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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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आचार्य देव के आग्रह से प्रभु ने भी इन्हें साथ चलने की अनुमति प्रदान कर दी।
पुरी के पथ में…..
सचमुच अपने प्रियजन के बिछोह के समय तो सहृदय पुरुषों को मरण-समान ही दु:ख होता है। जिसके साथ इतने दिनों तक हास-परिहास, भोजन-पान आदि किया, जो निरन्तर अपने साहचर्य सुख का आनन्द पहुँचाता रहा, वही अपना प्यारा प्रियतम आज सहसा हमसे न जाने कब तक के लिये पृथक हो रहा है, इस बात के स्मरण मात्र से सहृदय सज्जनों के हृदय में भारी क्षोभ उत्पन्न होने लगता है। किन्तु उस दु:ख में भी मीठा-मीठा मजा हैं, उसका आस्वादन भावुक प्रेमी पुरुष ही कर सकते हैं। संसारी स्वार्थपूर्ण पुरुषों के भाग्य में वह सुख नही बदा है।
दस दिनों तक भक्तों के चित को आनन्दित कराते रहने के अनन्तर आज प्रभु शान्तिपुर को परित्याग करके पुरी के पथिक बन जायँगें, इस बात के स्मरण मात्र से सभी परिजन और पुरजनों के हृदय में प्रभु के वियोगजन्य दुख की पीड़ा-सी होने लगी। सभी के चेहरों पर विषण्णता छायी हुई थी।
प्रभु ने कुछ अन्यमनस्क भाव से अपने ओढ़ने का रँगा वस्त्र उठाया, लंगोटी को कमर से बांध लिया और छोटी-सी साफी सिर से लपेट ली। एक हाथ में दण्ड लिया और दूसरे में कमण्डलु लेकर प्रभु उस बैठक से बाहर हुए प्रभु को यात्री के वेष में देखकर उपस्थित सभी भक्त फूट-फूटकर रोने लगे। वृद्धा शची माता का तो दिल ही धड़कने लगा।
जगदानन्द ने प्रभु के हाथ से दण्ड ले लिया और दामोदर पण्डित ने कमण्डलु। अब प्रभु के दोनों हाथ ख़ाली हो गये। उन दोनों हाथों से वृद्धा माता के चरणों को स्पर्श करते हुए प्रभु ने गदगद कण्ठ से कहा- 'माता ! मुझे ऐसा आशीर्वाद दो कि मैं अपने सन्यांस-धर्म का विधिवत पालन कर सकूँ।' पता नहीं उस समय पुत्र स्नेह से दु:खी हुई माता को इतना साहस कहाँ से आ गया? उसने अपने प्यारे पुत्र के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा- बेटा ! तुम्हारा पथ मंगलमय हो, वायु तुम्हारे अनुकुल रहे, तुम अपने धर्म का विधिवत पालन कर सको।' इतना कहते-कहते ही माता का गला भर आया, आगे वह और कुछ न कह सकी। उसी अवस्था में रोती हुई अपनी माता की प्रभु ने प्रदक्षिणा की और दोनों हाथों को जोड़कर वे नि:स्पृहभाव से गंगा जी के किनारे-किनारे पुरी की ओर चल पड़े। सैकड़ों भक्त आंसू बहाते हुए और आर्तनाद करते हुए प्रभु के पीछे-पीछे चले।शचिमाता भी लोक-लाज की कुछ भी परवा न कर रोती हुई पैदल ही अपने प्राणप्यारे पुत्र के पीछे-पीछे चलीं। जिस प्रकार नि:स्पृह बछड़ा माता को छोड़कर पुरी के पथ में दूसरी ओर जा रहा हो और उसकी माता वृद्धा गाय रंभाती हुई उसके पीछे-पीछे दौड़ रही हो, इसी प्रकार शरीर की सुधि भुलाकर शची माता प्रभु के क्रन्दन करती हुई भक्तों के आगे-आगे चल रही थीं। उनके क्रन्दन से कलेजा फटने लगता था। उनके सफेद बाल बिखरे हुए थे, आँसुओं से वक्ष:स्थल भींगा हुआ था। वे पछाड़ खाती हुई प्रभु के पीछे-पीछे चल रही थीं।
