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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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प्रभु के समीप पहुँचकर गोपीनाथाचार्य ने सार्वभौम से जो-जो बातें हुई थीं, उन्‍हें संक्षेप में सुनाते हुए कहा- ‘प्रभो ! मुझे और किसी बात से दु:ख नहीं है। दु:ख का प्रधान कारण यह है कि सार्वभौम अपने आदमी होकर भी इस प्रकार के विचार रखते हैं। प्रभो ! उनके ऊपर कृपा होनी चाहिये। उनके जीवन में से नीरसता को निकालकर सरसता का संचार कीजिये। यही मेरी श्रीचरणों में विनीत प्रार्थना है।’

प्रभु ने कुछ संकोच के साथ अपनी दीनता दिखाते हुए कहा- ‘आचार्य महाशय ! यह आप कैसी भूली भूली-सी बातें कह रहे हैं। सार्वभौम तो हमारे पूज्‍य हैं- मान्‍य हैं, वे मुझपर पुत्र की भाँति स्‍नेह करते हैं, उनसे बढ़कर पुरी में मेरा दूसरा शुभचिन्‍तक कौन होगा? उन्‍हीं के पादपद्मों की छाया लेकर तो मैं यहाँ पड़ा हुआ हूँ। वे मेरे लिये जो भी कुछ सोचें, उसी में मेरा कल्‍याण होगा। जिस बात से उन्‍हें मेरे अमंगल की सम्‍भावना होगी उसे वे अवश्‍य ही बता देंगे। इसी बात में तो मेरी भलाई है। यदि गुरुजन होकर वे भी मेरी प्रशंसा ही करते रहेंगे, तो मैं इस कच्‍ची अवस्‍था में संन्‍यास-धर्म का पालन कैसे कर सकूँगा? आप उनकी किसी भी बात को बुरा न मानें और सदा उनके प्रति पूज्‍यभाव रखें, वे मेरे, आपके-सबके पूज्‍य हैं। वे शिक्षक, उपदेष्‍टा, आचार्य तथा हमारे हितचिन्‍तक हैं।’ इस प्रकार नम्रतापूर्वक आचार्य को समझाकर प्रभु ने उन्‍हें बिदा किया और आप भक्‍तों के सहित श्रीकृष्‍ण-कीर्तन करने लगे।
पूर्वजन्‍मों के पापों का संचय विशेष न हो, भगवत्‍कृपा हो और किसी प्रकार से सही, हृदय में श्रद्धा के भाव हों, तो पुरुष के उद्धार में देर नहीं लगती। साधु-समागम होते ही बड़े-बड़े दुराचारी दुष्‍कर्मों का परित्‍याग करके परम भागवत बन गये हैं। सत्‍संग की महिमा ही ऐसी अपार है। तभी तो भर्तृहरिजी ने कहा है-

‘सत्‍संगति: कथय किं न करोति पुंसाम्?’

अर्थात ‘सत्‍संगति से मनुष्‍य की कौन-सी भलाई नहीं हो सकती ?’ सारांश यही है, कि सत्‍संगति से सभी प्रकार के बन्‍धन छिन्‍न-भिन्‍न हो जाते हैं, किंतु सबको सत्‍संगति प्राप्‍त करने का सौभाग्‍य नहीं होता। जिसके संसारी बन्‍धनों के छूटने का समय समीप आ चुका है, जिसके ऊपर आदिपुरुष अच्‍युत का पूर्ण अनुग्रह है, उसे ही साधु पुरुषों की संत्‍सगति प्राप्‍त हो सकती है।

सार्वभौम भट्टाचार्य विद्वान थे, पण्डित थे, शास्‍त्रज्ञ थे और वर्णाश्रमधर्म में श्रद्धा रखते थे। शास्‍त्रोक्त वैदिक कर्मों को भी वे यथाशक्ति करते थे और घर पर आते हुए साधु-अभ्‍यागतों का प्रेमपूर्वक सत्‍कार करते थे तथा अंदर-ही-अंदर प्रभु प्राप्ति के लिये छटपटाते भी थे। ऐसी दशा में वे भगवत्‍कृपा के सर्वथा योग्‍य थे। उन्‍हें साधु-समागम मिलना ही चाहिये। इसीलिये मानो सार्वभौम का ही उद्धार करने के निमित्त प्रभु वृन्‍दावन न जाकर पुरी पधारे और सबसे पहले सार्वभौम के घर को ही अपनी पद-धूलि से परम पावन बनाया। उन भक्ताग्रगण्‍य सार्वभौम महाशय के चरणों में हमारे कोटि-कोटि नमस्‍कार हैं।

