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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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इधर काशी सूनी हो गयी।वहाँ एक राजा ने अपनी राजधानी बना ली और वह बड़े ही भक्तिभाव से भगवान भूतनाथ की पूजा करने लगा। राजा ने हजारों वर्ष तक शिव जी की घोर अराधना की। उसके उग्र तप से आशुतोष भगवान प्रसन्‍न हुए और उसके सामने प्रकट होकर उसने वरदान मांगने को कहा।

राजा ने दोनों हाथों की अंजलि बांधे हुए विनीतभाव से करुण स्‍वर में कहा- ‘प्रभो ! मैं अब आपसे क्‍या मागूं ? आपके अनुग्रह से मेरे धन्‍य-धान्‍य, राज-पाट, पुत्र-परिवार आदि सभी संसार की उत्तम समझी जाने वाली वस्‍तुएँ मौजूद हैं। मेरी एक बड़ी उत्‍कट इच्‍छा है, उसे सम्‍भवतया आप पूरी न कर सकेंगे।’

शिव जी ने प्रसन्‍नता के वेग में कहा- ‘राजन ! मेरे लिये प्रसन्‍न होने पर त्रिलोकी में कोई भी वस्‍तु अदेय नहीं है। तुम्‍हारी जो इच्‍छा हो, उसे ही निसंकोच-भाव से मांग लो।’ राजा ने अत्‍यन्‍त ही दीनता प्रकट करते हुए सरलता से कहा- ‘हे वरद ! यदि आप प्रसन्‍न होकर मुझे वर ही देना चाहते हैं, तो मुझे यही वरदान दीजिये कि युद्ध में मैं श्रीकृष्‍णचन्‍द्र जी को परास्‍त कर सकूँ।’ सदा आक-धतूरे के नशेमें मस्‍त रहने वाले औघड़दानी सदाशिव वरदान देने में आगा-पीछा नहीं सोचते। कोई चाहे भी जैसा वर क्‍यों न माँगे; उससे इन्‍हें स्‍वयं भी चाहे क्‍लेश क्‍यों न उठाना पड़े, ये वरदान देते समय ‘ना’ करना तो सीखे ही नहीं हैं।
राजा की यह बात सुनकर आप कहने लगे- ‘राजन ! तुम घबड़ाओ मत, मैं तुम्‍हें अवश्‍य ही युद्ध में श्रीकृष्‍ण भगवान से विजय प्राप्‍त कराऊँगा। तुम अपनी सेना सजाकर समर के लिये चलो। तुम्‍हारे पीछे-पीछे अपने सभी भूत, पिशाच, वैतालादि गणों के साथ युद्धक्षेत्र में तुम्‍हारी रक्षा के निमित्त मैं चलूँगा। यह लो, पाशुपातास्‍त्र, इससे तुम श्रीकृष्‍ण भगवान की सम्‍पूर्ण सेना को विध्‍वंस कर सकते हो।’ यह कहकर शिव जी ने बड़े हर्ष के साथ राजा को पाशुपतास्‍त्र दिया। शिव जी से दिव्‍य अस्‍त्र पाकर राजा परम प्रसन्‍न हुए और उसने भगवान के ऊपर धावा बोल दिया।

अन्‍तर्यामी भगवान तो घट-घट की जानने वाले हैं। उन्‍हें सब बातों का पता चल गया। उन्‍होंने सोचा-‘शिव जी मेरे भक्‍त हैं, तपस्‍या के अभिमानी उस राजा के साथ इन्‍हें भी अभिमान हो आया। इसलिये मुझे दोनों के अभिमान को चूर करना चाहिये। शिव जी का जो प्रिय हैं, वह मेरा भी प्रिय है, इसलिये दोनों ही मेरे भक्‍त हैं, इन दोनों के मद को नष्‍ट करना मेरा कर्तव्‍य है, तभी मेरा ‘मदहारी’ नाम सार्थक हो सकता है।’ यह सोचकर भगवान ने राजा की सेना के ऊपर सुदर्शन चक्र छोड़ा। उस सुदर्शनचक्र ने सर्वप्रथम तो राजा के सिर ही धड़ से अलग करके उसे भगवान की विष्णुपुरी में भेज दिया। क्योंकि भगवान का क्रोध भी वरदान के ही तुल्य होता है।[1]

