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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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अन्‍य उपस्थित भक्त भी प्रभु को रुदन करते देखकर जोरों से क्रन्‍दन करने लगे। उसी समय भगवान का भोग लगाकर शयन-आरती हुई। प्रभु ने सभी भक्‍तों के सहित शयन-आरती के दर्शन किये और फिर वहीं मन्दिर के समीप ही एक स्‍थान में रात्रि बिताने का निश्‍चय किया।

पुजारियो ने लाकर भगवान के क्षीर-भोग के बारह पुत्र प्रभु के सामने रख दिये। प्रभु भगवान के उस महाप्रसाद के दर्शनमात्र से ही परम प्रसन्‍न हो उठे। प्रसन्‍नता प्रकट करते हुए उन्‍होंने कहा- आज हमारा जन्‍म सफल हआ, जो हम गोपीनाथ भगवान के क्षीर के अधिकारी समझे गये। भगवान के प्रसाद के सम्‍बन्‍ध में लोभवृति करना ठीक नहीं है। हम पाँच ही आदमी हैं, अत: आप हमें पांच पात्र देकर सात पात्रों को उठा ले जाइये। भगवान के प्रसाद के अधिकारी सभी हैं। उसे अकेले-ही-अकेले पा लेना ठीक नहीं है। यह कहकर प्रभु ने पाँच पात्रों को ग्रहण करके शेष सात पात्रों को लौटा दिया।

भगवान के उस अदभुत महाप्रसाद ने प्रभु ने अपने भक्तों के साथ श्रद्धासहित पाया और वह रात्रि वहीं भगवान के चरणों के समीप बितायी।

श्रीसाक्षीगोपाल…..

प्रात:काल उठकर प्रभु नित्‍यकर्म से निवृत हए और भगवान श्रीगोपीनाथ जी की मंगल-आरती के दर्शन करके उन्‍होंने भक्तों के सहित आगे के लिये प्रस्‍थान किया। रास्‍ते में उन्‍हें वैतरणी नदी मिली। उसमें स्‍नान करके प्रभु राजपुर में पहुँचे। वहाँ वराह भगवान का स्‍थान हैं। वराहभगवान के दर्शन करने के अनन्‍तर याजपुर में होते हुए और शिवलिंग, विरजादर्शन तथा ब्रह्मकुण्‍ड में स्‍नान करते हुए नाभिगया में पहुँचे। वहाँ दशाश्‍वमेध घाट पर स्‍नान करके कण्‍टक नगर में पहुँचकर भगवान साक्षिगोपाल के दर्शन किये। साक्षिगोपाल जी के मन्दिर में बहुत देर तक कृष्‍ण-कीर्तन होता रहा। नगर के बहुत-से नर-नारी प्रभु के कीर्तन और नृत्‍य को देखने के लिये एकत्रित हो गये। प्रभु को नृत्‍य करते देखकर ग्रामवासी स्‍त्री-पुरुष भी आनन्‍द में उन्‍मत होकर कठपुतलियों की तरह नाचने-कूदने लगे। बहुत देर तक संकीर्तन-आनन्‍द होता रहा। तब प्रभु ने अपने भक्‍तों के सहित साक्षिगोपाल के मन्दिर में विश्राम किया।

रात्रि में भक्‍तों के साथ कथोपकथन करते-करते प्रभु ने नित्‍यानन्‍द जी से पूछा- ‘श्रीपाद ! आपने जो प्राय: भारत वर्ष के सभी मुख्‍य-मुख्‍य तीर्थो में भ्रमण किया है। आपसे तो सम्‍भवतया कोई प्रसिद्ध तीर्थ न बचा हो, जहाँ जाकर आपने दर्शन-स्‍नानादि न किया हो?’

कुछ धीरे से नित्‍यानन्‍दन जी ने कहा- ‘हाँ, प्रभो ! बारह वर्ष मेरे इसी प्रकार तीर्थो के भ्रमण में व्‍यतीत हुए।’ प्रभु ने पूछा-‘यहाँ भी पहले आये थे?’ नित्‍यानन्‍दन जी ने उतर दिया- ‘पुरी से लौटते हुए मैंने साक्षिगोपाल भगवान के दर्शन किये थे।’

प्रभु ने कहा- ‘तीर्थ में जाकर उस तीर्थ का माहात्‍म्‍य अवश्‍य सुनना चाहिये। बिना महात्‍म्‍य सुने तीर्थ का फल आधा ही होता है। आप मुझे साक्षिगोपाल का माहात्‍म्‍य सुनाइये। इनका नाम साक्षिगोपाल क्‍यों पड़ा? इन्‍होंने किसकी साक्षी दी थी?’ प्रभु की ऐसी आज्ञा सुनकर धीरे-धीरे नित्‍यानन्‍द जी कहने लगे- ‘मैंने किसी पुराणों में से तो साक्षिगोपाल भगवान की कथा नहीं सुनी, क्‍योंकि यह बहुत प्राचीन तीर्थ नहीं है। अभी थोड़े ही दिनों में साक्षिगोपाल भगवान विद्यानगर से यहाँ पधारे हैं। लोगों के मुख से मैने जिस प्रकार साक्षिगोपाल की कथा सुनी है, उसे सुनाता हूँ।’

