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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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स्वाभाविक ही हृदय में एक प्रकार की बैचेनी-सी उत्पन्न हो रही है। भैया! तुम कुछ काल मेरे आश्रम पर रहो। फिर जहाँ भी कहीं चलना हो दोनों साथ-ही-साथ चलेंगे।’
दोनों हाथों की अजंलि बांधे हुए चैतन्य देव ने कहा- ‘गुरुदेव! आपकी आज्ञा पालन करना तो मेरा सर्वप्रधान कार्य है किंतु मैं करूँ क्या, मेरा मन श्रीकृष्‍ण से मिलने के लिये व्याकुल हो रहा है। अब मुझे श्रीकृष्‍ण के बिना देखे चैन नहीं। आप ऐसा आशीर्वाद दीजिये कि मैं अपने प्यारे श्रीकृष्‍ण को पा सकूँ और आपके चरण-कमलों का सदा स्मरण करता रहूँ। अब तो मैं आज्ञा ही चाहता हूँ।’
प्रभु के प्रेम-पाश में बंधे हुए भारती जी कहने लगे- ‘यदि तुम नहीं मानते हो और जाने के ही लिये तुले हुए हो, तो चलो मैं भी तुम्हारे साथ कुछ दूर तक चलता हूँ।’ यह कहकर भारती जी भी अपना दण्‍ड-कमण्‍डलु लेकर साथ चलने के लिये तैयार हो गये। प्रभु अपने गुरुदेव भारती महाराज को आगे करके पश्चिम दिशा की ओर चलने लगे और उनके पीछे चन्द्रशेखर आचार्यरत्न, नित्यानन्द, गदाधर और मुकुन्द आदि भक्त भी चलने लगे। आचार्यरत्न को अपने पीछे आते देखकर प्रभु अत्यन्त ही दीनभाव से उनसे कहने लगे- आचार्य देव! आपने मेरे पीछे सदा से कष्‍ट ही उठाये हैं। मेरी प्रसन्नता के लिये आपने अपनी इच्छा के विरुद्ध भी बहुत-से कार्य किये हैं, मैं आपके ऋण से जन्म-जन्मान्तरोंपर्यन्त उऋण नहीं हो सकता। आप से मेरी यही प्रार्थना है कि अब आप घर के लिए लौट जायँ।’
लौटने का नाम सुनते ही आचार्यरत्न मूर्च्छित होकर पृथ्‍वी पर गिर पड़े और रोते-रोते कहने लगे- ‘आपकी आज्ञा के विरुद्ध कार्य करने की शक्ति ही किसमें है! आप जिसे जो आज्ञा करेंगे, उसे वही करना होगा, किंतु मेरी हार्दिक इच्छा थी कि कुछ काल और प्रभु के सहवास-सुख से अपने जीवन को कृतार्थ कर सकूं।’

प्रभु ने स्नेह के साथ बहुत ही सरलतापूर्वक कहा- ‘न’ यह ठीक नहीं है। आज आपको घर छोडे़ तीन-चार दिन होते हैं। घर पर बाल-बच्चे न जाने क्या सोच रहे होंगे, आप अब जायँ ही।’

अश्रु-विमोचन करते हुए प्रभु के पैरों को पकड़कर आचार्य कहने लगे- ‘प्रभो! मुझे भुलाइयेगा नहीं। नवद्वीप के नर-नारियों को भी बड़ा सन्ताप है, उन्हें भी अपने दर्शनों से सुखी बनाइयेगा। मैं ऐसा भाग्यहीन निकला कि प्रभु की कुछ भी सेवा न कर सका। नवद्वीप में भी मैं सदा सेवा से वंचित ही रहा।’ अब तक प्रभु अपने अश्रुओं को बलपूर्वक रोके हुए थे। अब उनसे नहीं रहा गया। वे जोरों से रोते हुए कहने लगे- ‘आचार्यदेव! आप सदा से पिता की भाँति मेरी देख-रेख करते रहे हैं। मुझे अपने पिता का ठीक-ठीक होश नहीं। आपके ही द्वारा मैं सदा पितृ-सुख का अनुभव करता रहा हूँ। आप मेरे पितृतुल्य क्या पिता ही हैं। आप तो सदा ही मुझ पर सगे पुत्र की भाँति वात्सल्य-स्नेह रखते रहे हैं, किंतु मैं ही ऐसा भाग्यहीन निकला कि आपकी कुछ भी सेवा न कर सका। अब ऐसा आशीर्वाद दीजिये कि मैं शीघ्र-से-शीघ्र अपने प्राणप्यारे श्रीकृष्‍ण को पा सकूं। आप अब जायँ और अधिक देरी न करें।’

