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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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पुरी महाराज ने भगवान श्रीगोपाल को प्रकट किया है, यह समाचार दूर-दूर तक फैल गया था। हजारों स्‍त्री-पुरुष भगवान के दर्शन के लिये आने लगे। उस दिन भगवान के दर्शन को जो भी आता, उसे ही पेट भरकर प्रसाद मिलता। रात्रिपर्यन्‍त हजारों आदमी आते-जाते रहे, किंतु अन्‍त तक सभी को यथेष्‍ट प्रसाद मिला, कोई भी प्रसाद से विमुख होकर नहीं गया। इस प्रकार उस दिन का अन्‍नकूट उत्‍सव बड़ा ही अदभुत रहा।

इसके पश्‍चात अन्‍य ग्रामों के भी पुरुष बारी-बारी से श्रीगोपाल भगवान का अन्‍नकूट करने लगे। इस प्रकार रोज ही पुरी महाराज की कुटिया में अन्‍नकूट की धूम रहने लगी। यह समाचार दूर-दूर फैल गया। मथुरा के बड़े-बड़े सेठ श्रीगोपाल भगवान के दर्शन को आने लगे और वे सोना, चांदी, हीरा, जवाहिरात तथा भाँति-भाँति के वस्‍त्राभूषण भगवान की भेंट करने लगे। किसी पुण्‍यवान पुरुष ने श्रीगोपाल भगवान का बड़ा भारी विशाल मन्दिर बनवा दिया। सभी व्रजवासियों ने एक-एक, दो-दो गाय मन्दिर के लिये भेंट दी। इससे हजारों गौएं मन्दिर की हो गयीं।

पुरी महाराज बड़े ही भक्तिभाव से भगवान की सेवा-पूजा करने लगे। उनका शरीर कुछ क्षीण-सा हो गया था; वे सेवा-पूजा के लिये कोई योग्‍य शिष्‍य चाहते थे, उसी समय गौड़-देश से दो सुन्‍दर युवक आकर पुरी महाराज के शरणापन्‍न हुए। पुरी ने उन्‍हें योग्‍य समझकर दीक्षित किया और उन्‍हें श्रीगोपाल भगवान की पूजा का काम सौंपा। इस प्रकार दो वर्षो तक पुरी महाराज श्रीगोपाल भगवान की पूजा करते रहे।

एक दिन स्‍वप्‍न में भगवान ने पुरी महाराज से कहा- ‘माधवेन्‍द्र ! बहुत दिनों तक पृथ्‍वी के अंदर रहने के कारण हमारे सम्‍पूर्ण शरीर में दाह होती है, यदि तू जगन्‍नाथ पुरी से मलयागिरी-चन्‍दन लगाकर हमारे शरीर में लेपन करे तो हमारी यह गर्मी शान्‍त हो।’
भगवान की आज्ञा शिरोधार्य करके दूसरे दिन शिष्‍यों को पूजा का सभी काम सौंपकर और भगवान से आज्ञा प्राप्‍त करके पुरी महाराज ने नीलाचल के लिये प्रस्‍थान किया। इसी यात्रा में वे नवद्वीप पधारे और अद्वैताचार्य के घर पर आकर ठहरे। आचार्य उनके अदभुत भक्तिभाव को देखकर उनके भगवत-प्रेम पर आसक्‍त हो गये और उन्‍होंने पुरी महाराज से दीक्षा लेकर उन्‍हें अपना गुरु बनाया। कुछ दिन शान्तिपुर में रहकर और अद्वैताचार्य को दीक्षा देकर पुरी महाराज नीलाचल के लिये चले। चलते-चलते वे यहाँ रेमुणाय में आये और उन्‍होंने श्रीगोपीनाथ के दर्शन किये। गोपीनाथ भगवान के दर्शन से पुरी को अत्‍यन्‍त ही प्रसन्‍नता हुई। यहाँ पर भगवान का साज-श्रृंगार तथा भोग-राग बड़ी ही भावमय पद्धति से किया जाता था, पुरी महाराज वहाँ की पूजा पद्धति को खूब ध्‍यानपूर्वक देखते रहे। अन्‍त में उन्‍होंने पुजारियों से पूछा- ‘यहाँ पर भगवान का मुख्‍य भोग किस वस्‍तु का लगता है?’ पुजारियों ने उतर दिया- ‘यहाँ श्रीगोपीनाथ भगवान का क्षीरभोग ही सर्वोत्तम प्रधान भोग है।

गोपीनाथ जी की क्षीर को ‘अमृतकेलि’ नाम से पुकारते हैं। गोपीनाथ जी की प्रसादी खीर सर्वत्र प्रसिद्ध है। बारह पात्रों में शाम को खीर का भोग लगता है।’

