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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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इस पर विद्यानगर के राजा ने अपनी कन्या महाराज पुरुषोतमदेव को नहीं दी और अस्वीकार करते हुए कहा- ‘मैं अपनी कन्या को मन्दिर के झाडूदार के लिये नहीं दूंगा।’
इस पर क्रुद्ध होकर महाराज पुरुषोतम देव ने विद्या नगर चढ़ाई की और भगवान जगन्नाथ जी की कृपा से विद्यानगर को जीतकर उसे अपने राज्य में मिला लिया और राज कन्या का विवाह अपने साथ कर लिया। तभी महाराज ने साक्षी गोपाल से पुरी पधारने के लिये प्रार्थना की। महाराज के भक्तिभाव से प्रसन्न होकर साक्षी गोपाल-भगवान पुरी पधारे और कुछ कालतक जगन्नाथ जी के मन्दिर में ही माणिक्य-सिंहासन पर विराजे। जगन्नाथ जी पुराने थे, ये बेचारे नये ही आये थे, इसलिये दोनों में कुछ प्रेम-कलह उत्पन्न हो गया। महाराज पुरुषोतमदेव ने दोनों को एक स्थान पर रखना उचित न समझकर अन्त में पुरी से तीन कोस की दूरी पर ‘सत्यवादी’ नामक ग्राम के समीप साक्षीगोपाल भगवान का मन्दिर बनवा दिया। तब से यहीं विराजमान हैं।
इनकी महिमा बड़ी अपार है, एक बार उड़ीसा-देश की महारानी इनके दर्शन के लिये पधारीं। इनकी मनमोहिनी बाँकी-झाँकी करके महारानी मुग्ध हो गयीं। उनकी इच्छा हुई कि ‘यदि भगवान की नाक छिदी हुई होती तो मैं अपने नाक का बहूमुल्य मोती भगवान को पहनाती।’
दूसरे ही दिन महारानी को स्वप्न हुआ मानो साक्षीगोपाल भगवान सामने खड़े हुए कह रहे हैं- ‘महारानी ! हम तुम्हारी मनोकामना पूर्ण करेंगे। पुजारियों को पता नहीं कि हमारी छिदी हुई है। कल तुम ध्यानपूर्वक दिखवाना, हमारी नाक में छिद्र हैं। तुम सहर्ष अपना मोती पहनाकर अपनी इच्छा पूर्ण कर सकती हो।’ प्रात:काल उठते ही महारानी ने यह वृतान्त महाराज से कहा। महाराज ने उसी समय पुजारियों से भगवान की नाक दिखवायी। सचमुच उसमें छिद्र था। तब महारानी ने बड़े ही प्रेम से अपना बहूमुल्य मोती भगवान की नाक में पहनाया। इतना कहकर नित्यानन्द जी चुप हो गये। इस कथा को सुनकर प्रभु प्रेम में गदगद हो गये और साक्षीगोपाल की मनमोहिनी मूर्ति का ध्यान करते-करते ही वह रात्रि प्रभु ने वहीं बितायी।
श्रीभुवनेश्वर महादेव…
प्रात:काल साक्षिगोपाल भगवान की मंगल-आरती के दर्शन करके महाप्रभु आगे के लिये चलने लगे। महाप्रभु के ह्दय में जगन्नाथ जी के दर्शन की इच्छा अधिकाधिक उत्कट होती जाती थीं। ज्यों-ज्यों वे आगे बढ़ते थें, त्यों-ही-त्यों प्रभु की भगवान की इच्छा पूर्वापेक्षा प्रबल होती जा रही थी। रास्ते में चलते-चलते ही मुकुन्ददत ने अपने कोकिल-कूजित कमनीय कण्ठ से संकीर्तन का यह पद आरम्भ कर दिया-
राम राघव ! राम राघव ! राम राघव ! रक्ष माम्।
कृष्ण केशव ! कृष्ण केशव ! कृष्ण केशव ! पाहि माम्।।
सभी ने मुकुन्ददत्त के स्वर में स्वर मिलाया। संकीर्तन की सुरीली तान से उस जनशून्य नीरव पथ में चारों ओर इसी संकीर्तन-पद की गूंज सुनायी देने लगी। महाप्रभु भावावेश में आकर नृत्य करने लगे। किसी को कुछ खबर ही नहीं थी कि हम लोग किधर चल रहे हैं, मन्त्र से कीले हुए मनुष्य की भाँति उन सबके शरीर अपने-आप ही आगे की ओर चले जा रहे थे। रास्ता किधर से है और हम कहाँ पहुँचेंगें, इस बात का किसी को ध्यान ही नहीं था।
