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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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प्रभु के मुख से शिव जी के इस पवित्र आख्यान को सुनकर सभी भक्त प्रसन्न हुए और प्रभु की आज्ञा प्राप्त करके वह रात्रि उन्होंने वहीं सुखपूर्वक बितायी। प्रात:काल नित्यकर्मो से निवृत होकर और भूवनेश्वर भगवान के दर्शन करके प्रभु अपने भक्तों के सहित कमलपुर में पहुँचे और वहाँ जाकर पुण्यतोया भार्गी-नदी में सभी ने सूखपूर्वक स्नान किया। वहाँ कपोतेश्वर भगवान के मन्दिर में जाकर शिव जी की स्तुति की और भक्तों सहित प्रभु दक्षिण-दिशा की ओर देखने लगे। यहाँ से श्रीजगन्नाथपुरी तीन ही कोस रह जाती है। भगवान जगन्नाथ जी के मन्दिर की विशाल ध्वजा और चक्र यहाँ से स्पष्ट दिखने लगते हैं।
प्रभु ने दूर से जगन्नाथ जी के मन्दिर की फहराती हुई विशाल ध्वजा देखी। उस ध्वजा के दर्शनमात्र से ही प्रभु पछाड़ खाकर पृथ्वी पर गिर पड़े। वे प्रेम में उन्मत्त होकर कभी हँसते थे, कभी रोते थे, कभी आगे को दौड़ते थे और कभी संज्ञाशून्य होकर गिर पड़ते थे। चेतना होने पर फिर उठते और फिर गिर पड़ते। कभी लम्बे लेटकर ध्वजा के प्रति साष्टांग प्रणाम करते और प्रणाम करते-करते ही आगे चलते। एक बार भूमि पर लोटकर प्रणाम करते, फिर खड़े हो जाते और फिर प्रणाम करते। इस प्रकार आँखों से अश्रु बहाते हुए धूल में लोट-पोट होते हुए दर्शन की उत्कट इच्छा से गिरते-पड़ते तीसरे पहर अठारहनाला के समीप पहुँचे। भक्त भी प्रभु के पीछे-पीछे संकीर्तन करते हुए आ रहे थे। अठारहनाला पुरी के समीप एक सेतु है। इसी सेतु से जगन्नाथपुरी में प्रवेश करते हैं। प्रभु उस स्थान पर जाकर बेहोश होकर गिर पड़े। पीछे से भक्त ही वहाँ पहुँच गये।अठारहनला पहुँचने पर प्रभु को कुछ-कुछ बाह्य-ज्ञान हुआ। आप वहीं कुछ चिन्तित-से होकर बैठ गये। दोनों आँखों रोते-रोते लाल पड़ गयी थीं। भृकुटी चढ़ी हुई थी। शरीर में सभी सात्त्विक भावों का उद्दीपन हो रहा था। कुछ प्रकृतिस्थ थे, कुछ भावावेश में बेसुध– से थे। उसी मध्य की अवस्था में अपने भक्तों से बहुत ही नम्रता के साथ कहा- ‘भाइयो ! आप लोगों ने मेरे साथ बहुत बड़ा उपकार किया है। इससे बढ़कर और उपकार हो ही क्या सकता है। आप लोगों ने मुझे रास्ते की भाँति-भाँति की विपत्ति से बचाकर यहाँ तक पहुँचा दिया। आप लोग मेरे साथ न होते तो न जाने मैं कहाँ-कहाँ भटकता फिरता, इस बात का निश्चय नहीं था कि मैं यहाँ तक आ भी सकता या नहीं। आप लोगों ने कृपा करके मुझे श्री जगन्नाथ पुरी के दर्शन करा दिये। मैं कृतार्थ हो गया। मैंने आप लोगों को यहाँ तक साथ रखने का विचार किया था। अब आप लोगों की जहाँ इच्छा हो, वहीं जाइये। अब मैं आप लोगों के साथ न रहूँगा।’
श्रीजगन्नाथ जी के दर्शन से मूर्छा……
नित्यानंदजी ने अपनी हंसी रोकते हुए कहा- ‘न रखियेगा हम लोगों को साथ, हम साथ रहने को कह ही कब रहे हैं? जब यहाँ तक आये हैं, तो जगन्नाथ जी के दर्शन करने तो चलने देंगे?’
