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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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प्रभु के ऐसे प्रश्न को सुनकर सभी ने दीनभाव से कहा- प्रभों ! हम भला, आपकी आज्ञा के बिना कोई वस्तु साथ कैसे ले सकते थे और किसी के द्रव्य को आपके बिना पूछे कैसे स्वीकार कर सकते थे? आप हमारे सम्पूर्ण शरीर को देख लें, हमारे पास कुछ भी नहीं है और न हमसें से किसी ने द्रव्य ही साथ में बाँधा।' महाप्रभु उनके ऐसे निष्कपट, सरल और नि:स्पृहतापूर्ण उतर को सुनकर बड़े ही प्रसन्न हुए। उन्होंने प्रसन्नता प्रकट करते हुए कहा- मैं तुम लोगों से अत्यन्त ही प्रसन्न हूँ। तुमने साथ में द्रव्य न बांधकर अपनी नि:स्पृहता का परिचय दिया है। नि:स्पृहता ही तो त्याग का भूषण है। जो किसी से धन की इच्छा करके संग्रह करता है, वह कभी त्यागी हो ही नहीं सकता। त्यागी के लिये तो भोजन की चिन्ता करनी ही न चाहिये।
उसे तो प्रारब्ध के उपर छोड़ देना चाहिये। जो प्रारब्ध में होगा वह अवश्य मिलेगा, फिर चाहे तुम मरुभुमि के घोर बालुकामय प्रदेश में ही जाकर क्यों न बैठ जाओ। और भाग्य में नहीं हैं, तो भोगों के बीच में रहते हुए भी उन्हें उन से वंचित रहना पड़ेगा। चाहे जितना धनी क्यों न हो, उसके पास कितनी भी भोज्य-सामग्री क्यों न हो, जिस दिन उसके भाग्य में न होगी, उस दिन वह पास में रखी रहने पर भी उन्हें नहीं खा सकता। या तो बीमार हो जायगा या किसी पर नाराज होकर खाना छोड़ देगा, अथवा दूसरा आदमी आकर उसे खा जायगा। सारांश यह है कि हमें भोग भाग्य के ही अनुसार प्राप्त हो सकेंगे। फिर किसी से मांगकर संग्रह क्यों करना चाहिये।भूख लगने पर घर-घर से मधुकरी कर लो। यही त्यागी का परम धर्म हैं।’ इस प्रकार अपने साथियों को त्याग, वैराग्य और भक्ति का तत्त्व समझाते हुए सायंकाल के समय आठिसारा नामक ग्राम में पहुँचे और वहाँ परम भाग्यवान अनन्त पण्डित नामके एक ब्राह्मण के घर ठहरे। प्रभु के दर्शन से वह कृतार्थ हो गया और उसने प्रभु को साथियों सहित भिक्षा आदि कराके उनकी विधिवत सेवा-पूजा की।
प्रात:काल वहाँ से चलकर खाड़ी नामक ग्राम के समीप छत्रभोग तीर्थ में पहुँचे। यहाँ पर गंगा जी के किनारे एक अम्बुलिंग नामक जलमग्न शिव है। आज कल तो छत्रभोग और अम्बुलिंग शिव जी गंगा जी से दूर पड़ गये हैं, उस समय गंगा जी की शेष सीमा यहीं पर थी। यहीं पर त्रिलोकी पावनी भगवती भागीरथी सहस्त्र धाराओं का रुप धारण करके समुद्र में मिलती थी। गंगा जी के इस पार छत्रभोग, पीठस्थान और सुन्दर नगर था। यही गौड़-देश की सीमा समाप्त होती थी।
गंगा जी के उस पार उड़ीसा-देश की सरहद थी और उसी पर जयपुर-माजिलपुर उड़ीसा के महाराज की अन्तिम सीमा के नगर थे। इन दोनों स्थानों में तीन-चार कोस का अन्तर था। गौड़-देश और उड़ीसा-देश की सीमा को भगवती भागीरथी ही पृथक करती थीं।
