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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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पुरी महाशय ने उस दूध को पीया। इतना स्‍वादिष्‍ट दूध उन्‍होंने अपने जीवन में कभी नहीं पीया था, वे मन में अत्‍यन्‍त ही प्रसन्‍न हाते हुए उस दूध को पीने लगे। उनके हृदय में उस साँवले ग्‍वाले के लड़के की सूरत गड़-सी गयी थी, वे बार-बार उसका चिन्‍तन करने लगे। दूध पीकर पात्र को पृथ्‍वी पर रख दिया और उस ग्‍वाल-कुमार की प्रतीक्षा में बैठे रहे। आधी रात्रि बैठे-ही-बैठे बीत गयी, किन्‍तु वह ग्‍वाल-कुमार नहीं लौटा। अब तो पुरी महाराज की उत्‍सुकता उस लड़के को देखने की अधिकाधिक बढ़ने लगी। उसी स्थिति में उन्‍हें कुछ तन्‍द्रा-सी आ गयी। उसी समय सामने वही बालक खड़ा हुआ दिखायी देने लगा। उसने हंसते-हंसते कहा- पुरी ! मैं बहुत दिन से तुम्‍हारे आने की प्रतीक्षा कर रहा था। तुम आ गये, यह अच्‍छा ही हुआ। ग्‍वाले के लड़के के वेष में ही तुम्‍हें दुग्‍ध दे गया था। अब तुम मेरी फिर से यहाँ प्रतीक्षा करो। मैं यहाँ इस पास की झाड़ी के नीचे दबा हुआ हूँ। पहले मेरा यहाँ मन्दिर था, मेरा पुजारी म्‍लेच्‍छों के भय से मुझे इस झाड़ी के नीचे गाड़कर भाग गया था। तब से मैं इस झाड़खण्‍ड में ही दबा हुआ पड़ा हूँ। अब तुम मुझे यहाँ से निकालकर मेरी विधिवत पूजा करो। मेरा नाम ‘श्री गोपाल’ है, मैंने ही इस गोवर्धन को धारण किया था, तुम इसी नाम से मेरी प्रतिष्‍ठा करना।’ इतना कहकर वह बालक पुरीक का हाथ पकड़कर उस कुंज के समीप ले गया और उन्‍हें वह स्‍थान दिखा दिया।

आँखे खुलने पर पुरी महाराज चारों ओर देखने लगे, किन्‍तु वहाँ कोई नहीं था। प्रात: काल उन्‍होंने ग्राम के लोगों को बुलाकर सब वृतान्‍त कहा और श्रीगोपाल के बताये हुए स्‍थान को उन्‍होंने खुदवाया। बहुत दूरी खुदने पर उसमें से एक बहुत ही सुन्‍दर श्‍यामवर्ण की सुन्‍दर सी मन को मोहने वाली मूर्ति निकली। पुरी ने उसी समय ग्रामवासियों से एक छप्‍पर छवाकर उसमें एक ऊँचा-सा आसन बनाया और उसके उपर उस श्री गोपाल की मूर्ति को स्‍थापित किया। मूर्ति को स्‍थापित करके उन्‍होंने विधिवत भगवान को पंचामृत से स्‍नान कराया, फिर शीतल जल से भगवान के श्रीविग्रह को खूब मल-मलकर धोया। सुगन्धित चन्‍दन घिसकर सम्‍पूर्ण शरीर पर लेपन किया और धूप, दीप, नैवेद्य तथा वन्‍य फल-फूलों से उनकी यथाविधि पूजा की।अब पुरी महाराज ने अन्‍नकूट-उत्‍सव करने का निश्‍चय किया। उस ग्राम में जितने ब्राह्मणों के घर थे, सभी से कह दिया कि वे यथाशक्ति अपने घर से भोजन की सामग्री लेकर अपनी-अपनी स्त्रियों के सहित यहाँ अपनी-अपनी रुचि के अनुसार भाँति-भाँति के व्‍यंजन बनावें। सभी ब्राह्मणों ने प्रसन्‍नतापूर्वक पुरी की आज्ञा का पालन किया। वे अपने-अपने घरों से बड़े-बड़े घड़ों में दूध, दही तथा घृत भर-भरकर पुरी की कुटिया के समीप लाने लगे। ग्‍वालों ने अपने घर का सम्‍पूर्ण दूध दे दिया। दूकान करने वाले बनियों ने चावल, बूरा तथा घृत आदि बहुत-सी भोजन की सामग्री भगवान के भोग के लिये प्रदान की। सुपात्र ब्राह्मणों की स्त्रियाँ आ-आकर अपनी-अपनी इच्‍छा के अनुसार सुन्‍दर-सुन्‍दर पदार्थ भगवान के भोग के लिये तैयार करने लगीं। पदार्थो में कच्‍चे-पक्‍के का भेद-भाव नहीं था, जिसे जो भी बनाना आता था और जिसे जो भी अधिक प्रिय था, वही अपनी शुद्ध भावना के अनुसार उसी पदार्थ को भक्तिभाव से बनाने लगी।

