cc 202

श्री श्री चैतन्य चरितावली 
202-

एक तो लौकिकी बुद्धि और दूसरी परमार्थ-सम्‍बन्धिनी बुद्धि। लौकिकी बुद्धि से परमार्थ के पथ में काम नहीं चलने का। चाहे आप कितने भी बड़े विद्वान क्‍यों न हों और आपको चाहे जितनी ऊँची-ऊँची बातें सूझती हों, पर उस इतनी ऊँची प्रखर बुद्धि का अन्तिम फल सांसारिक सुखों की प्राप्तिमात्र ही है। जब तक उस बुद्धि को आप परमार्थ की ओर नहीं झुकाते, तब तक आप में और लकड़ी बेचकर पेट भरने वाले जड पुरुष में कुछ भी अन्‍तर नहीं। वह दिनभर परिश्रम करके चार पैसे ही रोज पैदा करता है और उसी से जैसे-तैसे अपने परिवार का भरण-पोषण करता है और आप अपनी प्रखर प्रतिभा के प्रभाव से हजारों, लाखों रुपये रोज पैदा करते हैं। उनसे भी आपकी पूर्णरीत्‍या संतुष्टि नहीं होती और अधिकाधिक धन प्राप्‍त करने की इच्‍छा बनी ही रहती है। धन की प्राप्ति में दोनों ही उद्योग करते हैं और दोनों को जो भी प्राप्‍त होता है उसमें अपनी-अपनी स्थिति के अनुसार दोनों ही असंतुष्‍ट बने रहते हैं। तब केवल शास्त्रों की बातें पढ़ाकर पैसा पैदा करने वाले पण्डित में और लकड़ी बेचकर जीवननिर्वाह करने वाले मूर्ख में अन्‍तर ही क्‍या रहा? तभी तो तुलसीदास जी ने कहा है-

काम, क्रोध, मद, लोभ की, जबलग मन में खान।
तबलग पंडित मूरखा दोनों एक समान।

वे सर्वविद्याविशारद अपने समय के अद्वितीय नैयायिक पण्डितप्रवर आचार्य वासुदेव सार्वभौम प्रभु के दर्शनों के पूर्व उसी प्रकार के पोथी के पण्डित थे, उनकी बुद्धि जब तक परमार्थ-पथ मे विचरण करने वाली नहीं बनी थी, तब तक उनकी सम्‍पूर्ण शक्ति पुस्‍तक की विद्या की ही पर्यालोचना में नष्‍ट होती थी।
आचार्य वासुदेव सार्वभौम का घर नवद्वीप के ‘विद्यानगर’ नामक स्‍थान में था। इनके पिता का नाम महेश्वर विशारद था। विशारद महाशय शास्‍त्रज्ञ और कर्मनिष्‍ठ ब्राह्मण था। महाप्रभु के मातामह श्रीनीलाम्‍बर चक्रवर्ती के साथ पढ़े थे। सार्वभौम दो भाई थे। इनके दूसरे भाई श्रीमधुसूदन वाचस्‍पति बहुत प्रसिद्ध विद्वान तथा नामी पण्डित थे। उनकी एक बहिन थी जिसका विवाह श्री गोपीनाथाचार्य के साथ हुआ था।

सार्वभौम महाशय की बुद्धि बाल्‍यकाल से ही तीव्र थी। पाठशाला में ये जिस पाठ के एक बार सुन लेते फिर उसे दूसरी बार याद करने की इन्‍हें आवश्‍यकता नही होती थी। पढ़ने में प्रमाद करना तो ये जानते ही नहीं थे। किसी बात को भूलना तो इन्‍होंने सिखा ही नहीं था। एक बार इन्‍हें जो भी सूत्र या श्‍लोक कण्‍ठस्‍थ हो गया मानो वह लोहे की ल‍कीर की भाँति स्‍थायी हो गया।
जिस समय वे नवद्वीप में विधार्थी बनकर विद्याध्‍ययन करते थे उस समय नवद्वीप संस्‍कृत-विद्या का एक प्रधान पीठ बना हुआ था। गौड़, उत्‍कल और बिहार आदि सभी देशों के छात्र वहाँ आ-आकर संस्‍कृत-विद्या का अध्‍ययन करते थे। नवद्वीप में व्‍याकरण, काव्‍य, अलंकार, ज्‍योतिष, दर्शन तथा वेदान्‍तादि शास्त्रों की समुचितरूप से शिक्षा दी जाती थी, किन्‍तु तब तक नव्‍य-न्‍याय का इतना अधिक प्रचार नहीं था या यों कह सकते हैं कि तब तक गौड़-देश में नव्‍य-न्‍याय था ही नहीं। गौड़-देश के सभी छात्र न्‍याय पढ़ने के निमित्त मिथिला जाया करते थे। उन दिनों मिथिला ही न्‍याय का प्रधान केन्‍द्र समझा जाता था। मैथिल पण्डित वैसे तो जो भी उनके पास न्‍याय पढ़ने आता उसे ही प्रेमपूर्वक न्‍याय की शिक्षा देते, किन्‍तु वे न्‍याय की पुस्‍तकों को साथ नहीं ले जाने देते थे। विशेषकर बंगदेशीय छात्रों को तो वे खूब ही देख-रेख रखते। उस समय आज की भाँति छापने के यन्‍त्रालय तो थे ही नहीं। पण्डितों के ही पास हाथ की लिखी हुई पुस्‍तकें होती थीं, वही उनका सर्वस्‍व था। उनकी प्रतिलिपि भी वे सर्वसाधारण को नहीं करने देते थे। जब किसी की वर्षों परीक्षा करके उसे योग्‍य अधिकारी समझते तब बड़ी कठिनता से पुस्‍तक की प्रतिलिपि करने देते। पुस्‍तकों के अभाव से नवद्वीप में कोई न्‍याय की पाठशाला ही स्‍थापित न हो सकी थी। सर्वप्रथम रामभद्र भट्टाचार्य ने न्‍याय की एक छोटी-सी पाठशाला खोली। वे भी मिथिला से न्‍याय पढ़कर आये थे, किन्‍तु पुस्‍तक के अभाव से वे छात्रों की शंकाओं का ठीक-ठीक समाधान नहीं कर सकते थे।

