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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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रामचन्द्र खां प्रभु के तेज और प्रभाव से प्रभावान्वित हो गये और उन्होंने दूर से ही प्रभु के पादपद्मों में प्रणाम किया। किन्तु प्रभु तो बाह्यज्ञान शून्य हो रहे थे। वे तो चक्षुओं को आवृत करके प्रेमामृत का पान कर रहे थे। उन्हें किसी के नमस्कार-प्रणाम का क्या पता। प्रभु के साथियों ने प्रभु को सचेत करते हुए राजा रामचन्द्र खाँ का परिचय दिया। प्रभु ने उनका परिचय पाकर प्रसन्नता प्रकट करते हुए कहा- ओह ! आपका ही नाम राजा रामचन्द्र खाँ है, आपके अकस्मात खूब दर्शन हुए !’
दोनों हाथो को अंजलि बांधे हुए रामचन्द्र खाँ ने कहा- प्रभो ! इस विषयी कामी पुरुष को ही रामचन्द्र खाँ के नाम से पुकारते हैं। आज मैं अपने सौभाग्य की सराहना नहीं कर सकता, जो मुझ-जैसे संसारी गर्त में सने हुए विषयी पामर को आपके दर्शन हुए। आपके दर्शन से मेरे सब पाप क्षय हो गये। अब आप मेरे योग्य जो भी आज्ञा हो, उसे बताइये।’
प्रभु ने कहा- ‘रामचन्द्र ! हम अपने प्राणवल्लभ से मिलने के लिये व्याकुल हो रहे हैं। पुरी में जाकर हम अपने हृदयमण के दर्शन करके जीवन को सफल बना सकें, तुम वैसा ही उद्योग करो। हमें घाट से उस पार पहुँचाने का प्रबन्ध करो। जिस प्रकार हम गंगा जी को पार कर सकें वही काम तुझे इस समय करना चाहिये।’
हाथ जोड़े हुए रामचन्द्र खाँ ने कहा- ‘प्रभो ! इस युद्धकाल में गौड़देशीय लोगों को उस पार उतारना बड़ा ही कठिन कार्य हैं। बादशाह की ओर से मुझे कठिन आज्ञा है कि जिस किसी पुरुष को वैसे ही पार न उतारा जाय। फिर भी मैं अपने प्राणों की बाजी लगाकर भी आपको पार उतारूँगा। आज आप कृपा करके यहीं निवास कीजिये, कल प्रात: मैं आपके पार होने का यथाशक्ति अवश्य ही प्रबन्ध कर दूँगा।’
रामचन्द्र खाँ की बात को प्रभु ने स्वीकार कर लिया और छत्रभोग नगर में जाकर प्रभु ने एक भाग्यवान ब्राह्मण के यहाँ निवास किया। रात्रिभर प्रभु अपने साथियों के सहित संकीर्तन करते रहे। संकीर्तन की सुमधुर ध्वनि से वह सम्पूर्ण स्थान परम पावन बन गया। वहाँ पर चारों ओर भगवन्नाम की ही गूंज सुनायी देने लगी। प्रभु के संकीर्तन को सुनने के लिये छत्रभोग के बहुत से नर-नारी एकत्रित हो गये और वे भी प्रभु के साथ ताली बजा-बजाकर कीर्तन करने लगे। रामचन्द्र खाँ भी उस संकीर्तनरसामृत का आस्वादन करके अपने जीवन को धन्य किया। इस तरह रात्रि भर संकीर्तन के प्रमोद मे ही प्रभु ने वह रात्रि बितायी।
महाप्रभु का प्रेमोन्माद और नित्यानन्दजी द्वारा दण्ड–भंग…….