कोई तो फिलौरीदार बढ़िया कढ़ी ही बना रही है, कोई मूँग के, उड़द के बड़े ही बनाती है, कोई दही-बड़े, काँजी के बड़े, सोंठ के बड़े बना-बनाकर रख रही है, कोई पूड़ी, कचौड़ी, मालपुआ, मीठे पुआ, बेसन के पुआ, बाजरे की टिकियाँ ही बना रही है, कोई बेसन के लड्डू, मूँग के लड्डू, निकुती के लड्डू, सूजी के लड्डू, चूरमा के लड्डू, काँगनी के लड्डू आदि भाँति-भाँति के लड्डूओं को ही भोग के तैयार कर रही है, कोई भाँति-भाँति के साग, खट्टे, मीठे विविध प्रकार के रायते ही बना-बनाकर एक ओर रखती जाती है, कोई छोटी-छोटी बाटियाँ ही बनाकर उन्‍हें घी के डूबो-डूबोकर रखती जा रही है, कोई उन्हे हाथ से मीजकर चूरमा बना रही है, कोई पतली-पतली फुलकियाँ पका रही है, कोई-कोई मोटे-मोटे रोट ही बनाकर भगवान को खिलाना चहाती है, कोई काँगनी का भात बना रही है तो कोई बाजरे का भात रही है। कोई रमासों को उबालकर हीं छौंक रही है। कोई चनों को फुलाकर उन्हें घी में तल रही है। कोई अमचूर की, पोदीना की मेवाओं की, इमली की तथा और भी कई प्रकार की चटनियों को पीस-पीसकर पत्थर की कटोरियों में रखती जाती है। कोई मखानों की, चावलों की तथा और भी भाँति-भाँति की खीर ही बना रही है, कोई दूध का खोआ बनाकर पेड़ा, बरफी, खोआ के लड्डू, गुलाबजामुन आदि फलाहारी मिठाइयाँ बना रही है, कोई दूध की रबड़ी बना रही है, कोई खुरचन तैयार करके दूसरी ओर रखती जाती है, कोई मट्ठा की महेरी ही भगवान को भोग लगाना चाहती है। कोई सुन्‍दर-सुन्‍दर भाँति-भाँति के चावलों को ही इस प्रकार से राँध रही है। कोई रोटियों को दूध में मीजकर उन्‍हें दूध में फुला रही है। कोई लपसी बना रही है। कोई हलवा, मोहनभोग, दूधलपसी आदि पदार्थो को बनाने मे लगी हुई है।इस प्रकार सभी ने अपनी-अपनी इच्‍छा के अनुसार सैकड़ों प्रकार के षटरसयुक्‍त भोजन बनाये। उन्‍होंने क्‍या बनाये, श्री गोपाल भगवान ने स्‍वंय उनके हृदय में प्रेरणा बनवाये, नहीं तो भला गांव की रहने वाली वे गंवारों की स्त्रियाँ ऐसे पदार्थो का बनाना क्‍या जानें। भगवान तो सर्वसमर्थ हैं, वे जिसके हाथ से जो भी चाहें करा सकते हैं।

इस प्रकार सब सामान तैयार होने पर पुरी महाराज ने भगवान का भोग लगाया। पता नहीं भगवान कितने दिनों के भूखे थे, देखते-ही-देखते वे उन सभी पदार्थो को चट कर गये। पुरी महाशय को बड़ा विस्‍मय हुआ। तब भगवान ने हंसकर अपने हाथों से उन पात्रों को छू दिया। भगवान के स्‍पर्शमात्र से ही वे सभी पदार्थ फिर ज्‍यों-के-त्‍यों ही हो गये। पुरी महाराज ने प्रसन्‍नता प्रकट करते हुए सभी व्रजवासी स्‍त्री-पुरुष, बालक-वृद्ध तथा युवकों को वह प्रसाद बाँटा।
क्रमशः

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