पुरी महाराज की इच्‍छा थी, कि मैंने पूजा की पद्धति तो समझ ली, किन्‍तु खीर कैसी होती है, इसे मैं ठीक-ठीक नहीं समझ सका। यदि भगवान की प्रसादी थोड़ी-सी खीर मिल जाती, तो उसका स्वाद देखकर मैं भी अपने श्री गोपाल को ऐसी ही खीर अर्पण करता। इस विचार के मन में आते ही उन्‍हें भय प्रतीत हुआ कि यह मेरी जिह्रा-लोलुपता तो नहीं है। ऐसे भाव रसना-स्‍वाद के निमित तो मेरे हृदय में उत्‍पन्‍न नहीं हो गये। फिर उन्‍होंने सोचा- ‘भगवान के प्रसाद में क्‍या इन्द्रिय-लोलुपता? मैं जिह्वा-स्‍वाद के लिये तो इच्‍छा कर ही नहीं रहा हूँ, अपने भगवान को भी ऐसी ही खीर खिलाने की मेरी इच्‍छा थी।’ इन विचारों से उन्‍हें कुछ-कुछ सन्‍तोष हुआ, किन्‍तु वे किसी से प्रसाद माँग तो सकते ही नहीं थे, कारण कि उनका तो अयाचित व्रत था। बिना मांगे जो भी कोई कुछ दे देता, उसी से जीवन-निर्वाह करते, इसलिये प्रसाद को चखने की उनकी इच्‍छा मन-की-मन में ही रह गयी। उन्‍होने किसी के सामने अपनी इच्‍छा प्रकट नहीं की। संध्‍या को भोग लगाकर शयन-आरती हो गयी। भगवान के कपाट बंद कर दिये गये। सभी लोग अपने-अपने घरों को चले गये। पुरी महाशय भी गांव से थोड़ी दूर पर एक कुटिया में जाकर पड़ रहे।

आधी रात्रि के समय पुजारी ने स्‍वप्‍न देखा- मानो साक्षात गोपीनाथ भगवान उसके सामने खड़े होकर कह रहे हैं- ‘पुजारी! पुजारी !! तुम अभी उठकर मेरा एक जरुरी काम करो। मेरा एक परम भक्त माधवेन्‍द्रपुरी नाम का महाभागवत संन्‍यासी ग्राम के बाहर ठहरा हुआ है। उसकी इच्‍छा मेरे ‘क्षीर-प्रसाद’ को पाने की है। अपने भक्‍त की मनोवांछा को पूर्ण करने के निमित्त मैंने अपने भोग के बारह पात्रों में से एक को चुराकर अपने वस्‍त्रों में छिपा लिया है, तुम उसे ले जाकर अभी माधवेन्‍द्र को दे आओ।’ इतना सुनते ही पुजारी चौंककर उठ पड़ा। उसने भगवान के पट खोलकर उनके वस्‍त्रों को देखा। सचमुच उनमें एक क्षीर से भरा पात्र छिपा हुआ रखा है। पुजारी उस पात्र को लेकर नगर के चारों ओर चिल्‍लाता फिर रहा था- ‘माधवेन्‍द्रपुरी किनका नाम है? जो माधवेन्‍द्रपुरी नाम के साधु हों, वे इस क्षीर के पात्र को ले लें। भगवान ने उसके निमित्त क्षीर की चोरी की है।’

इस प्रकार चिल्‍लाते-चिल्‍लाते पुजारी उसी स्‍थान पर पहुँचा जहाँ पुरी महाराज ठहरे हुए थे। भगवान के पुजारी के मुख से अपना नाम सुनकर पुरी महाराज बाहर निकल आये और कहने लगे- ‘महाराज ! मेरा ही नाम माधवेन्‍द्रपुरी है, कहिये क्‍या आज्ञा है?’

पुरी महाराज का परिचय पाकर पुजारी उनके पादपद्मों में प्रणत हुआ और बड़े ही विनीत वचनों से कहने लगा- ‘महाभाग ! आप धन्‍य है।

आपकी इस अलौकिक भक्ति को कोटि-कोटि धन्‍यवाद है ! आज हम आपके दर्शन से कृतार्थ हुए। इतने दिन की भगवान् की पूजा का फल आज प्राप्‍त हो गया। हम-जैसे पैसों के गुलामों को भगवान के साक्षात दर्शन तो हो ही कैसे सकते हैं? किन्‍तु हम अपना इसी में अहोभाग्‍य समझते है कि भगवान की पूजा करने के प्रभाव से आप-जैसे भगवान के परम प्रिय भक्त के दर्शन हो गये।
क्रमशः

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