छत्रभोग में उस रात्रि को बिताकर प्रभु प्रात:काल अपने नित्यकर्म से निवृत हुए। उसी समय रामचन्द्र खाँ ने समाचार भेजा कि प्रभु को पार करने के लिये घाट पर नाव तैयार हैं। इस समाचार को पाते ही प्रभु अपने साथियों के सहित नाव पर जाकर बैठ गये। मल्लाहों ने नाव खोल दी, महाप्रभु आनन्द के सहित हरिध्वनि करने लगे। भक्तों ने भी प्रभु की ध्वनि में अपनी ध्वनि मिलायी। उस गगनभेदी ध्वनि की प्रतिध्वनि जल में सुनायी देने लगी। दसों दिशाओं में से वही ध्वनि सुनायी देने लगी। तब प्रभु ने मुकुन्द दत्त से संकीर्तन का पद गाने के लिये कहा। मुकुन्द अपने मीठे स्वर से गाने लगे-
हरि हरये नम: कृष्ण यादवाय नम:।
गोपाल गोविन्द राम श्रीमधुसूदन।
अन्य भक्त भी मुकुन्द की ताल में ताल मिलाकर इसी पद का संकीर्तन करने लगे। महाप्रभु आवेश में आकर नाव में ही खड़े होकर नृत्य करने लगे। नौका नृत्य के वेग को न सह सकने के कारण डगमग-डगमग करने लगी। सभी मल्लाह घबड़ाने लगे कि हमारी नाव इस प्रकार के नृत्य से तो डूब जायगी। उन्होंने कहा-‘सन्यासी बाबा ! हमारे ऊपर दया करो, उस पार पहुँचकर जी चाहे जितना नृत्य कर लेना। हमारी नाव को पार भी लगने दोगे या बीच में ही डुबा दोगे?’
इस प्रकार मल्लाह कुछ क्षोभ के साथ दीन वचनों में प्रार्थना कर रहे थे, किन्तु महाप्रभु किसकी सुनने वाले थे। वे उनकी बातों को अनसुनी करके निरन्तर श्रीकृष्ण–कीर्तन करते ही रहे। तब तो नाविकों को बड़ा भारी आश्चर्य हुआ कि यह सन्यांसी हमारी बात तक नहीं सुनता और उसी प्रकार प्रेम में विह्वल होकर नृत्य कर रहा है। उन्होंने कुछ भय दिखाते हुए विवशता और कातरता के स्वर में कहा- ‘महाराज ! आप हमारी बात को मान जाइये। नाव में इस प्रकार उछल-उछलकर नृत्य करना ठीक नहीं है। आप देखते नहीं, उस पार घोर जंगल है, उसमें बड़े-बड़े खूंखार भेड़िये तथा जंगली सूअर रहते हैं। आपकी आवाज को सुनकर वे दौड़े आवेंगे, जल के भीतर मगर और घडियाल हैं, नदी में चारों ओर नावों पर चढ़कर डाकू चक्कर लगाते रहते हैं, वे जिसे भी पार होते देखते हैं, उसे ही लूट लेते हैं। कृपा करके आप बैठ जाइये और अपने साथ हमें भी विपत्ति के गाल में न डालिये।’
उनकी ऐसी कातर वाणी सुनकर मुकुन्द दत्त आदि तो कीर्तन करने से बंद हो गये, किन्तु भला प्रभु कब बंद होने वाले थे। वे उसी प्रकार कीर्तन करते ही रहे और अन्य साथियों को भी कीर्तन करने के लिये उत्साहित करने लगे। प्रभु के उत्साहपूर्ण वाक्यों को सुनकर फिर सब-के-सब कीर्तन करने लगे। धन्य हैं, ऐसे श्रीकृष्ण प्रेम को, जिसके आनन्द में प्राणो तक की भी परवा न हो। अमृत के सागर में डूबने का भय कैसा? श्रीकृष्ण नाम तो जीवों को आधि-व्याधि तथा सम्पूर्ण भयों से मुक्त करने वाला हैं। उसके सामने मगर, घड़ियाल, भेड़िया तथा डाकुओं का भय कैसा ? राम-नाम के प्रभाव से तो विष भी अमृत बन जाता है। हिंसक जन्तु भी अपना स्वभाव छोड़कर प्रेम करने लगते हैं। प्रभु को इस प्रकार कीर्तन में संलग्न देखकर नाविक समझ गये कि ये कोई असाधारण महापुरुष है, इन्हे कीर्तन से रोकना व्यर्थ हैं,जहाँ पर ये विराजमान हैं, वहाँ किसी प्रकार का अमंगल हो ही नहीं सकता। यही सोचकर वे चुप हो गये। फिर उन्होंने प्रभु से कीर्तन करने के लिये मना नहीं किया। प्रभु उसी प्रकार अपने अश्रुओं की धाराओं को गंगा जी के प्रवाह में मिलाते हुए कीर्तन करते रहे। उसी कीर्तन के समारोह में नाव प्रयाग घाट पर आ लगी। प्रभु अपने साथियों के सहित नाव से उतरे।
क्रमशः
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