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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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नित्यानन्द जी के रुदन को सुनकर सब-के-सब मनुष्‍य जाग पड़े और एक-दूसरे को दोष देते हुए कहने लगे- ‘हमने पहले ही कहा था कि बारी-बारी से एक-एक आदमी पहरा दो, किंतु किसी ने मानी ही नहीं। कोई अपनी निद्रा को ही धिक्कार देने लगे। इस प्रकार सब भाँति-भाँति से विलाप करने लगे।अब नित्यानन्द जी ने भारती महाराज से प्रार्थना की- ‘भगवन्! आप अब अपने आश्रम को लौट जायँ। आप हम लोगों के साथ कहाँ भटकते फिरेंगे। हम तो जहाँ भी मिलेंगे, वहीं जाकर प्रभु की खोज करेंगे।’
भारती जी अब करते ही क्या, अन्त में उन्होंने दु:खित होकर आश्रम को लौट जाने का ही निश्‍चय किया और नित्यानन्द जी गदाधर तथा मुकुन्द को साथ लेकर पश्चिम दिशा की ओर प्रभु को खोजने के लिये चले।
प्रभु बहुत दूर निकल गये थे। वे प्रेम में बेसूध होकर कभी गिर पड़ते, कभी लोट-पोट हो जाते और कभी घंटों मूर्च्छित होकर ही पड़े रहते। कृष्‍ण-प्रेम में अधीर होकर वे इतने जोरों से रुदन करते कि उनकी क्रन्दन-ध्‍वनि कोसभर से सुनायी देती थी। रात्रि के समय वैसे भी आवाज दूर तक सुनायी देती है। भक्तों ने प्रभु के करूण-क्रन्दन की ध्‍वनि दूर से ही सुनी। उस ध्‍वनि के श्रवणमात्र से ही सभी के शरीर पुलकित हो उठे। सभी आनन्द में उन्मत्त होकर एक-दूसरे का आलिंगन करते हुए, नृत्य करते हुए और उसी ध्‍वनि का अनुमान करते हुए प्रभु के पास पहुँचे। चार-पांच कोसपर वक्रेश्‍वर भी आ मिले। मुकुन्ददत्त ने बड़े ही सुरीले स्वर से-

श्रीकृष्‍ण गोविन्द हरे मुरारे। हे नाथ नारायण वासुदेव!

-इन भगवन्नमों का संकीर्तन आरम्भ कर दिया। संकीर्तन को सुनते ही प्रभु आनन्द के सहित नृत्य करने लगे। सभी भक्त प्रभु के दर्शनों से परम प्रसन्न हुए, मानो किसी की चोरी गयी हुई सम्पूर्ण सम्पत्ति फिर से प्राप्त हो गयी हो। प्रभु भी भक्तों को देखकर सुखी हुए। कुछ काल के अनन्तर प्रभु प्रकृतिस्थ हुए। उन्हें अब बाह्यज्ञान होने लगा। वे नित्यानन्द जी, वक्रेश्‍वर आदि भक्तों को देखकर कहने लगे- ‘आप लोग खूब आ गये। मैं आप लोगों से एक बात कहना चाहता हूँ।’

सभी भक्त उत्सुकता के साथ प्रभु के मुख की ओर देखने लगे। तब प्रभु ने कहा- ‘मुझे भगवान का आदेश हुआ है, कि तुम जगन्नाथपुरी जाओ। पुरी में अच्युत भगवान ने मुझे शीघ्र ही बुलाया है। इसलिये अब मैं नीलाचल की ओर जाऊंगा। अब मुझे शीघ्र ही आकर पुरी में अपने स्वामी के दर्शन करने हैं।’
प्रभु की इस बात को सुनकर सभी को परम प्रसन्नता प्राप्त हुई। प्रभु के मन की बात जान ही कौन सकता है कि वे भक्तों की प्रसन्नता के निमित्त क्या-क्या करना चाहते हैं। इस प्रकार अब प्रभु पश्चिम की ओर न जाकर फिर पूर्व की ओर चलने लगे।उस समय तक राढ़-देश में भगवन्नाम-संकीर्तन का प्रचार नहीं हुआ था, इसलिये उस देश की ऐसी दशा देखकर प्रभु को अत्यन्त ही दु:ख हुआ। वे विकलता प्रकट करते हुए नित्यानन्द जी से कहने लगे- ‘श्रीपाद! इस देश में कहीं भी संकीर्तन की सुमधुर ध्‍वनि सुनायी नहीं पड़ती है और न यहाँ किसी के मुख से भगवन्नामों का ही उच्चारण सुना है। सचमुच यह देश भक्तिशून्य है। भगवन्नाम को बिना सुने, मेरा जीवन व्यर्थ है, मेरे इस व्यर्थ के भ्रमण को धिक्कार है।’ इतने ही में प्रभु को जगंल में बहुत-सी गौएं चरती हुई दिखायी दीं। उनमें से बहुत-सी तो हरी-हरी दूब को चर रही थीं, बहुत-सी प्रभु के मुख की ओर निहार रही थीं, बहुत-सी पूंछों को उठा-उठाकर इधर-से-उधर प्रभु के चारों ओर भाग रही थीं- मानो वे प्रभु की परिक्रमा कर रही हों। उनके चराने वाले ग्वाले कम्बल की घोंघी (खोइया) ओढे़ हुए हाथ में लाठी लिये प्रभु की ओर देख रहे थे।