यह हम पहले ही बता चुके हैं कि वह युद्ध का समय था। जिधर देखो उधर ही युद्ध छिड़ा हुआ है। गौड़देश के बादशाह और उड़ीसा के तत्कालीन महाराज प्रताप रुद्र के बीच मे तो लड़ाई-झगड़ा होता रहता था। इसी कारण जगन्नाथ जी जाने वाले यात्रियों को गंगा पार होने में बड़ा कष्ट होता था। गौड़-देश के अधिपति की आज्ञा थी कि उधर से कोई भी पुरुष इधर न आने पावे। उधर उड़ीसा के शासक बंगालियों पर सन्देह करते। जो भी पार आता युद्ध के समय सब जगह एक राज्य की सीमा से दूसरे राज्य की सीमा में जाने पर सभी लोगों को बड़े-बड़े कष्ट सहने पड़ते हैं। दोनों देशों के शासक सदा शत्रुओं के मनुष्यों से शंकित रहते हैं। इसके अतिरिक्त पार उतारने वाले बिना उतराई लिये लोगों को पार उतारते ही नहीं थे। बहुत-से पुरी के यात्री उस पार जाने के लिये पड़े हुए थे। प्रभु भी अपने साथियों के सहित वहाँ पहुँच गये। मुकुन्ददत अपने सुरीले कण्ठ से कृष्ण-कीर्तन कर रहे थे। प्रभु उनके मुख से भगवान के मधुर नामों को सुनकर आनन्दन में विह्रल हो नृत्य कर रहे थे, उनके दोनों नेत्रों में से दो धाराएं निकलकर समुद्र में लीन होने वाली गंगा जी के वेग को और अधिक बढ़ा रही थीं। प्रभु की ऐसी अद्भुत अवस्था देखकर घाट पर के बहुत-से आदमी वहाँ आकर एकत्रित हो गये। सभी प्रभु के दर्शन से अपने को कृतार्थ मानने लगे।इस प्रकार अम्बुलिंग घाट पर पहुँचकर प्रभु ने साथियों सहित स्नान किया और भक्तों को अम्बुलिंग शिव जी के सम्बन्ध में कथा सुनाने लगे। प्रभु ने कहा- जब महाराज भगीरथ स्वर्ग से गंगा जी को ले आये, तब उनके शोक में विकल होकर शिव जी यहाँ जल में गिर पडे। गंगा जी के प्रेम के कारण यहाँ शिव जी के प्रेम को जानती थीं, उन्होंने यहीं आकर शिव जी की पूजा की और जल में रहने की प्रार्थना की। गंगा जी के प्रेम के कारण यहाँ शिव जी जल में ही निवास करते हैं, इसीलिये ये अम्बुलिंग कहाते हैं, इनके दर्शन से कोटि जन्मों के पापों का क्षय हो जाता हैं।’ इस प्रकार शिव जी का माहात्म्य सुनाकर प्रभु फिर प्रेम में विह्रल होकर नृत्य करने लगे। उसी समय उस प्रान्त के शासक राजा रामचन्द्र खाँ भी वहाँ आ पहुँचे। इस बात को हम पहले ही बता चुके है कि गौड़ाधिपति की ओर से बड़े-बड़े लोगों को बहुत-से गांवों का ठेका दिया जाता था और उन्हें बादशाह की ओर से मजूमदार, खान अथवा राजा की उपाधि भी दी जाती थी। रामचन्द्र खां गौड़ाधिप के अधीनस्थ गौड़देशीय सीमा प्रान्त के ऐसे ही राजा थे। रामचन्द्र खां जाति के कायस्थ थे और शाक्त-धर्म को मानने वाले थे। उनका जीवन जिस प्रकार साधारण विषयी धनी पुरुषों का होता है, उसी प्रकार का था, किन्तु वे भाग्यशाली थे, जिन्हें महाप्रभु की थोड़ी-बहुत सेवा करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। प्रभु के स्थान पर पधारने का समाचार सुनकर रामचन्द्र खां पालकी से उतरकर उनके दर्शन के लिये गये। उस समय आनन्द में विभोर हुए ‘महाप्रभु गदगद कण्ठ से कृष्ण का कीर्तन करते हुए रुदन कर रहे थे।
क्रमशः
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