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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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प्रभु और उनके साथियों ने प्रयागघाट पर स्‍नान किया और फिर आगे बढ़ें। अब उन्‍होंने गौड़-देश को छोड़कर उड़ीसा-देश की सीमा में प्रवेश किया। आज प्रभु ने अपने साथियों से कहा- ‘तुम लोग सब यहीं बैठो, आज मैं अकेला ही भिक्षा करने जाऊँगा।’ प्रभु जी की बात को टाल ही कौन सकता था ? सबने इस बात को स्‍वीकार किया। प्रभु अपने रंगे वस्‍त्र को झोली बनाकर भिक्षा मांगने के लिये चले।

उड़ीसा तथा बंगाल में बने-बनाये अन्‍न की भिक्षा देने की परिपाटी नहीं है। भट्टाचार्य ब्राह्मण संन्‍यासी को बने-बनाये सिद्ध अन्‍न की भिक्षा देने लगे हैं। पहले तो लोग सुखा ही अन्‍न भिक्षा में देते थे। ग्रामवासी स्‍त्री-पुरुष प्रभु की झोली में चावल दाल और चिउरा आदि डालने लगे। प्रभु जिसके भी द्वार पर जाकर ‘नारायण-हरि’ कहकर आवाज लगाते वही बहुत-सा अन्‍न लेकर उन्‍हें देने के लिये दौड़ा आता। उनके अद्भुत रुप-लावण्‍य को देखकर सभी स्‍त्री-पुरुष चकित रह जाते और एकटक भाव से प्रभु को ही निहारते रहते। उनके चेहरे में इतना अधिक आकर्षण था कि जो भी एक बार उनके दर्शन कर लेता वहीं अपना सर्वस्‍व प्रभु के उन पर निछावर कर देने की इच्‍छा करता। जिसके घर में जो भी उत्तम पदार्थ होता, वही लाकर प्रभु की झोली में डाल देता। इस प्रकार थोड़ी ही देर में प्रभु की झोली भर गयी। विवश होकर कई आदमियों की भिक्षा लौटानी पड़ी। इससे प्रभु को भी कुछ दु:ख-सा हुआ। वे अपनी भरी हुई झोली को लेकर बाहर बैठे हुए अपने भक्‍तों के समीप आये। नित्‍यानन्‍द जी भरी हुर्इ झोली को देखकर हंसने लगे। अन्‍त में जगदानन्‍दजी ने प्रभु से झोली लेकर भोजन बनाया और सभी ने साथ बैठकर बड़े ही आनन्‍द के सहित उस महाप्रसाद को पाया।भोजन करके आगे बढ़े। आगे चलकर पुरी जानेवाली सड़क पर उन्‍होंने कर-गृह देखा। वहाँ पर राजा की ओर से प्रत्‍येक यात्री पर कुछ नियमित शुल्‍क लगता था, तब यात्री आगे जा सकते थे। उस समय शुल्‍क लेने वाले अधिकारी यात्रियों से शुल्‍क लेने में इतनी अधिक कठोरता करते थे कि बिना नियमित द्रव्‍य लिये वे किसी को भी आगे नहीं जाने देते थे। यहाँ तक कि वे साधु-सन्‍यासियों तक से भी वसुल करते थे। प्रभु को भी उन लोगों ने आगे जाने से रोका और कहने लगे- ‘बिना नियमित द्रव्‍य दिये तुम आगे नहीं जा सकते।’

प्रभु इस बात को सुनते ही रुदन करने लगें। उनकी आँखों में से निरन्‍तर अश्रु निकल-निकलकर पृथ्‍वी को गीली कर रहे थे। वे ‘हा प्रभो ! हे मेरे जगन्‍नाथदेव ! क्‍या मैं तुम्‍हारे शीघ्र दर्शन न कर सकूंगा ? क्‍या नाथ ! मुझे तुम्‍हारे दर्शन होंगे?’ ऐसे आर्त वचनों को कह-कहकर रुदन करने लगे। इनके इस हृदयविदारक करुण क्रन्‍दन को सुनकर पाषाण-हृदय अधिकारी का हो सकता है? अवश्‍य ही ये कोई महापुरुष हैं। इन्‍हें जगन्‍नाथ जी जाने से नहीं रोकना चाहिये।’ यह सोचकर शुल्‍क एकत्रित करने वाला अधिकारी प्रभु के समीप जाकर पूछने लगा- ‘सन्‍यासी बाबा! तुम इतने अधीर क्‍यों होते हो? तुम्‍हारे साथ कितने आदमी है? तुम सब साथी कितने हो?’ प्रभु ने रोते-रोते अत्‍यन्‍त ही दीनभाव प्रदर्शित करते हुए कहा- ‘हमारा इस संसार में साथी ही कौन हो सकता है? हम तो घर-बार-त्‍यागी विरागी सन्‍यासी हैं, हम तो अकेले ही हैं। हमारा दूसरा कोई साथी नहीं है।’