प्रभु को देखते ही ये जोरों से ‘हरि बोल, हरि बोल’ कहकर चिल्लाने लगे। उन छोटे-छोटे बालगोपालों के मुख से श्रीहरि का कर्णप्रिय सुमधुर नाम सुनकर प्रभु अधीर हो उठे। उन्हें उस समय एकदम वृन्दावन का स्मरण हो आया और वे बालगोपालों के समीप जाकर उनके सिरों पर हाथ रखते हुए कहने लगे- ‘हां, और कहो, बोलो हरि हरि कहो।’ बच्चे आनन्द में आकर और जोरों के साथ हरिध्‍वनि करने लगे। प्रभु की प्रसन्नता का ठिकाना नहीं रहा। वे उन बालकों के पास बैठ गये और बालकों की –सी क्रीडाएँ करने लगे। उनसे बहुत-सी बातें पूछने लगे। बातों-ही-बातों में प्रभु ने उन लोगों से पूछा- ‘यहाँ से गंगाजी कितनी दूर हैं?’

एक चुलबुले स्वभाव वाले बालक ने कहा- ‘महाराज जी! गंगा जी दूर कहाँ हैं, बस, अपने को गंगा जी के किनारे ही समझो। हमारा गांव गंगा जी के खादर में तो है ही। दो-तीन घंटे में आप धारा के समीप पहुँच जायंगे।

प्रभु ने प्रसन्नता प्रकट करते हुए कहा- ‘धन्य है, गंगा माता का ही ऐसा प्रभाव है कि जहाँ के छोटे-छोटे बच्चे भी भगवन्नामों का उच्चारण करते हैं। जगन्माता भगवती भागीरथी का प्रभाव ही ऐसा है, कि उसके किनारे पर रहने वाले कूकर-शूकर भी भगवान के प्रिय बन सकते हैं।’ इस प्रकार बहुत देर तक बालकों से बातें करने के अनन्तर प्रभु भक्तों के सहित सांयकाल के समय पुण्‍यतोया सुरसरि मां जाह्नवी के किनारे पहुँचे। गंगा माता के दर्शनों से ही प्रभु गद्गद हो उठे और दोनों हाथों को जोड़कर स्तुति करने लगे- ‘गंगा मैया! तुम सचमुच संसार के सभी प्रकार के पाप-तापों को मेटने वाली हो। माता! सहस्रवदन शेष जी भी तुम्हारे यश का गायन नहीं कर सकते।
माता! तुम्हीं आदि-शक्ति हो, तुम्हीं ब्रह्माणी हो, तुम्हीं रुद्राणी हो और तुम्हीं साक्षात लक्ष्‍मी हो। देवाधिदेव महादेव ने तुम्हें अपने सिर पर धारण किया हैं, तुम भगवान के चरणकमलों से उत्पन्न हुई हो। जननी! तुम्हारे चरणों में हमारा कोटि-कोटि प्रणाम है। मंगलमयी माता! हमारा कल्याण करो।’ इस प्रकार प्रभु ने गंगाजी की स्तुति करके उनकी रेणु को सिर पर चढा़या और माता के पावन जल से आचमन किया। सभी ने आनन्द के सहित गंगा जी में घुसकर स्नान किया और रात्रि में पास के ए‍क छोटे-से गांव में किसी ब्राह्मण के यहाँ निवास किया।
क्रमशः

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