प्रभु ने सिर हिलाते हुए गम्भीर स्वर में कहा- ‘यह नहीं हो सकता। आप लोग मेरे साथ न चलें। यदि आप लोगों को दर्शन करने की इच्छा है, तो या तो मुझसे पीछे जायं या आगे चले जायँ। मेरे साथ नहीं जा सकते। बोलो, आगे जाते हो या पीछे रहते हो?’
कुछ मुसकुराते हुए मुकुन्ददत्त ने कहा- ‘प्रभो ! आप ही आगे चलें, हम तो पीछे ही आये हैं और सब जगही आपके पीछे हो जायँगे।’
बस, इतना ही सुनना था कि महाप्रभु श्रीजगन्नाथ जी के मन्दिर की ओर बड़े ही वेग के साथ दौड़े। मानो किसी अरण्य के मत्त गजेन्द्र ने अपनी उन्मादी अवस्था में किसी ग्राम में प्रवेश किया हो और उसे देखकर मारे भय के ग्राम्य पशु इधर-उधर भागने लगे हों, उसी प्रकार प्रभु को इस उन्मत्तावस्था में मन्दिर की ओर दौड़ते देखकर रास्ते में चलने वाले सभी पथिक इधर-उधर भागने लगे। बहुत-से तो चौंककर दूसरी ओर हट गये। बहुत-से रास्ता छोड़कर एक ओर हट गये और बहुत-से मतिभ्रम हो जाने के कारण पीछे की ही ओर दौड़ने लगे।
महाप्रभु किसी की भी कुछ परवा न करते हुए सीधे मन्दिर की ओर दौड़ते गये। मन्दिर के सिंहद्वार में प्रवेश करके आप सीधे जगमोहन में चले गये और एकदम छलाँग मारकर बात-की-बात में ठीक भगवान के सामने पहुँच गये। सुभद्रा और बलराम के सहित श्रीजगन्नाथ जी के दर्शन करते ही प्रभु का उन्माद पराकाष्ठा को भी पार कर गया। वे महान आवेशों में आकर भगवान के श्रीविग्रह का आलिंगन करने के लिये भीतर मन्दिर की ओर दौड़े। इतने में ही मन्दिर के पहरेदारों ने प्रभु को बीच में ही रोक दिया। प्रहरियों के बीच में आ जाने से प्रभु मुर्च्छित होकर भूमि पर गिर पड़े। उन्हें अपने शरीर का कुछ भी होश नहीं था। चेतन शून्य मनुष्य की भाँति वे निर्जीव-से हुए जगमोहन में पड़े थे। हजारों दर्शनार्थी जगन्नाथ जी के दर्शन को भूलकर इनके दर्शन करने लगे। मन्दिर के बहुत-से यात्री तथा कर्मचारीगण प्रभु को चारों ओर से घेरकर खड़े हो गये। प्रभु अपनी उसी अवस्था में बेहोश पड़े रहे।उसी समय उड़ीसा के महाराज की पाठशाला के प्रधानाध्यापक आचार्य वासुदेव सार्वभौम भगवान के दर्शन के लिये मन्दिर में पधारे थे। भगवान के दर्शन करते-करते ही उनकी दृष्टि महाप्रभु के ऊपर पड़ी। वे महाप्रभु के अद्भुत रूप-लावण्ययुक्त तेजस्वी विग्रह के दर्शनमात्र से ही उनकी ओर अपने-आप ही आकर्षित हो गये। प्रभु की ऐसी उच्चावस्था देखकर वे जल्दी से महाप्रभु के पास जाकर खड़े हो गये। बड़ी देर तक एकटक भाव से वे प्रभु की ओर निहारते रहे। सार्वभौम महाशय न्याय तथा वेदान्तशास्त्र के तो प्रकाण्ड पण्डित थे ही, अलंकार-ग्रन्थों का भी उन्हें अच्छा ज्ञान था। वे विकार, भाव, अनुभाव तथा नायिका आदि के भेद-प्रभेदों से भी परिचित थे। वे शास्त्रदृष्टि से प्रभु की दशा का मिलान करने लगे।
वे खड़े-ही-खड़े मन में सोच रहे थे कि ‘प्रणय’ के इतने उच्च भावों का मनुष्य-शरीर में प्रकट होना तो सम्भव नहीं। इनमें सभी सात्त्विक विकार एक साथ ही उद्दीप्त हो उठे हैं और उन्हें संवरण करने में भी ये समर्थ नहीं हैं।
क्रमशः
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