प्रभु माता को देखते हुए भी संकोचवश उनसे आँखे नहीं मिलाते थे। बूढ़े अद्वैताचार्य भी जोरों से बच्चों की भाँति रुदन कर रहे थे। इस प्रकार के रुदन को सुनकर प्रभु अधीर हो उठे। वे चलते-चलते ठहर गये और आँखों से आँसू बहाते हुए अद्वैताचार्य जी से कहने लगे- आचार्यदेव ! इतने वृद्ध होकर जब आप ही इस प्रकार बालकों की तरह रुदन कर रहे हैं तो फिर भक्तों को और कौन धैर्य बँधावेगा? आपका मुझ पर सदा पुत्र की भाँति स्नेह रहा है। यह मैं जानता हूँ कि मेरे वियोग से आपको अपार दु:ख हुआ है, किन्तु आप तो सर्वसमर्थ हैं। आपके साहस के सामने मेरा वियोगजन्य दु:ख कुछ भी नहीं है। आप अब मेरे कहने से शान्तिपुर लौट जायँ। आप यदि मेरे साथ चलेंगे तो यहाँ माता की तथा भक्तों की देख-रेख कौन करेगा। आप मेरे काम के लिये शान्तिपुर में रह जाइये। मैं माता को तथा भक्तों को आप के हाथ में सौंपता हूँ। आप ही सदा से इनके रक्षक रहे हैं और अब भी इन सबका भार आपके ही ऊपर है। यह करुणापूर्ण दृश्य अब और अधिक मुझसे नहीं देखा जाता। अब आप इन सभी भक्तों के सहित लौट जायँ।'
आचार्य ने प्रभु की आज्ञा का पालन किया। वे वहीं ठहर गये। उन्होंने भूमि में लोटकर प्रभु के लिये प्रणाम किया। प्रभु ने उनकी चरण-धूली अपने मस्तक पर चढ़ायी और माता के चरणों की वन्दना करते हुए वे उन सबको पृथ्वी पर ही पड़ा छोड़कर जल्दी से आगे के लिये दौड़ गये। नित्यानन्द, दामोदर, जगदानन्द और मुकुन्ददत्त भी सभी लोगों से विदा होकर प्रभु के पीछे-पीछे दोड़ने लगे और सब लोग वहीं पड़े-के-पड़े ही रह गये। जब भक्तों ने देखा कि प्रभु तो हमें छोड़कर चले ही गये तब उन्होंने और अधिक प्रभु का पीछा नहीं किया। वे खड़े होकर गंगा जी की ओर देखते रहे।जब तक उन्हें प्रभु के पैरों से उड़ी हुई धूलि और जगदानन्द के हाथ प्रभु का दण्ड दिखायी देता रहा तब तक तो वे एकटक भाव से देखते रहे, अन्त में जब प्रभु अपने साथियों के सहित एकदम अदृश्य हो गये, तब खिन्न-मन से देखते रहे, अन्त में जब प्रभु अपने साथियों के सहित एकदम अदृश्य हो गये, तब खिन्न-मन से माता को आगे करके भक्तों के सहित अद्वैताचार्य अपने घर की ओर लौट आये और श्रीवास आदि भक्त उसी समय माता को साथ लेकर नवद्वीप के लिये चले गये।
इधर महाप्रभु बन्धन से छूटे हुए मत गजेन्द्र की भाँति द्रुत गति से गंगा जी के किनारे-किनारे चले जा रहे थे। उनके पीछे नित्यानन्द जी आदि भक्त भी प्रभु का अनुसरण कर रहे थे। सब-के-सब गृहत्यागी विरागी और अल्पवयस्क युवक ही थे। सभी के हृदय में त्याग-वैराग्य की अग्नि प्रज्वलित हो रही थी। प्रभु ने उन सबके त्याग-वैराग्य की परीक्षा करने के निमित सभी से पूछा- 'तुम लोग मुझसे सच-सच बताओ, तुमने अपने साथ क्या-क्या सामान बांधा है।
क्रमशः
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