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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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प्रभु ‘हरि,‍ हरि’ बोलकर इतने जोरों से नृत्य करते थे कि देखने वालों की यही प्रतीत होता था कि प्रभु आकाश में स्थित होकर नृत्य कर रहे हैं। भक्तगण आनन्द में विह्वल होकर प्रभु के चरणों के नीचे की धूलि को उठाकर अपने सम्पूर्ण शरीर में मल लेते और अपने जीवन को सफल हुआ समझते। इस प्रकार दस दिनों तक प्रभु ने अद्वैताचार्य के घर पर निवास किया।नवद्वीप तथा शान्तिपुर के सभी भक्तों की यह इच्छा होती कि प्रभु को एक-एक दिन हम भी भिक्षा करावें, किन्तु माता उन सबसे दीनतापूर्वक कहती- ‘तुम सब मुझ अभागिनी के ऊपर कृपा करो। तुम सब तो जहाँ भी निमाई रहेगा वहीं जाकर इसे भिक्षा करा आओगे। मुझ दु:खिनी को अब न जाने कब ऐसा सौभाग्य प्राप्त होगा। मेरे लिये तो यही समय है। मैं तुम सभी से इस बात की भीख मांगती हूँ कि जब तक निमाई शान्तिपुर रहे तब तक वह मेरे ही हाथ का बना हुआ भोजन पावे। अब उसके ऊपर मेरे ही समान तुम सब लोगो का अधिकार है; किंतु मेरी ऐसी ही इच्छा है?’ माता की ऐसी बात सुनकर सभी चुप हो जाते और फिर प्रभु के निमन्त्रण के लिये आग्रह न करते।

इस प्रकार अपनी जननी के हाथ की भिक्षा को पाते हुए और सभी भक्तों के आनन्द को बढा़ते हुए श्रीअद्वैताचार्य के आग्रह से प्रभु शान्तिपुर में निवास करने लगे। प्रभु शान्तिपुर में ठ‍हरे हुए हैं, इस बात का समाचार सुनकर लोग बहुत-बहुत दूर से प्रभु के दर्शनों को आया करते। इस प्रकार शान्तिपुर में प्रभु के रहने से एक प्रकार का मेला-सा ही लग गया।
प्रेमावतार चैतन्यदेव मातृस्नेह और अद्वैताचार्य के प्रेमाग्रह के ही कारण दस दिनों तक शान्तिपुर में ठहरे रहे।

पुरी-गमन के पूर्व……

भगवान का स्वरूप निर्गुण है या सगुण? जगत मिथ्‍या है या सत्य? हृदय में ऐसी शंकाओं के उत्पन्न होने से ही पता चल जाता है कि अभी हम भगवत्कृपा प्राप्त करने के पूर्ण अधिकारी नहीं बन सके। जिनके ऊपर भगवान की पूर्ण कृपा हो चुकी है, उनके मस्तिष्‍क में ऐसे प्रश्‍न उठकर उनके चित्त में विक्षेप उत्पन्न नहीं करते। भगवान सगुण हों या निर्गुण, साकार हों या निराकार, यह जगत सत्य हो अथवा त्रिकाल में भी उत्पन्न न हूआ हो, उच्च साधकों को इन बातों से कुछ भी प्रयोजन नहीं, वे तो यथाशक्ति सभी संसारी परिग्रहों का परित्याग करके प्रभु के पादपद्मों में प्रेम करने के निमित्त पागल-से बन जाते हैं। वे जगत की सत्यता और मिथ्‍यात्व की उलझनों को सुलझाने में अपना अमूल्य समय बरबाद नहीं करते। क्या घट-घटव्यापी भगवान हमारे हृदय की बात को जानते नहीं? क्या वे सर्वशक्तिमान नहीं है? क्या उनका चित्त दयाभाव से भरा हुआ नहीं है? यदि हाँ, तो वे हमारे हृदय की सच्ची लगन को समझ दया के वशीभूत होकर जैसे भी निराकार अथवा साकार होंगे, हमारे सामने प्रकट हो जायँगे। हम द्वैत, अद्वैत, विशिष्‍टाद्वैत, द्वैताद्वैत तथा शुद्धाद्वैत के झमेले में क्यों पड़े? किन्तु ऐसी भावना सबकी नही हो सकती। जो मस्तिष्‍क-प्रधान हैं वे बिना सोचे रह ही नहीं सकते, उन्हें समझाकर ही श्रद्धा उत्पन्न करानी होगी और उस श्रद्धा के सहारे ही उन्हें सत्य तक पहुँचाना होगा, इसीलिये महर्षियों ने वेदान्तशास्त्र का उपदेश किया है। वेद के अन्तिम भाग को वेदान्त कहते हैं। उसका सम्बन्ध विचार से है। किन्तु हृदय प्रधान तो विचार की इतनी अधिक परवा नहीं करते, वे तो ‘श्रीकृष्‍ण, श्रीकृष्‍ण’ कहते-कहते ही अपने प्यारे के पादपद्मों तक पहुँचकर सदा उन्हीं के हो रहते हैं। उन्हीं के क्या, तद्रूपही से बन जाते हैं, किन्तु सबको ऐसा सौभाग्य प्राप्त नहीं हो सकता। जिनके ऊपर उनका अनुग्रह हो वही इस पथका पथिक बन सकता है।

