cc185
श्री श्री चैतन्य चरितावली
185-
यह सदा स्थिर-भाव से श्रीकृष्ण–चरणों की सुखमय शीतल छाया में बैठकर विश्राम ही नहीं करता।सदा इधर-उधर भटकता ही रहता है। इसी को ताड़न करने के निमित्त मैंने यह दण्ड धारण किया है।’
प्रभु की ऐसी गूढ़ रहस्यपूर्ण बात सुनकर अद्वैताचार्य को मन-ही-मन बड़ी प्रसन्नता हुई। इसके अनन्तर अन्य बहुत-से भक्त प्रभु के संन्यास के सम्बन्ध में भाँति-भाँति की बातें करने लगे। कोई कहता- ‘प्रभु! आपने संन्यास लेकर भक्तों के साथ बड़ा भारी अन्याय किया हैं। पहले तो आपने अपने हाथों से प्रेमतरु की स्थापना की, उसे संकीर्तन के सुन्दर सलिल से सींचा और बढा़या। जब उस पर फल लगे और उनके पकने का समय आया, तभी आपने उसे जड़ से काट दिया। लोग अपने हाथ से लगाये हुए विषवृक्ष का भी उच्छेद नहीं करते। आपके बिना भक्त कैसे जीवेंगे? कौन उनकी करूण कहानियों को सुनेगा? विपत्ति पड़ने पर भक्त किसकी शरण में जायँगे? संकीर्तन में अपने अद्भुत और अलौकिक नृत्य से अब उन्हें कौन आह्लादित करेगा? कौन अब भक्तों के सहित गंगातट पर जलविहार करावेगा? कौन हमें निरन्तर कृष्ण-कथा सुनाकर सुखी और प्रमुदित बनावेगा? प्रभो! भक्त आपके वियोग-दु:ख को सहन करने में समर्थ न हो सकेंगे। 'प्रभु भक्तों को ढाँढस बंधाते हुए कहते- ‘देखो भाई! घबड़ाने से काम न चलेगा। अब जो होना था, सो तो हो ही गया। अब संन्यास छोड़कर गृहस्थी बनने की सम्मति तो तुम लोग भी मुझे न दोगे। हम, तुम सभी लोगों के स्वामी अद्वैताचार्य जी यहाँ रहेंगे ही। मैं भी जगन्नाथपुरी में निवास करूंगा। कभी-कभी तुम लोग मेरे पास आते-जाते ही रहोगे। मैं भी कभी-कभी गंगास्नान के निमित्त यहाँ आया करूंगा। इस प्रकार परस्पर एक-दूसरे से भेंट होती ही रहेगी।’
इतने में ही चन्द्रशेखर आचार्यरत्न बोल उठे- ‘हम सब लोगों को तो आप जैसे-तैसे समझा भी देंगे, किन्तु शचीमाता से क्या कहते हैं, वह तो आपके बिना जीना ही नहीं चाहतीं!’
प्रभु ने कातर-भाव से कहा- ‘माता को मैं समझा ही क्या सकता हूँ? आप लोग ही उसे समझावेंगे तो समझेगी। फिर माता जैसी आज्ञादेगी मैं वैसा ही करूँगा। यदि वह मुझसे घर रहने के लिये कहेगी तो मैं वैसा भी कर सकता हूँ।’
इतने में ही अश्रु-विमोचन करती हुई माता भी आ पहुँची। उन्होंने गद्गद कण्ठ से कहा- ‘निमाई! क्या सचमुच में तू हमें छोड़कर यहाँ से भी कहीं अन्यत्र जाने का विचार कर रहा है?’
