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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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पुराने लोगों ने ठीक ही कहा है- ‘आचार्य ने उड़ने की शक्ति नहीं होती, पीछे से शिष्‍यगण ही उसके पंख लगाकर उन्‍हें आकाश में उड़ा देते हैं, मालूम पड़ता है आप इस युवक संन्‍यासी के अभी से पर लगाना चाहते हैं। आपकी दृष्टि में ये ईश्‍वर हैं?’ आवेश के साथ आचार्य ने कहा- ‘हाँ ईश्‍वर हैं, ईश्‍वर हैं, ईश्‍वर हैं। मैं प्रतिज्ञा करके कहता हूँ ये साधारण जीव नहीं हैं।’

आचार्य की आवेशपूर्ण बातों को सुनकर सार्वभौम के आसपास में बैठे हुए स‍भी शिष्‍य एकदम चौंक-से पड़े। सार्वभौम भी कुछ विस्मित-से होकर आचार्य के मुख की ओर देखने लगे। थोड़ी देर के पश्‍चात हंसते हुए सार्वभौम ने कहा- ‘मुँह आपके घर का है, जीभ उधार लेने किसी के पास जाना नहीं पड़ता, जो आपके मन में आवे वह अनाप-शनाप बकते रहें। किन्‍तु आपने तो शास्‍त्रों का अध्‍ययन किया है, भगवान के अवतार तीनों ही युगों में होते हैं। कलिकाल में इस प्रकार के अवतारों की बात कहीं भी नहीं सुनी जाती। फिर अवतार तो सब गिने-गिनाये हैं। उनमें तो हमने ऐसा अवतार कहीं नहीं सुना। वैसे तो जीवमात्र को ही भगवान का अंश होने से अवतार कहा जा सकता है। अथवा-

अवतारा ह्यसंख्‍येया हरे: सत्त्वनिधेर्द्विजा:।
यथाविदासिन: कुल्‍या: सरस: स्‍यु: सहस्‍त्रश:।

श्रीमदभागवत के इस श्‍लोक के अनुसार असंख्‍य अवतार भी माने जा सकते हैं और वे आवश्‍यकता पड़ने पर सब युगों में उत्‍पन्‍न हो सकते हैं, किन्‍तु उनकी गणना अंशाश-अवतारों में भी की गयी है जैसा कि श्रीमद्भगवदगीता में कहा हैं-

यद्यद्विभूतिमत्‍सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा।
तत्तदेवावगच्‍छ त्‍वं मम तेजोंऽशसम्‍भवम्।

इस दृष्टि से आप इन संन्‍यासी को अवतार कहते हैं, तो हमें भी कोई आपत्ति नहीं, किन्‍तु ये ही साक्षात सनातन परब्रह्म हैं, सो कैसे हो सकता है? भगवान श्रीकृष्‍ण ही सनातन पूर्ण ब्रह्म हैं, उनका अवतार युगों में नहीं होता, कल्‍पों में भी नहीं होता, कभी सैकड़ों-हजारों युगों के पश्‍चात वे अवतीर्ण होते हैं। इसलिये आप कोरी भावुकता की बातें कर रहे हैं।’
आचार्य ने कहा- ‘मालूम पड़ता है, बहुत शास्‍त्रों की आलोचना करने से शास्त्रों के वाक्‍यों को भी आप भूल गये हैं। आप जानते हैं, नित्‍य-अवतार के लिये कोई नियम नहीं। उनका रहस्‍य शास्‍त्र क्‍या समझ सकें? यह तो शास्‍त्रातीत विषय है, नित्‍य-अवतार का कभी तिरोभाव नहीं होता, वह तो एकरस होकर सदा संसार में व्‍याप्‍त रहता है। किसी भाग्‍यवान को ही वह गुरुरूप से प्राप्‍त होते हैं और जिस पर उनका अनुग्रह होता है, वही उनका कृपापात्र बन सकता है।’ हंसते हुए सार्वभौम ने कहा- ‘यह नित्‍यावतार कौन-सी नयी वस्‍तु निकल आयी?’

