते जाते थे।प्रभु के भोजन कर लेने के अनन्तर शचीमाता और सीतादेवी दोनों मिलकर अन्य सभी भक्तों को प्रेम के सहित भोजन करातीं। सबको भोजन कराने के पश्चात स्वयं भोजन करतीं। इस प्रकार आचार्य देव का घर उस समय उत्सव-मण्डप बना हुआ था। प्रात:काल सभी भक्त उठकर संकीर्तन करने लगते, इसके अनन्तर सभी प्रभु को साथ लेकर नित्यकर्मों से निवृत्त होने के लिये गंगा-किनारे जाते, सभी भक्त मिलकर गंगाजी की सुन्दर बालुका में भाँति-भाँति की क्रीड़ाएँ करते रहते। अनन्तर संकीर्तन करते हुए आचार्य के घर पर आ जाते। तब तक शचीमाता भोजन बनाकर तैयार कर रखती। प्रभु के भोजन के अनन्तर सभी भक्त प्रसाद पाते। फिर तीसरे पहर से श्रीकृष्ण-कथा छिड़ जाती। सभी भगवान के गुणों का वर्णन करते तथा श्रीकृष्ण-कथा श्रवण करके अपने कर्णों को धन्य करते। सांयकाल को फिर गंगा-किनारे चले जाते और प्रभु के साथ अनेक भक्ति-सम्बन्धी गूढ़ विषयों पर बातें करते रहते। प्रभु अपने सभी अन्तरंग भक्तों को भक्ति-तत्त्व का रहस्य समझाते, उन्हें उपासना की पद्धति बताते और संकीर्तन की अपेक्षा जप करने पर अधिक जोर देते। भगवन्नाम का जप किसी भी तरह से किया जाय, वही कल्याणप्रद होता है। उसमें संकीर्तन के समान दस-पांच आदमियों की तथा ढोल-करताल आदि वाद्यों की भी अपेक्षा नहीं रहती। मनुष्य हर समय, हर स्थानों में, हर अवस्था में भगवन्नाम का जप कर सकता है। वे शिव जी के इस वाक्य को बार-बार दुहराते-
‘जपात् सिद्धिर्जपात् सिद्धिर्जपात् सिद्धिर्वरानने।’
अर्थात ‘हे पार्वती जी! मैं प्रतिज्ञापूर्वक कहता हूँ कि जप से ही सिद्धि प्राप्त हो सकती है।’ किसी भक्त को कोई शंका होती तो उसका समाधान प्रभु स्वयं करते। गंगा जी से लौटने पर संकीर्तन आरम्भ हो जाता। उन दिनों संकीर्तन में बड़ा ही अधिक आनन्द आता था। सभी भक्त आनन्द में बंसुद होकर नृत्य करने लगते। अद्वैताचार्य की प्रसन्नता का ठिकाना नहीं था। वे अपने सौभाग्य की सराहना करते-करते अपने आपेको भूल जाते। अपने घर में नित्यप्रति ऐसे समारोह के उत्सव को देखकर उनकी अन्तरात्मा बड़ी ही प्रसन्न होती। कीर्तन के समय वे जोरों से भावावेश में आकर नृत्य करने लगते। नृत्य करते-करते वृद्ध आचार्य अपनी अवस्था को एकदम भूल जाते और युवकों की तरह उछल-उछलकर, कूद-कूदकर नाचने लगते। नाचते-नाचते बेहोश होकर पृथ्वी पर गिर पड़ते। घंटों इसी प्रकार बेहोश हुए पड़े रहते। भक्तों के उठाने पर बड़ी कठिनता से उठते।
महाप्रभु अब संकीर्तन में बहुत कम नृत्य करते थे; किंतु जिस दिन भावावेश में आकर नृत्य करने लगते, उस दिन उनकी दशा बहुत ही विचित्र हो जाती। उनके सम्पूर्ण शरीर के रोम बिलकुल सीधे खड़े हो जाते, नेत्रों से अश्रुओ की धारा बहने लगती, मुंह से झाग निकलने लगते।
क्रमशः
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