प्रभु ने माता को समझाते हुए करूण स्वर में कहा- ‘माता! मैं तुम्हारी आज्ञा का उल्लघंन नहीं कर सकता। तुम जैसा कहोगी वैसा ही करूँगा। संन्यासी के लिये अपने घर के समीप तथा अपने सम्बन्धियों के यहाँ इतने दिन रहने का विधान ही नहीं है! अधिक दिनों तक एक का अन्न खाते रहना भी संन्यासी के लिये निषेध है। किंतु मैंने तुम्हारी और आचार्य की प्रसन्नता के निमित्त इतने दिनों तक यहाँ रहकर तुम्हारे ही हाथ की भिक्षा की। अब मुझे कहीं अन्यत्र जाकर रहना चाहिये। मेरी इच्छा तो श्रीवृन्दावन जाने की थीं, किंतु तुम सबका स्नेह मुझे बलपूर्वक यहाँ खींच लाया। अब तुम जहाँ के लिये आज्ञा करोगी, वहीं रहूंगा। तुम्हारी आज्ञा के प्रतिकुल आचरण करने की मुझमें क्षमता नहीं है। माता! मैं सदा तुम्हारा रहा हूँ और रहूँगा।’
अपने संन्यासी पुत्र के ऐसे प्रेमपूर्ण वचन सुनकर माता का हृदय भी पलट गया। इन प्रेमवाक्यों ने मानो अधीर हुई माता के हृदय में साहस का संचार किया। माता ने दृढ़ता के स्वर में कहा- ‘बेटा! मेरे भाग्य में जैसा बदा होगा, उसे मैं भोगूँगी। मुझे अपना इतना खयाल नहीं था, जितना कि विष्णुप्रिया का। वह अभी निरी अबोध बालिका है, संसारी बातों से वह एकदम अपरिचित है! किंतु भावी प्रबल होती है, अब हो ही क्या सकता है? संन्यास त्यागकर फिर गृहस्थ में प्रवेश करने की पापवार्ता को अपने मुख से निकालकर मैं पापकी भागिनी नहीं बनूंगी। संन्यासी-अवस्था में घर पर रहने से सभी लोग तेरी अवश्य ही निन्दा करेंगे। तेरे वियोग-दु:ख को तो जिस किसी प्रकार मैं सहन भी कर सकती हूँ, किंतु लोगों के मुख से तेरी निन्दा मैं सहन न कर सकूँगी; इसलिये मैं तुझसे घर पर रहने का भी आग्रह नहीं करती। वृन्दावन बहुत दूर है, तेरे वहाँ रहने से भक्तों को भी क्लेश होगा और मुझे भी तेरे समाचार जल्दी-जल्दी प्राप्त न हो सकेंगे। यदि तेरी इच्छा हो और अनुकूल पड़े तो तू जगन्नाथपुरी में निवास कर।
पुरी की यात्रा के लिये यहाँ से प्रतिवर्ष हजारों यात्री जाते हैं, भक्त भी रथ यात्रा के समय जाकर तुझसे भेंट कर आया करेंगे और मुझ भी तेरी राजी-खुशी का समाचार मिलता रहेगा। इस प्रकार नीलाचल में रहने से हम सभी को तेरा वियोग-दु:ख इतना अधिक न अखरेगा। आगे जहाँ तुझे अनुकूल पड़े।’ प्रभु ने प्रसन्नता प्रकट करते हुए कहा- ‘जननी! तुम धन्य हो! विश्वरूपी की माता को ऐसे ही वचन शोभा देते हैं। तुमने संन्यासी की माता की माता के अनुरूप ही वाक्य कहे हैं। मुझे तुम्हारी आज्ञा शिरोधार्य है। मैं अब पुरी में ही जाकर रहूँगा और वहीं से कभी-कभी गंगास्नान के निमित्त यहाँ भी आता-जाता रहूंगा।’
इस प्रकार माता ने भी प्रभु को नीलाचल में ही रहने की अनुमति दे दी और भक्तों ने भी रोते-रोते विषण्णवदन होकर यह बात स्वीकार कर ली। प्रभु का नीलाचल जाने का निश्चय हो गया। बहुत-से भक्त प्रभु के साथ चलने के लिये उद्यत हो गये,किंतु प्रभु ने सबको रोक दिया और सबसे अपने-अपने घरों को लौट जाने का आग्रह करने लगे। भक्त प्रभु को छोड़ना नहीं चाहते थे, वे प्रभु के प्रेमपाश में ऐसे बंधे हुए थे कि घर जाने का नाम सुनते ही घबड़ाते थे। प्रभु के बहुत आग्रह करने पर भी जब भक्त प्रभु से पहले अपने-अपने घरों को जाने के लिये राजी नहीं हुए तब प्रभु ने पहले स्वयं ही नीलाचल के लिये प्रस्थान करने का विचार किया। इतने दिनों तक अद्वैताचार्य के आग्रह से टिके हुए थे, अब रोते-रोते अद्वैताचार्य ने भी सम्मति दे दी। प्रभु के साथ नित्यानन्दजी, जगदानन्द पण्डित, दामोदर पण्डित और मुकुन्ददत्त- ये चार भक्त जाने के लिये तैयार हुए।
क्रमशः
Comments
Post a Comment