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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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कोई तो नाव पर पार होने लगे। कोई अपनी डोंगी को आप ही खेकर ले जाने लगे। कोई घडो़ के द्वारा ही गंगा जी को पार करने लगे। बहुत-से उतावले भक्तों ने तो नाव, डोंगी तथा घड़ों की भी परवा नहीं की। वे वैसे ही गंगा जी में कूद पड़े और हाथों से तैरकर ही उस पार पहुँच गये। हजारों आदमी बात-की-बात में गंगा जी को पार करके फुलिया ग्राम में पहुँच गये। प्रेम में उन्मत्त हुए पुरुष जेारों से ‘हरि बोल’, ‘हरि बोल’ की गगनभेदी ध्‍वनि करने लगे। उस महान कोलाहल को सुनकर प्रभु आश्रम में से बाहर निकल आये।

संन्यासी-वेषधारी प्रभु के दर्शनों से वह प्रेम में उन्मत्त हुई अपार जनता जेारों से हरिध्‍वनि करने लगी। सभी के नेत्रों से आंसुओं की धाराएँ बह रही थीं। कोई-कोई तो प्रभु के मुँडे़ हुए सिर को और उनके गेरुए रंग के वस्त्रों को देखकर जोरों से ‘हा प्रभु! हा हरि ‘कहकर रुदन करने लगे। प्रभु ने सभी को कृपा की दृष्टि से देखा और सभी को लौट जाने के लिये कहकर आप शान्तिपुरी की ओर चलने लगे। बहुत-से भक्त उनके साथ-ही-साथ शान्तिपुर को चले। कुछ लौटकर नवद्वीप आ गये।इधर नित्‍यानंद जी लोगों को प्रभु के आने का समाचार सुनाते हुए शचीमाता के समीप पहुँचे। उस समय माता पुत्रविछोहरूपी आक्रान्‍त हुई ब्रहोशी के सहित आहें भर रही थीं। नित्‍यानंद जी ने माता के चरण-स्‍पर्श किये। माता ने चौंककर देखा कि सामने नित्‍यानंद खड़े हैं। अत्‍यंत ही अधीरता के साथ माता कहने लगी- ‘बेटा निताई! तू अपने भाई निमाई को कहाँ छोड़ आया? तू तो मुझसे प्रतिज्ञा करके गया था कि मैं निमाई को साथ लेकर आऊँगा? वह कितनी दूर है? उसे तू पीछे क्‍यों छोड़ आया? तू तो संग लाने के लिये कह गया था। मेरा निमाई कहाँ है? बेटा! मुझे जल्‍दी से बता दे। तेरे ही कहने से मैंने अब तक प्राण रखे हैं। अब तू मुझे जल्‍दी बता दे। कहीं तू भी तो मुझे निमाई की तरह धोखा नहीं देता? तू सच-सच बता दे निमाई कहाँ है? मैं वहीं जाऊँगी, तू मुझे अभी उसी देश में ले चल, जहाँ मेरा निमाई हो। ‘उपवासों से क्षीण हुई दु:खिनी माता को धैर्य बंधाते हुए नित्‍यानंद जी ने कहा- ‘माता! तुम इतनी अधीर मत हो। मैं तुम्‍हारे निमाई को साथ ही लेकर आया हूँ। वे शांतिपुर में अद्वैताचार्य के घर पर हैं। उन्‍होंने तुम्‍हें वहीं बुलाया है, मैं तुम्‍हें वहीं ले चलूँगा।’

‘निमाई शांतिपुर है’ इतना सुनते ही मानो माता के गये हुए प्राण फिर से शरीर में लौट आये। वह अधीर होकर कहने लगी- ‘बेटा! मुझे शांतिपुर ले चल! मैं जब तक निमाई को देख न लूँगी, तब तक मुझे शांति न होगी।’

नित्‍यानंद जी ने देखा कि माता‍ चिरकाल के उपवासों से अत्‍यंत ही क्षीण हो गयी हैं। उन्‍होंने निमाई के जाने के दिन से आज तक अन्‍न का दर्शन तक नहीं किया है। ऐसी दशा में यदि इन्‍हें प्रभु के समीप ले चलेंगे तो इन्‍हें महान दु:ख होगा; इसलिये इन्‍हें जैसे भी बने तैसे आग्रहपूर्वक थोड़ा-बहुत भोजन कराना चाहिये। यह सोचकर उन्‍होंने कहा- ‘माता! मैं तो भूख के मारे मरा जा रहा हूँ। जब तक तुम्‍हारे हाथ का बना हुआ भोजन न पाऊँगा, तब तक मेरी तृप्ति न होगी। इसलिये जल्‍दी से दाल-भात बनाकर मुझे खिला दो, तब तक प्रभु के समीप चलेंगे। मुझे से तो भूख के कारण चला भी नहीं जाता।’ 