विद्यार्थी वासुदेव भी अपने भाई मधुसुदन के साथ रामभद्र भट्टाचार्य की पाठशाला में न्‍याय पढ़ने लगे। कुशाग्रबुद्धि वासुदेव अपने न्‍याय के अध्‍यापक के सम्‍मुख जो शंका उठाते, उसका यथावत उतर न पाकर वे असन्‍तुष्‍ट होते। इनके अध्‍यापक इनकी प्रत्‍युत्‍पन्‍न प्रखर बुद्धि को समझ गये और इनसे एक दिन एकान्‍त में बोले- ‘भैया ! तुम सचमुच में नैयायिक बनने योग्‍य हो, तुम्‍हारी बुद्धि बड़ी ही कुशाग्र है। मैं तुम्हारी शंकाओं का ठीक-ठीक समाधान करने में असमर्थ हूँ। इसका प्रधान कारण यह है कि हमारे यहाँ तो कोई न्‍याय का पण्डित है नहीं। हम सबको न्‍याय पढ़ने के लिये मिथिला जाना पड़ता है। मिथिला ही आजकल भारतवर्ष में न्‍याय का प्रधान केन्‍द्र माना जाता है। मैथिल पण्डित पढ़ाने के लिये तो किसी को इनकार नहीं करते, जो भी उनके पास पढ़ने की इच्‍छा से जाता है, उसे प्रेमपूर्वक पढ़ाते हैं; किन्‍तु पुस्‍तक वे किसी को साथ नहीं ले जाते देते। ऐसी स्थिति में बिना पुस्‍तक जितना हम पढ़ा सकते उतना पढ़ाते हैं।’

आचार्य वासुदेव सार्वभौम…..

अपने न्‍याय के अध्‍यापक के मुख से ऐसी बात सुनकर आत्‍माभिमानी वासुदेव विद्यार्थी को इससे बहुत ही दु:ख हुआ। उन्‍हें अध्‍यापक की विवशता पर दया आयी। उसी समय उन्‍होंने निश्‍चय कर लिया कि बंगदेश में न्‍याय की पुस्‍तकों के अभाव को मैं दूर करूँगा। उन्‍हें अपनी बुद्धि, स्‍मरणशक्ति और अद्भुत धारणा का विश्‍वास था। उसी दृढ़ विश्‍वास के वशीभूत होकर वे मिथिला पहुँचे और वहाँ जाकर उन्‍होंने विधिवत न्‍याय का पाठ समाप्‍त किया। अपने पुराने अध्‍यापक के मुख से उन्‍होंने जो बात सुनी थी, वह बिलकुल सच निकली। उन्‍हें इस बात का स्‍वयं अनुभव हो गया कि यहाँ से न्‍याय की पुस्‍तकें ले जाना सामान्‍य काम नहीं है। इसलिये उन्‍होंने न्‍याय के एक बड़े प्रामाणिक ग्रन्‍थ को आद्योपान्त कण्‍ठस्‍थ कर लिया। इस प्रकार वे कागज की पुस्‍तक को तो साथ न ला सके; किन्‍तु अपने हृदय के स्‍वच्‍छ पृष्‍ठों पर स्‍मरणशक्ति की सहायता से बुद्धि द्वारा लिखकर वे न्‍याय की पूरी पुस्‍तक को अपने साथ ले आये। आते ही इन्‍होंने नवद्वीप में अपनी न्‍याय की पाठशाला स्‍थापित कर दी।
क्रमशः

Comments

Popular posts from this blog

cc 201

362

cc 90