तैलंग-देश में गोदावरी नदी के तट पर ‘विद्यानगर’ नाम की कोट-देश की प्राचीन राजधानी थी। वह नगर बड़ा ही समृद्धशाली तथा समुद्र के समीप होने के कारण वाणिज्‍य-व्‍यापार का केन्‍द्र था। उसी नगर में एक समृद्धशाली कुलीन ब्राह्मण रहता था। ब्राह्मण भगवत-भक्‍त था। वह गौ, ब्राह्मण तथा देवप्रतिमाओं में भक्ति रखता था। घर में खाने-पीने की कमी नहीं थी। लड़के बड़े हो गये थे, इसलिये घर के सम्‍पूर्ण कामों को वे ही करते थे। यह वृद्ध ब्राह्मण तो माला लेकर भजन किया करता था।घर में पुत्र, पुत्रवधू, स्‍त्री तथा एक अविवाहित छोटी कन्‍या थी। ब्राह्मण की इच्‍छा तीर्थ यात्रा करने की हुई। उस वृद्ध ब्राह्मण के समीप ही एक गरीब ब्राह्मण का लड़का रहता था। उसके माता-पिता उसे छोटा ही छोड़कर परलोकवासी हो गये थे। जिस किसी प्रकार मेहनत-मजूरी करके वह अपना निर्वाह करता था। किन्‍तु उसके हृदय में भगवान के प्रति पूर्ण श्रद्धा थी। वह एकान्‍त में सदा भगवान का भजन किया करता था। इस कारण उस पर भगवान की कृपा थी। भगवान की कृपा की सबसे मोटी पहचान यही है कि जिसे ब्राह्मणों में, तीर्थों में, भगवत-चरित्रों में, देवस्‍थानों में, भगवत्‍प्रतिमाओं में, गौओं में, तुलसी-पीपल आदि पवित्र वृक्षों में श्रद्धा हो, इन सबके प्रति हार्दिक अनुराग हो, उसे ही समझना चाहिये कि वह भगवत-कृपा का पात्र बन चुका है। उस ब्राह्मण कुमार का इन सबके प्रति अनुराग था, इसीलिये वह वृद्ध ब्राह्मण इस लड़के पर स्‍नेह करता था।

एक दिन उस वृद्ध ब्राह्मण ने इस युवक से कहा-‘भाई ! यदि तुम्‍हारी इच्‍छा हो तो चलो तीर्थ यात्रा कर आवें। गृहस्‍थी के जंजाल से कुछ दिन के लिये तो छूट जायँ।’

प्रसन्‍नता प्रकट करते हुए युवक ने कहा- ‘इससे बढ़कर उत्तम बात और हो ही क्‍या सकती है? तीर्थ यात्रा का सुयोग तो किसी भाग्‍यवान पुरुष को ही प्राप्‍त हो सकता है। मैं आपके साथ चलने के लिये तैयार हूँ।’

अपने मन के योग्‍य साथी पाकर वह वृद्ध ब्राह्मण बहुत ही प्रसन्‍न हआ और उस युवक को साथ लेकर तीर्थ यात्रा के लिये घर से निकल पड़ा। दोनों ही गया, काशी, प्रयाग, अयोध्‍या, नैमिषारण्‍य, ब्रह्मावर्त आदि तीर्थ स्‍थानों के दर्शन करते हुए व्रजमण्‍डल में पहुँचे। वहाँ पर इन्‍होंने भद्रवन, विल्‍ववन, लोहवन, भाण्‍डीवन, महावन, मधुवन, तालवन, बहुलावन, काम्‍यवन, खदिरवन और श्रीवृन्‍दावन आदि बारह वनों तथा उपवनों की यात्रा की।

व्रज के नंदगाँव, बरसाना, गोवर्धन आदि सभी तीर्थों के दर्शन करते हुए इन लोगों ने वृन्‍दावन में आकर कुछ दिन विश्राम किया। उस छोटे ब्राह्मणकुमार ने सम्‍पूर्ण यात्रा में उस वृद्ध ब्राह्मण की बड़े ही नि:स्‍वार्थभाव से सब प्रकार की सेवा-शुश्रूषा की। वह वृद्ध ब्राह्मण इस युवक की सेवा-शुश्रूषा से बहुत ही अधिक सन्‍तुष्‍ट हुआ। उसने गोपाल जी के मन्दिर में कृतज्ञता प्रकट करते हुए उस ब्राह्मण कुमार से कहा- ‘भाई ! तुमने हमारी ऐसी अद्भुत सेवा की है कि ऐसी सेवा पुत्र अपने पिता की भी नहीं कर सकता।
क्रमशः

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