नित्‍यानंद जी की ऐसी बात सुनकर कुछ शंकित-चित्त से माता ने कहा- ‘निताई! तू मुझे छल तो नहीं रहा है? मुझे भोजन कराने के निमित्‍त ही तो, निमाई के शांतिपुर आने का बहाना नहीं कर रहा है? तू मुझे सत्‍य-सत्‍य बता दे निमाई कहाँ है?’

नित्‍यानंद जी के माता के चरणों को स्‍पर्श करते हुए कहा- ‘माता! मैं तुम्‍हारे चरणों को स्‍पर्श करके कहता हूँ कि मैं तुम्‍हे ठग नहीं रहा हूँ। प्रभु फुलिया होकर शांतिपुर मेरे सामने गये हैं और मुझे तुम्‍हे लाने के लिये ही नवद्वीप भेजा है।’
नित्‍यानंद जी की इस बात से माता को संतोष हुआ, वह बड़े कष्‍ट के साथ उठी और उठकर स्‍नान किया। फिर विधिवत भोजन बनाया। भोजन बनाकर भगवान भोग लगाया और नित्‍यानंद जी के लिये परोसकर उनसे भोजन करने के लिये कहा।

नित्‍यानंद जी के आग्रह के साथ दृढ़ता दिखाते हुए कहा- ‘पहले माता कर लेंगी तब मैं भोजन करूँगा।’ माता ने कहा- ‘बेटा! मेरे भोजन को तो निमाई साथ ले गया। अब वही जब करावेगा तब भोजन करूँगी। उसके बिना देखे मुझे भोजन भावेगा ही नहीं।‘ नित्‍यानंद जी ने कहा- ‘तुम्‍हारा एक बेटा निमाई तो शांतिपुर है, दूसरा बेटा तुम्‍हारे सामने है। तुम अब भी भोजन न करोगी, तो मैं भी नहीं करता। मैं माता को बिना खिलाये भोजन कर ही नहीं सकता।’

माता ने कुछ आग्रह के स्‍वर में कहा- ‘पहले तू कर तो ले, तब मैं भी करूंगी। बिना मुझे खिलाये मैं कैसे खा सकती हूँ? नित्‍यानंद जी ने प्रेमपूर्वक बच्‍चों की भाँति कहा-‘हाँ, यह बात नहीं है, मैं तो तुम्हें करा के ही भोजन करुँगा। अच्छा, तुम मेरी शपथ खाकर कह दो कि मेरे कर लेने के पश्‍चात् तू भी भोजन कर लोगी।’
नित्यानन्द जी के अत्यन्त आग्रह करने पर माता ने भोजन करना स्वीकार कर लिया। तब नित्यानन्द जी ने प्रेमपूर्वक माता के हाथ का बना हुआ प्रसाद पाया। उनके भोजन कर लेने के उपरान्त माता ने विष्‍णुप्रिया जी को भी आग्रहपूर्वक भोजन कराया और स्वयं भी दो-चार ग्रास खाये। किन्तु उनके मुख में अन्न जाता ही नहीं था। जैसे-तैसे करके उन्होंने थोड़ा भोजन किया।   माता के भोजन कर लेने के अनन्तर नित्यानन्द जी ने चन्द्रशेखर तथा श्रीवास आदि भक्तों से कहा- ‘आप लोग पालकी का प्रबन्ध करके माता को साथ लेकर अद्वैताचार्य के घर शान्तिपुर आवें। तब तक मैं आगे चलकर देखता हूँ कि प्रभु पहुँचे या नहीं। भक्तों ने नित्यानन्द जी की बात को स्वीकार किया। वे शान्तिपुर की तैयारियाँ करने लगे। इधर उतावले अवधूत नित्यानन्द जी जल्दी से दौड़ते हुए शान्तिपुर पहुँचे।
अद्वैताचार्य के घर पहुँचकर नित्यानन्द जी ने देखा प्रभु अभी तक वहाँ नहीं पहुँचे।
क्रमशः

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