इस पर यह भी शंका हो सकती है कि फिर ‘श्रीकृष्‍ण, श्रीकृष्‍ण’ कहने वाला अज्ञानी ही बना रहेगा और बिना ज्ञान के संसारी-बन्धन से मुक्ति नहीं हो सकती ‘ॠते ज्ञानान्न मुक्ति:’ तब फिर वह मुर्ख भक्त प्रभु के पादपद्मों तक कैसे पहुँच सकता है? इसका सीधा उत्तर यही है कि जो सर्वस्व त्याग करके भगवान की ही शरण में अनन्य भाव से आ गया हो, सच्चिदानन्दस्वरूप भगवान जिनका स्वरूप ही ‘सत्य ज्ञानमनन्तम्’ है, उसे ज्ञानहीन कैसे बना रहने देंगे? उनकी शरण में आते ही हृदय की ग्रन्थियाँ आप-से-आप ही खुल जायँगी, बिना प्रयास के ही उसके सभी संशय दूर हो जायँगे, कर्म-अकर्म की जटिल समस्याओं को बिना सुलझाये ही उसके सम्पूर्ण कर्म क्षीण हो जायँगे। भगवत-शरणागति में यही तो सुलभता, सरलता और सरसता है। आकाश-पाताल एक भी न करना पड़े और आनन्द भी सदा बना रहे, सदा उस अद्भुत रस का पान ही करते रहें। किन्तु इस अनन्य उपासना और भगवत-प्रपन्नता के लिये सभी संसारी-‍परिग्रहों का पूर्ण त्याग करना होगा। तभी उस अद्भुत आसव की प्राप्ति हो सकती है। ख़ाली ढोंग बना लेने और भेदभाव के संकुचित क्षेत्र में ही बंधे रहने से काम न चलेगा।महाप्रभु को अद्वैतवादी संन्यासियों की पद्धति से दीक्षा लेने और दण्‍ड धारण करने से अद्वैताचार्य जी को शंका हुई। उन्होंने प्रभु से पूछा- ‘प्रभो! आपने अद्वैतवादियों की भाँति यह संन्यास-धर्म क्यों ग्रहण किया? आपके सभी कार्य अलौकिक हैं, आपकी लीला जानी नहीं जा सकती। इस प्रश्‍न को सुनकर कुछ मुसकराते हुए प्रभु ने कहा- ‘आचार्य देव! आप तो स्वयं विद्वान हैं। आप विचारकर स्वयं ही देंखे, क्या मैं अद्वैत के सिद्धान्त को नहीं मानता? आप ही सोचें, आप में और ईश्‍वर में चिह्नादि मात्र का ही प्रभेद दिखायी देता है। वस्तुत: तो दूसरा कोई अन्य भेद प्रतीत ही नहीं होता।’ इस उत्तर को सुनकर हँसते हुए अद्वैताचार्य कहने लगे- ‘धन्य हैं भगवान! आप तो वाणी के स्वामी हैं, आपके सामने तो कुछ कहते ही नहीं बनता।’ तब प्रभु ने बहुत ही गम्भीरता के साथ कहा-

विना सर्वत्यागं भवति भजनं नह्यसुपते- 
रिति त्यागोऽस्माभि: कृत इह किमद्वैतकथया।
अयं दण्‍डो भूयान् प्रबलतरसो मानसपशो- 
रितीवाहं दण्‍डग्रहणमविशेषादकरवम्।
 
‘आचार्यदेव! इसमें द्वैत-अद्वैत की कौन-सी बातें है। असली बात तो यह है कि बिना सर्वस्व त्याग के किये हृदयवल्लभ प्राणरमण उन श्रीकृष्‍ण भजन हो ही नहीं सकता। इसीलिये मैंने सर्वस्व त्यागकर संन्यास ग्रहण किया है। यह मन तो अत्यन्त ही चंचल पशु के समान है।
क्रमशः

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