यह कहकर प्रभु ने अपने हाथों से भूमि में पड़े हुए आचार्य को उठाया और उनका गाढा़लिंगन करते हुए प्रभु कहने लगे- ‘आप जाइये और माता तथा मेरे दु:ख से दु:खी हुए सभी भक्तों को सान्त्वना प्रदान कीजिये। माता से कह दीजियेगा, मैं शीघ्र ही उनके चरणों के दर्शन करूँगा।’ प्रभु की बात सुनकर सुखी मन से आचार्यरत्न ने प्रभु की आज्ञा का शिरोधार्य किया। और वे नवद्वीप के लिये लौट गये और लोगों ने बहुत आग्रह करने पर भी लौटना स्वीकार नहीं किया। सबसे आगे भारती जी चल रहे थे, उनके पीछे दण्‍ड-कमण्‍डलु धारण किये हुए महाप्रभु प्रेम में विभोर हुए नृत्य करते हुए जा रहे थे। उनके पीछे नित्यानन्द, गदाधर और मुकुन्ददत्त थे।
प्रभु प्रेम में बेसुध होकर कभी तो हंसने लगते थे, कभी तो हंसने लगते थे, कभी रुदन करने लगते थे और कभी-कभी जोरों से ‘हा कृष्‍ण! ओ प्यारे!! रक्षा करो!!! कहाँ चले गये? मुझे विरह-सागर से उबारो। मैं तुम्हारे लिये व्याकुल हो रहा हूँ।’ इस प्रकार जोरों से चिल्लाकर क्रन्दन करने लगते थे। उनकी वाणी में अत्यधिक करुणा थी। उनके रुदन को सुनकर पाषाण हृदय भी पसीज जाते थे। उन्हें अपने शरीर का कुछ भी होश नहीं था। बिना कुछ सोचे– विचारे अलक्षित पथ की ओर वैसे ही चले जा रहे थे। इस प्रकार भारती जी के पीछे-पीछे उन्होंने राढ़-देश में प्रवेश किया और सायंकाल होने के समय सभी ने एक छोटे से ग्राम में किसी भाग्यशाली कुलीन ब्राह्मण के यहाँ निवास किया। उस अतिथिप्रिय श्रद्धालु ब्राह्मण ने अपने भाग्य की सराहना करते हुए आगत सभी महात्माओं का यथाशक्ति खूब सत्कार किया और उन सभी को श्रद्धा-भक्ति के सहित भिक्षा करायी। भिक्षा करके प्रभु पृथ्‍वी पर आसन बिछाकर सोये।

भारती जी का आसन ऊपर की ओर लगाया गया और गदाधर, मुकुन्द तथा नित्यानन्द जी प्रभु को चारों ओर से घेरकर सोये।दिनभर रास्ता चलने से सब-के-सब पड़ते ही सो गये, किंतु प्रभु की आँखों में नींद कहां? वे तो श्रीकृष्‍ण के लिये व्याकुल हो रहे थे। सबको गहरी निद्रा में देखकर प्रभु धीरे से उठे। पास में रखे हुए अपने दण्‍ड-कमण्‍डलु को उठाया और भ‍क्तों को सोते ही छोड़कर रात्रि में ही‍ पश्चिम दिशा को लक्ष्‍य करके चलने लगे। वे प्रेम में विभोर होकर-

हरे कृष्‍ण हरे कृष्‍ण कृष्‍ण कृष्‍ण हरे हरे।
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।।

इस महामन्त्र का उच्चारण करते जाते थे। कभी अधीर होकर कातर वाणी से-

राम राघव! राम राघव! राम राघव! रक्ष माम्।
कृष्‍ण केशव! कृष्‍ण केशव! कृष्‍ण केशव! पाहि माम्।

-इन नामों को लेते हुए जोरों से रुदन करते जाते थे। इधर नित्यानन्द जी की आँखें खुलीं। उन्होंने सम्भ्रव के सहित चारों ओर प्रभु को देखा, किंतु अब प्रभु कहां? वे सर्वस्व हरण हुए व्यापारी की भाँति यह कहते हुए ‘हाय! प्रभो! हम अभागियों को आप सोते हुए छोड़कर कहाँ चले गये?’ जोरों के साथ रुदन करने लगे।
क्रमशः

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