इस प्रकार प्रेम में विभोर होकर आनन्द-नृत्य करते हुए प्रभु अपने साथियों के सहित भूवनेश्वर नामक तीर्थ में पहुँचे। वहाँ पर ‘बिन्दुसर’ नाम का एक पवित्र सरोवर है। इस सरोवर के सम्बन्ध में ऐसी कथा है कि शिव जी ने सम्पूर्ण तीर्थो का बिन्दु-बिन्दु भर जल लाकर इस सरोवर की प्रतिष्ठा की, इसीलिये इसका नाम ‘बिन्दुसर’ अथवा ‘बिन्दुसागर’ हुआ। महाप्रभु ने सभी भक्तों के सहित बिन्दुसागर-तीर्थ में स्नान किया और स्नान के अनन्तर आप भुवनेश्वर महादेव जी के मन्दिर में गये। भगवान भुवनेश्वर की भुवनमोहिनी मंजुल मूर्ति के दर्शन से प्रभु मूर्च्छित हो गये, थोड़ी देर के पश्चात बाह्यज्ञान होने पर आपने संकीर्तन आरम्भ कर दिया। भक्तों के सहित प्रभु दोनों हाथ ऊपर उठाकर ‘शिव-शिव शम्भो, हरहर महादेव’ इस पद को गा-गाकर जोरों से नृत्य कर रहे थे। सैकड़ों मनुष्य प्रभु को चारों ओर से घिरे हुए खड़े थे।
भुवनेश्वर महादेव जी का मन्दिर बहुत प्राचीन है और ये शिव जी बहुत पुराने हैं। भुवनेश्वर को गुप्तकाशी भी कहते हैं। हजारों यात्री दूर-दूर से भगवान भुवनेश्वर के दर्शन के लिये आते हैं और इनके मन्दिर में सदा पूजा होती ही रहती है। महाप्रभु चारों ओर जलते हुए दीपकों को देखकर प्रभु में उन्मत-से हो गये। चारों ओर छिटकी हुई पूजन की सामग्री से वह स्थान बड़ा ही मनोहर मालूम पड़ता था। महाप्रभु बहुत देर तक मन्दिर में कीर्तन करते रहे और वहीं उस दिन उन्होने विश्राम किया।
रात्रि में जब प्रभु सब कर्मों से निवृत्त होकर भक्तों के सहित कथोपकथन करने के निमित्त बैठे, तब मुकुन्ददत्त ने प्रभु के पादपपद्मों को धीरे-धीरे दबाते हुए कहा- ‘प्रभो ! आपने ही बताया था कि जिस तीर्थ में जाय, उस तीर्थ का माहात्म्य अवश्य सुनना चाहिये। बिना माहात्म्य सुने तीर्थ का फल आधा होता है, सो हम लोग भगवान भुवनेश्वर का माहात्म्य सुनना चाहते हैं। एकान्तप्रिय और शैलकाननों में विहार करने वाले ये भोले बाबा इस उत्कल-देश में आकर क्यों विराजमान हुए, काशी छोड़कर इन्होंने यहाँ यह नयी गुप्तकाशी क्यों बनायी-इस बात को जानने की हम लोगों की बड़ी इच्छा है। कृपा करके हमें भूवनेश्वर भगवान की पापहारिणी कथा सुनाकर हमारे कर्णो को पवित्र कीजिये। भगवत-सम्बन्धी कथाओं के श्रवणमात्र से ही अन्त:करण मलिनता मिट जाती है और हृदय में पवित्रता का संचार होने लगता है।
मुकुन्ददत्त के ऐसे प्रश्न को सुनकर कुछ मुसकराते प्रभु ने कहा- ‘मुकुन्द ! तुमने यह बहुत ही उत्तम प्रश्न पूछा। इन भगवान भूतनाथ के यहाँ पधारने की बड़ी ही अद्भुत कथा है। स्कन्दपुराण में इसका विस्तार से वर्णन किया गया है, उसी को संक्षेप में तुम लोगों को सुनाता हूँ। इस हरि-हर-महिमावाली पुण्य कथा को तुम लोग ध्यानपूर्वक सुनो।
पूर्वकाल में शिव जी काशीवासी के ही नाम से प्रसिद्ध थे। वाराणसी को ही उन्होंने अपनी लीलास्थली बनाया। शिव जी के सभी काम विचित्र ही होते हैं, इसीलिये लोग इन्हें औघड़नाथ कहते हैं। औघड़नाथ बाबा का काशी जी में भी कुछ गर्मी-सी प्रतीत होने लगी। इसलिये आप काशी को छोड़कर कैलास पर्वत के शिखर पर जाकर रहने लगे।
क्रमशः
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