cc 197
श्री श्री चैतन्य चरितावली
197-
इसने मेरे पिता से धन अपहरण करने के लिये उन्हें धतूरा खिला दिया और सब धन ले लिया। अब ऐसी बातें बनाता है। भला, मेरे पिता ऐसे अकुलीन, घरबारहीन, कंगाल को अपनी पुत्री देने का वचन कभी दे सकते हैं?’
पंचों ने उस युवक से कहा- ‘क्यों भाई! यह क्या कह रहा है? वृद्ध ने जब तुम्हें पुत्री देने का वचन दिया, उस समय वहाँ कोई और भी पुरुष था, तुम किसी की साक्षी दे सकते हो?’
युवक ने गम्भीरता के साथ कहा- 'गोपाल जी के ही सामने इन्होंने कहा था और गोपाल जी को छोड़कर और मेरा कोई दूसरा साक्षी नहीं है।’
एक युवक ने पंच ने इस बात को सुनकर हंसी के स्वर में कहा- ‘तो क्या तुम गोपाल को यहाँ साक्षी देने के लिये ला सकते हो?
आवेश में आकर जोर से उस युवक ने कहा- ‘हाँ, ला सकता हूँ।’
इस बात को सुनते ही सभी अवाक रह गये और आश्चर्य प्रकट करते हुए एक स्वर में सब के-सब कहने लगे- हाँ,हाँ, यदि तुम साक्षी के लिये गोपाल जी को ले आओ और सब पंचों के सामने गोपाल जी तुम्हारी साक्षी दे दें तो हम जबरदस्ती लड़की का विवाह तुम्हारे साथ करवा सकते है।’
इस बात से प्रसन्नता प्रकट करते हुए वृद्ध ब्राह्मण ने कहा- ‘हाँ, यही ठीक है। यदि यह साक्षी के लिये गोपाल जी को ले आवें तो मैं अपनी कन्या का विवाह इसके साथ जरूर कर दूँगा।’ वृद्ध को विश्वास था कि भक्तवत्सल भगवान मेरी प्रतीज्ञा को पूर्ण करने के निमित और इस ब्राह्मणकुमार की लाज बचाने के निमित्त अवश्य ही साक्षी देने के लिये आ जायँगे किंतु उसके उस उद्दण्ड पुत्र को इस बात का विश्वास कब हो सकता था कि पाषाण की मूर्ति भी साक्षी देने के लिये कभी आ सकती है क्या? उसने सोचा, यह अपने-आप ही बहुत अच्छा उपाय निकल आया। न तो पत्थर की प्रतिमा साक्षी देने के लिये यहाँ आवेगी और न मुझे अपनी बहिन का विवाह इसके साथ करना होगा। यह सोचकर वह जल्दी से बोल उठा- ‘यह बात मुझे भी मंजूर है, यदि गोपाल जी आकर सबके सामने इस बात की साक्षी दे जायँ तो मैं अवश्य ही इन्हें अपना बहनोई बना लूँगा।’
विश्वासी युवक ने पंचों से इस बात पर हस्ताक्षर करा लिये तथा पुत्रसहित उस वृद्ध ब्राह्मण के भी हस्ताक्षर ले लिये कि यदि गोपाल साक्षी देने आ जायँगें, तो हम अवश्य इनका विवाह कर देंगे। सबसे लिखवाकर वह सीधा वृन्दावन पहुँचा और वहाँ जाकर उसने बड़ी ही दीनता के साथ कातरवाणी में गोपाल जी से प्रार्थना की। भक्त के आर्तनाद को सुनकर भगवान प्रकट हुए और उससे कहा- ‘तुम चलो, मैं वही प्रकट होकर तुम्हारी साक्षी दूँगा।’
युवक ने कहा- ‘भगवन् ! ऐसे काम नहीं चलेगा। पता नहीं, आप किस रुप से प्रकट हों और उन लोगों को उस पर विश्वास हो या न हो। इसलिये आप इसी प्रतीमा के रुप से मेरे साथ चलें।’
भगवान ने हंसकर कहा- ‘कहीं पत्थर की प्रतिमा भी चलती है? यह एकदम असम्भव बात है।’
युवक भक्त ने कहा- ‘प्रभो ! आपके लिये कुछ भी असम्भव हो !’ आपको इसी रूप से मेरे साथ चलना होगा।’
भगवान तो भक्तों के अधीन हैं, उन्होंने स्वीकार कर लिया और कहने लगे- ‘तुम आगे-आगे चलो, मैं तुम्हारे पीछे-पीछे चलूँगा। तुम पीछे फिरकर मेरी ओर न देखना। जहाँ तुम पीछे फिरकर देखोगे, मैं वहीं स्थिर हो जाऊँगा।’
भक्त ने कुछ जोर देकर कहा- ‘तब मुझे कैसे पता चलेगा कि आप मेरे पीछे आ ही रहे हैं? कहीं बीच में से ही लौट पड़े तब ?’