प्रभु की ऐसी बात सुनकर अधिकारी ने कहा-‘अच्‍छा तो आप जायँ।’ उसकी बात सुनकर प्रभु आगे चलने लगे। थोड़ी दूर चलकर प्रभु अपने घुटनों में सिर देकर रुदन करने लगे। इनके रुदन को सुनकर अधिकारियों ने नित्‍यानन्‍द जी आदि भक्‍तों से इसके कारण की जिज्ञासा की। तब नित्‍यानन्‍द जी ने सब हाल बता दिया और कहा- ‘हम चारों प्रभु के साथी हैं, वे हमारे बिना अकेले न जायँगे’ तब अधिकारियों ने इन सबको भी जाने दिया।

इस प्रकार उन शुल्‍क एकत्रित करने वाले अधिकारियों के हृदय में अपने प्रेम-भाव को जताते हुए प्रभु अपने साथियों के सहित स्‍वर्णरेखा नदी के तट पर पहुँचे। वहाँ पहुँचकर प्रभु तो नित्‍यानन्‍दन जी को प्रतीक्षा में थोड़ी दूर पर जाकर बैठ गये। जगदानन्‍द–दामोदर आदि पीछे-पीछे आ रहे थे। जगदानन्‍द जी के हाथ में प्रभु का दण्‍ड था। उन्‍होंने नित्‍यानन्‍द जी से कहा- ‘श्रीपाद ! यदि आप महाप्रभु के इस दण्‍ड को भली-भाँति पकड़े रहें तो मैं गांव में से भिक्षा कर लाऊं।’
नित्‍यानन्‍द जी ने कहा- ‘अच्‍छी बात है, मैं दण्‍ड को खूब सावधानी से रखूँगा, तुम आनन्‍द के साथ जाकर भिक्षा कर लाओ।’ यह कहकर नित्‍यानन्‍द जी ने जगदानन्‍द पण्डित के हाथ में से दण्‍ड ले लिया। जगदानन्‍द भिक्षा करने चले गये।

इधर नित्‍यानन्‍द जी ने सोचा- ‘यह दण्‍ड तो प्रभु के लिये एक जंजाल ही है। जिन्‍हें प्रेम में अपने शरीर तक का होश नहीं रहता उन्‍हें दण्‍ड की भला क्‍या अपेक्षा हो सकती है? इसकी देख-रेख को एक और आदमी चाहिये। दण्‍ड का विधान तो साधारण अवस्‍था वाले सन्‍यासी के लिये हैं।

महाप्रभु तो प्रेम के अवतार ही हैं, ये तो विधि-निषेध दोनों से ही परे हैं। इसलिये इनके लिये इस दण्‍ड का रखना व्‍यर्थ है।’ ऐसा सोचकर नित्‍यानन्‍द जी ने उस दण्‍ड के बीच में से तीन टूकड़े कर दिये और उसे तोड़-ताड़कर वहीं फेंक दिया।

भिक्षा करके जगदानन्‍द पण्डित लौटे, उन्‍होंने नित्‍यानन्‍द जी के पास दण्‍ड न देखकर आश्‍चर्य के साथ पूछा- ‘श्रीपाद ! आपने दण्‍ड कहाँ रख दिया, कुछ गम्‍भीरता के साथ इधर-उधर देखते हुए धीरे से नित्‍यानन्‍द जी ने उतर दिया- ‘यही कहीं पड़ा होगा, देख लो।’

जगदानन्‍द जी ने देखा दण्‍ड एक ओर टूटा हुआ पड़ा है। टूटे हुए दण्‍ड को देखकर डरते हुए जगदानन्‍द जी ने कहा- 'श्रीपाद ! यह आपने क्‍या किया ? महाप्रभु के दण्‍ड को तोड़ दिया। उन्‍होंने तो मुझे सावधानी से रखने के लिये दिया था, आपने प्रभु के दण्‍ड को तोड़कर अच्‍छा काम नहीं किया, अब मैं उनसे जाकर क्‍या कहूंगा ?’

यह कहकर जगदानन्‍दजी बहुत ही दु:खी प्रकट करते हुए कहने लगे- ‘प्रभो ! नित्‍यानन्‍दजी को दण्‍ड देकर मैं भिक्षा करने के निमित्‍त समीप के ग्राम में गया था, तब तक उन्‍होंने दण्‍ड को तोड़ डाला। इसमें मेरा कुछ भी अपराध नहीं है।
क्रमशः

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