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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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भला, जो इतने बड़े भारी प्रामाणिक ग्रन्थ को यथाविधि अक्षरश: कण्ठस्थ करके अपने देश के विद्यार्थियों के कल्‍याण के निमित्त ला सकता है, वह पुरुष कितना भारी बुद्धिमान, कितना बड़ा देशभक्‍त, कितनी उच्‍च श्रेणी का विद्याव्‍यासंगी तथा शास्‍त्रप्रेमी होगा, इसका पाठक स्‍वयं ही अनुमान कर सकते हैं। 

सार्वभौम की विद्वत्ता, छात्रप्रियता, गम्‍भीरता तथा पढ़ाने की सुन्‍दर और सरल शैली की थोड़े ही दिनों में दूर-दूर तक ख्‍याति फैल गयी। विभिन्‍न प्रान्‍तों से न्‍याय पढ़ने वाले बहुत-से छात्र इनके पास आ-आकर अपनी न्यायशास्त्र की पिपासा को इनके सुन्दर, सरल और प्रेमपूर्वक पढ़ाये हुए पाठ के द्वारा शांत करने लगे। इनके मित्र विद्यार्थी लोकप्रसिद्ध नैयायिक हुए, जिनके बनाए हुए ग्रन्‍थ नव्यन्‍याय में बहुत ही प्रामाणिक समझे जाते हैं। ‘दीधिति’ के रचयिता रघुनाथ पण्डित इन्‍हीं सार्वभौम महाशय के शिष्‍य थे।

उत्‍कल (उड़ीसा) प्रान्‍त के महाराजा प्रतापरुद्र जी संस्‍कृत-विद्या के बड़े ही प्रेमी थे। उन्‍होंने सार्वभौम भट्टाचार्य की विद्वत्ता की प्रशंसा सुनकर उन्‍हें अपनी पाठशाला में पढ़ाने के लिये बुला लिया।

सार्वभौम आचार्य राजा के सम्‍मानपूर्वक आमन्‍त्रण की अवहेलना नहीं कर सके, वे अपनी छात्रमण्‍डली के सहित जगन्‍नाथपुरी में महाराज की पाठशाला में पहुँच गये और वहीं वे विद्यार्थियों को विविध शास्त्रों शिक्षा देने लगे।इसी बीच में इन्‍हें एक दिन सहसा महाप्रभु के दर्शन हो गये और उन्‍हें मूर्च्छित दशा में ही उठाकर अपने घर ले आये। पीछे से नित्‍यानन्‍द आदि प्रभु के चारों साथी भी वहाँ आ पहुँचे। तीसरे पहर प्रभु को जब ब्राह्म-ज्ञान हुआ, तब वे समुद्रस्‍नान करने के लिये गये और सार्वभौम के आग्रह से भोजन करने के लिये बैठे। सार्वभौम महाशय महाप्रभु के अद्भुत रुप-लावण्‍ययुक्‍त तेजस्‍वी मुखमण्‍डल को देखकर स्‍वंय ही उनकी ओर खिंचे-से जाते थे। प्रभु के दर्शन से ही वे अपने इतने बड़े शास्‍त्राभिमान को भूल गये और मन-ही-मन उनके चरणों में भक्ति करने लगे। महाप्रभु को संन्‍यासी समझकर ही सार्वभौम महाशय ने पूर्ण भक्तिभाव के साथ उन्‍हें भोजन कराया था। अन्‍त में उन्‍होंने महाप्रभु के चरणों में गृहस्‍थ-धर्म के अनुसार संन्‍यासी को पूज्‍य समझकर प्रणाम किया। संन्‍यासी जगत को नारायण का ही रुप देखता है। उसकी दृष्टि में ‘नारायण’ से पृथक किसी अन्‍य पदार्थ की सत्ता ही नहीं। इसीलिये संसारी लोग संन्‍यासी को ‘ॐ नमो नारायणाय’ कहकर ही प्रणाम करते हैं। संन्‍यासी उसके उत्तर में ‘नारायण’ ऐसा कह देते हैं। अर्थात वह इन्‍हें नारायण समझकर प्रणाम करता है, उनकी दृष्टि में भी प्रणाम करने वाला नारायण से भिन्‍न नहीं है, इसलिये वे भी कह देते हैं ‘नारायण’ अर्थात तुम भी नारायण के स्‍वरुप हो।

भट्टाचार्य सार्वभौम ने भी ‘ॐ नमो नारायण’ ही कहकर प्रभु को प्रणाम किया। प्रभु ने उसके उत्तर में कहा- ‘आपको श्रीकृष्‍ण भगवान के पादपद्मों में प्रगाढ़ प्रीत हो।’

इस आशीर्वाद को सुनकर सार्वभौम महाशय को प्रसन्‍नता हुई और वे मन-ही-मन सोचने लगे कि वे कोई भगवदभक्त वैष्‍णव संन्‍यासी हैं, इसीलिये भट्टाचार्य के हृदय में इनका परिचय प्राप्‍त करने की इच्‍छा उत्‍पन्‍न हुई। प्रभु से तो इस बात को पूछने ही कैसे? शास्‍त्रज्ञ विद्वान होकर वे संन्‍यासी से उसके पूर्वाश्रम का ग्राम-नाम पूछते ही क्‍यों? संन्‍यासी से उसके पूर्वाश्रम की बातें करना निषिद्ध माना गया है, इसलिये प्रभु से न पूछकर अपने बहनोई गोपीनाथाचार्य से पूछा- ‘आचार्य ! आप इन संन्‍यासी के पूर्वाश्रम का कुछ समाचार जानते हैं?’