इसके अनन्‍तर राजा की सम्‍पूर्ण सेना को छिन्‍न-भिन्‍न करके सुदर्शन चक्र शिव जी की ओर झपटा। शिव जी अपने अस्‍त्र-शस्‍त्रों को छोड़ मुठ्टी बाँधकर भागे, किन्‍तु जगत के बाहर जा ही कहाँ सकते थे? जहाँ-कहीं भी भागकर जाते, वहीं सुदर्शन चक्र उनके पीछे पहुँच जाता। त्रिलोकी में कहीं भी अपनी रक्षा का आश्रय न देखकर शिव जी फिर लौटकर भगवान की ही शरण में आये और पृथ्‍वी में लोटकर करुण स्‍वर से स्‍तुति करने लगे- ‘हे जगत्‍पते ! इस अमोघ अस्‍त्र से हमारी रक्षा करो। प्रभो ! आपकी माया के वशीभूत होकर हम आपके प्रभाव को भूल जाते हैं। प्रभो ! यह घोर अपराध हमने अज्ञान के ही कारण किया है। आप ही सम्‍पूर्ण जगत के एकमात्र आधार हैं। ब्रह्मा, विष्‍णु और हम तो आपकी एक कला के करोड़वें अंश के बराबर भी नहीं हो सकते। हे विश्‍वपते। आपके एक-एक रोमकूप के करोड़ो ब्रह्माण्‍ड समा सकते हैं। नाथ ! हम तो माया के अधीन हैं। माया आपकी दासी है। वह हमें जैसे नचाती है, वैसे ही नाचते हैं। इसमें हमारा अपराध ही क्‍या है? हम स्‍वाधीन तो हैं ही नहीं।’
शिवजी की ऐसी कातर-वाणी सुनकर भगवान ने अपने चक्र का तेज संवरण कर लिया और हंसते हुए कहने लगे- ‘शूलपाणिन ! मैंने केवल आपके मद को चूर्ण करने के ही निमित्त सुदर्शन चक्र का प्रयोग किया था, जिससे आपको मेरे प्रभाव का स्‍मरण हो जाय। मेरी इच्‍छा आपके ऊपर प्रहार करने की नहीं थी। आप तो साक्षात मेरे स्‍वरूप ही हैं। जो आपका प्रिय है, वह मेरा भी प्रिय है; जो आप की भक्ति करता है, उस पर मैं संतुष्ट होता हूँ। जो मूर्ख मेरी तो पूजा करता है और आपकी अपेक्षा करता है, उस पर मैं कभी भी प्रसन्‍न नहीं हो सकता। बिना आपकी सेवा किये, कोई मेरे प्रसाद का भागी बन ही नहीं सकता। अब मैं आपसे बहुत प्रसन्‍न हूँ। आप कोई वरदान माँगिये।’

शिव जी ने विनीतभाव से कहा- ‘स्‍वामिन ! अपराधियों के ऊपर भी दया के भाव प्रदर्शित करते रहना यह तो आपका सनातन-स्‍वभाव है। प्रभो ! मैं आपके श्रीचरणों में अब क्‍या निवदेन करूँ। मेरी यही प्रार्थना है कि आप मुझे अपने चरणों की शरण में ही रखिये। आपके चरणों का सदा चिन्‍तन बना रहे और आपके अमित प्रभाव की कभी विस्‍मृति न हो, ऐसा ही आशीर्वाद दीजिये।’

शिव जी के ऐसे वचन सुनकर भगवान ने प्रसन्‍नता प्रकट करते हुए कहा- ‘वृषभध्‍वज ! मैं आप पर बहुत ही प्रसन्‍न हूँ। आप तो सदा से मेरे ही रहे हैं और सदा मेरे ही रहेंगे। आपको मेरे एक बहुत गोप्‍य और परम पावन जगन्‍नाथ क्षेत्र का तो पता होगा ही। वह क्षेत्र मुझे अत्‍यन्‍त ही प्रिय है। उसके चारों ओर बीस योजन तक की भूमि बड़ी ही पवित्र है। उसमें तो भी जीव रहता है वह मेरा सबसे श्रेष्‍ठ भक्त है। वह चाहे जिस योनि में क्‍यों न हो, अन्‍त में मेरे ही धाम को प्राप्‍त होता है। आप वहीं जाकर निवास करें। आपका क्षेत्र गुप्‍तकाशी के नाम से प्रसि‍द्ध होगा और उस क्षेत्र में जाकर जो आपका दर्शन करेंगे, उनके जन्‍म-जन्‍मान्‍तरों के पाप क्षय हो जायँगे।’
भगवान की ऐसी आज्ञा पाकर उस दिन से शिव जी यहीं आकर रहने लगे हैं। जो इस क्षेत्र में आकर भक्तिभाव से स्थिर-चित होकर भुवनेश्‍वर महादेव के दर्शन करता है और दतचित्त होकर इस पुण्‍याख्‍यान का श्रवण करता है वह निश्‍चय ही पापों से मुक्‍त होकर अक्षय सुख का भागी बनता है।
क्रमशः

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