आचार्य ने कुछ क्षोभ के स्‍वर में कहा- ‘आपको तो समझाना इसी प्रकार है जैसे ऊसर भूमि में बीज बोना। परिश्रम तो व्‍यर्थ जाता ही है, साथ ही बीज का नाश होता है।’

कुछ विनोद के स्‍वर में सार्वभौम ने कहा- ‘उपजाऊ भूमि के चरणों में मैं प्रणाम करता हूँ और इससे प्रार्थना करता हूँ कि हमारे ऊपर भी कृपा करे। आप आपे से बाहर क्‍यों हुए जाते हैं, हमें समझाइये, आप किस प्रकार इन्‍हें साक्षात ईश्‍वर कहते हैं।’

आचार्य ने कहा- ‘सोते को तो जगाया भी जा सकता है, किन्‍तु जो जागता हुआ भी सोने का बहाना करता है, उसे भला कौन जगा सकता है? आप जान-बूझकर भी अनजानों की-सी बातें कर रहे हैं, अब आपकी बुद्धि को क्‍या कहूँ? आप जानते नहीं- ‘गुरु: साक्षात परब्रह्म तस्‍मै श्रीगुरवे नम:।’ इसमें गुरु को साक्षात परब्रह्म बताया गया है। क्‍या गुरु साक्षात परब्रह्म नहीं हैं ? जिनकी संगति से श्रीकृष्‍णपदारविन्‍दों में अनुराग हो, उनमें और श्रीकृष्‍ण में मैं कुछ भी भेद नहीं समझता। जो भी कुछ भेद प्रतीत होता है, वह व्‍यवहार चलाने के लिये है। वास्‍तव में तो गुरु और श्रीकृष्‍ण एक ही हैं। वे अपने-आप ही कृपा करके अपने चरणों में प्रीति प्रदान करते हैं। वे जब तक किसी रूप से कृपा नहीं करते तब तक उनके चरणों में प्रेम होना असम्‍भव है।’

वासुदेव सार्वभौम ने कहा- ‘आचार्य महाशय ! यह तो कुछ भी बात नहीं हुई। इसका तो सम्‍बन्‍ध भावना से है और अपनी-अपनी भावना पृथक-पृथक होती है। यह बात तो सचमुच शास्‍त्रों से परे की है। दृढ़ और शुद्ध भावना के अनुसार मानने के लिये मजबूर नहीं कर सकते। आपकी उन संन्‍यासी युवक में गुरु-भावना या परब्रह्म की भावना है, तो ठीक है। किन्‍तु हम भी आपकी बातों से सहमत हों, इस बात का आग्रह करना आपकी अनधिकार चेष्‍टा है। हम उन्‍हें एक साधारण संन्‍यासी ही समझते हैं। वैसे वे बेचारे बड़े सरल हैं, भगवान की उनके ऊपर कृपा है, इस अल्‍पावस्‍था में भगवान के पादपद्मों में इतना अनुराग, ऐसा अलौकिक त्‍याग, इतना अद्भुत वैराग्‍य सब साधुओं में नहीं मिलने का। बहुत खोजने पर लाखों, करोड़ों में ऐसा अनुराग मिलेगा। हम उनके त्‍याग, वैराग्‍य और भगवत-प्रेम के कायल हैं, किन्‍तु उन्‍हें आपकी तरह ईश्‍वर मानकर लोगों में अवतारपने का प्रचार करें, यह हमारी शक्ति के बाहर की बात है।’
आचार्य ने कुछ दृढ़ता के स्‍वर में कहा- ‘अच्‍छी बात है, देख लिया जायगा। कब तक आपके ये भाव रहते हैं।’

इस प्रसंग को समाप्‍त करने की इच्‍छा से बात के प्रवाह को बदलते हुए सार्वभौम ने कहा- ‘आप तो हमारे जो कुछ हो सो हो ही, हमारी किसी बात को बुरा न मानना। हमारा-आपका तो सम्‍बन्‍ध ही ऐसा हैं, कोई अनुचित बात मुंह से निकल गयी हो तो क्षमा कीजियेगा।’

आचार्य ने कुछ उपेक्षा-सी करते हुए कहा- ‘क्षमा की इसमें कौन-सी बात है! मैं भगवान से प्रार्थना करूँगा कि आपके इन नास्तिकों के–से विचारों में वे परिवर्तन करें और आपको अपना कृपापात्र बना लें।’

हंसते हुए सार्वभौम ने कहा- ‘आप पर ही भगवान की अनन्‍त कृपा बहुत है। उसी में से थोड़ा हिस्‍सा हमें भी दे देना। हां, उन संन्‍यासी महाराज को कल हमारी ओर से भोजन का निमन्‍त्रण दे देना। कल हमारी इच्‍छा उन्‍हें यहीं अपने घर में भिक्षा कराने की है।’

इसके अनन्‍तर कुछ और इधर-उधर की दो-चार बातें हुई और अन्‍त में मुकुन्‍ददत्त के साथ गोपीनाथाचार्य प्रभु के स्‍थान के लिये चले। सार्वभौम की शुष्‍क तर्कों से मुकुन्‍ददत्त को मन-ही-मन बहुत दुख हो रहा था। आचार्य भी कुछ उदास थे।
क्रमशः

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