कुछ हँसकर आचार्य ने कहा- ‘आप इन्‍हें नहीं पहचान सके। नवद्वीप ही तो इनकी जन्‍मभूमि है। ये पं जगन्‍नाथ मिश्र पुरन्‍दर के पुत्र और श्री नीलाम्‍बर चक्रवर्ती के दौहित्र हैं।’

सार्वभौम को प्रभु का परिचय बड़ी प्रसन्‍नता हुई। नीलाम्‍बर चक्रवर्ती इनके पिता के सहाध्‍यायी थे और पुरन्‍दर पण्डित इनके साथ कुछ दिन पढ़े थे। सार्वभौम के पिता में और नीलाम्‍बर चक्रवर्ती में बड़ी प्रगाढ़ता थी। इसी सम्‍बन्‍ध से सार्वभौम के पिता पं. जगन्‍नाथ मिश्र को अपना मान्‍य समझते थे। अब तक सार्वभौम महाशय इन्‍हें एक कृष्‍णप्रेमी वैरागी संन्‍यासी समझकर ही मन-ही-मन भक्ति कर रहे थे। गोपीनाथ जी से प्रभु का परिचय पाते ही इनका भाव-परिवर्तन हो गया। अब तक वे तटस्‍थ भाव से एक सद्गृहस्‍थ की भाँति संन्‍यासी के प्रति जैसा शिष्‍टाचार बर्तना चाहिये वैसा बरत रहे थे। अब उनका प्रभु के प्रति कुछ ममत्‍व-सा हो गया और उनकी वह भक्ति भी वात्‍सल्‍यभाव में परिणत हो गयी। कुछ अपनापन प्रकट करते हुए सार्वभौम कहने लगे- ‘मुझे क्‍या पता था कि ये अपने घर के ही हैं। नीलाम्‍बर चक्रवर्ती के सम्‍बन्‍ध से एक तो ये हमारे वैसे ही मान्‍य तथा पूज्‍य हैं, जिस पर संन्‍यासी। इसलिये हमारे तो वे पूजनीय, सम्‍बन्‍धी और अत्‍यन्‍त ही आदरणीय हैं।’
प्रभु ने अत्‍यन्‍त ही नम्रता प्रकट करते हुए लज्जित भाव से कहा- ‘आप यह कैसी बातें कर रहे हैं, मैं तो आपके लड़के के समान हूँ। आप ज्ञानवृद्ध, वयोवृद्ध, विद्यावृद्ध तथा अधिकारवृद्ध हैं। बड़े-बड़े संन्‍यासियों को आप शास्‍त्रों की शिक्षा देते हैं। आपके सामने मैं कह ही क्‍या सकता हूँ? मैं तो आपके शिष्‍यों के शिष्‍य होने योग्‍य भी नहीं हूँ। अभी मेरी अवस्‍था भी बहुत छोटी है, मुझे संसार का कुछ भी ज्ञान नहीं है।’

सार्वभौम ने कहा- ‘ये वचन तो आपके शील-स्‍वभाव के द्योतक हैं। हमारे लिये तो संन्‍यासी होने के कारण आप पूज्‍य ही हैं।’

प्रभु ने फिर उसी प्रकार लजाते हुए धीरे-धीरे नीची दृष्टि करके कहा- ‘मैं तो अभी बच्‍चा हूँ, संन्‍यास के मर्म को क्‍या जानूँ? वैसे ही भावुकता के वशीभूत होकर मैंने रंगीन कपड़े पहन लिये हैं। संन्‍यासी का क्‍या कर्तव्‍य है, इस बात का मुझे कुछ पता नहीं। आप लोकशिक्षक हैं, अत: गुरु मानकर मैंने आपके ही चरणों का आश्रय लिया है। आप मेरा उद्धार कीजिये और मुझे संन्‍यासी के करने योग्‍य कर्मों की भिक्षा दीजिये। आज ही आपने मुझे इतनी घोर विपत्ति से बचा लिया। इसी प्रकार आगे भी आप मेरी रक्षा करते रहेंगे।’

सार्वभौम ने प्रेम प्रदर्शित करते हुए कहा- ‘देखना, अब कभी अकेले दर्शन करने मत जाना। जब भी दर्शन करने जाना तभी या तो चन्‍दनेश्‍वर को साथ ले जाना या किसी दूसरे मनुष्‍य को। तुम्‍हारा अकेले ही मन्दिर में दर्शन के लिये जाना ठीक नहीं है।’

प्रभु ने विनित भाव से कहा- ‘अब मैं कभी मन्दिर में भीतर दर्शन करने जाया ही न करूँगा। भगवान गरुड़ के ही सामने से दर्शन कर लिया करूँगा !’
क्रमशः

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