भगवान ने हंसकर कहा-‘तुम्हें पीछे से बजती हुई मेरे पैरों की पैंजनी की आवाज सुनायी देती रहेगी, उसी से तुम समझ लेना कि मैं तुम्हारे साथ आ रहा हूँ।’
भक्त ने इस बात को स्वीकार किया और वह आगे-आगे चलने लगा, पीछे से उसे भगवान के पैरों से बजते हुए नुपूरों की ध्वनि सुनायी देती थी, इसी से उसे पता रहता था कि भगवान मेरे पीछे-पीछे आ रहे हैं। रास्ते में विविध प्रकार के भोजन बनाकर भगवान का भोग लगाता हुआ वह विद्यानगर के समीप आ गया। नगर के समीप आने पर उस से रहा न गया। उसने सोचा- ‘एक बार देख तो लूँ भगवान मेरे पीछे हैं या नहीं। यह सोचकर उसने पीछे को दृष्टि फिरायी। वहीं हंसकर भगवान खड़े हो गये और प्रसन्नता प्रकट करते हुए बोले- ‘अब मैं यही रहूँगा। यहीं से तुम्हारी साक्षी दूँगा। तुम उन लोगों को यहीं बुला लाओ।’
भगवान की आज्ञा पाकर वह ब्राह्मण कुमार गांव में आया और लोगों से उसने श्री गोपाल भगवान के आने का वृतान्त कह सुनाया सुनते ही गांव के सभी नर-नारी, बालक-वृद्ध तथा युवा पुरुष भगवान के दर्शन के लिये दौड़े आये। सभी भूमि में लोटकर भगवान के सामने साष्टांग प्रणाम करने लगे। कोई मेवा लाकर भगवान पर चढ़ाता, कोई फल-फूलों से ही श्रीगोपाल भगवान की पूजा करता। इस प्रकार भगवान के सामने विविध प्रकार की भेंटें चढ़ने लगीं और हर समय उनकी पूजा होने लगी। फिर भगवान की साक्षी लेने की किसी की हिम्मत ही नहीं पड़ी। ब्राह्मण के लड़के ने बड़ी ही प्रसन्नता के साथ अपनी बहिन का विवाह उस युवक के साथ कर दिया और वह वृद्ध ब्राह्मण तथा युवक दोनों मिलकर सदा भगवान की सेवा-पूजा में ही रहने लगे। दूर-दूर तक भगवान के आने का समाचार फैल गया। नित्यप्रति हजारों आदमी गोपालभगवान के दर्शन के लिये आने लगे। जब यह समाचार उस देश के राजा को विदित हुआ तो उसने एक बड़ा मन्दिर गोपालभगवान के लिये बनवा दिया और तभी से वे साक्षी गोपाल के नाम से प्रसिद्ध हुए।
नित्यानन्द जी भक्तों सहित बैठे हुए महाप्रभु ने इस कथा को कह सुन रहे थे। प्रभु एकटक होकर इस परम पावन उपाख्यान को सुन रहे थे।
नित्यानन्द जी के चुप हो जाने पर प्रभु ने पूछा- ‘फिर विद्यानगर से साक्षी गोपाल यहाँ क्यों पधारे ? इस बात को हमें और सुनाओ।’
नित्यानन्दजी क्षणभर चुप रहने के अनन्तर कहने लगे- ‘उस समय उड़ीसा-देश में परम भागवत महाराज पुरुषोतम देव राज्य करते थे। उन्होंने विद्यानगर के राजा की राजकुमारी के साथ विवाह करने की इच्छा प्रकट की।
क्रमशः
Comments
Post a Comment