सार्वभौम के निमन्‍त्रण को स्‍वीकार करके प्रभु उनके घर भिक्षा करने के लिये पधारे। सार्वभौम ने उन्‍हें श्रद्धापूर्वक भिक्षा करवायी और उनका संन्‍यासी के योग्‍य सत्‍कार किया। अन्‍त में वात्‍सल्‍यभाव प्रकट करते हुए उन्‍होंने अत्‍यन्‍त ही स्‍नेह के साथ कहा- ‘स्‍वामी जी ! हमारी एक प्रार्थना है, अभी आपकी अवस्‍था बहुत कम है, इस अवस्‍था का वैराग्‍य प्राय: स्‍थायी नहीं होता। अधिकतर इस अवस्‍था वाले त्‍यागियों का कुछ काल में वैराग्‍य मन्‍द ही पड़ जाता है और वैराग्‍य के बिना त्‍याग टिक नहीं सकता। इसीलिये थोड़ी अवस्‍था के अधिकांश साधु अपने धर्म से पतित हो जाते हैं। अतएव आपको निरन्‍तर ऐसे कार्यों में लगे रहना चाहिये, जिनसे संसारी विषयों के प्रति अधिकाधिक वैराग्‍य के भाव उत्‍पन्‍न होते रहें। हमारे वहाँ वेदान्‍तदर्शन के कई पाठ होते हैं, आपकी इच्‍छा हो, तो यहाँ आकर सुना करें। बेकार रहने से मन में बुरे-बुरे विचार उत्‍पन्‍न होते हैं। जो निरन्‍तर शुभ-कर्मों में आत्‍मशुद्धि की इच्‍छा से लगा रहता है, उसके मन में बुरे विचार उठ ही नहीं सकते। इसलिये आप पाठशाला में आकर वेदान्‍तसूत्रों की व्‍याख्‍या सुना करें। यही साधक संन्‍यासियों का परम धर्म हैं।’

सार्वभौम भक्‍त बन गये……

हाथ जोड़े हुए विनीतभाव से महाप्रभु ने कहा- ‘यह मेरा सौभाग्‍य है, जो आप-जैसे गुरुजन स्‍वयं ही मेरे कल्‍याण की बातें सोचा करते हैं। जिसके भले के लिये गुरुजनों के हृदय में चिन्‍ता है, वह कभी पतित हो ही नहीं सकता। मेरी भी इच्‍छा थी कि आपके चरणों में कुछ उपदेश सुनने की प्रार्थना करूँ, किन्‍तु संकोचवश मैं अपने मनोभाव को व्‍यक्‍त नहीं कर सका। आपने मेरे मन की बात बिना कहे ही समझ ली। मैं अवश्‍य ही कल से वेदान्‍तसूत्रों की व्‍याख्‍या सुना करूँगा।

प्रभु की इस बात से सार्वभौम महाशय को बड़ी भारी प्रसन्‍नता हुई। योग्‍य अध्‍यापक को यदि समझदार और अधिकारी छात्र पढ़ने के लिये मिल जाय, तो इससे अधिक प्रसन्‍नता उसे दूसरी किसी भी वस्‍तु से नहीं हो सकती। गुरु का हृदय योग्‍य शिष्‍य की निरन्‍तर खोज करता रहता है और अपने योग्‍य शिष्‍य पाकर वह उसे सर्वस्‍व समर्पण करने के लिये लालायित बना रहता है।

दूसरे दिन से महाप्रभु वेदान्‍तसूत्रों का शारीरकभाष्‍य सुनने लगे। सार्वभौम महाशय बड़े ही उत्‍साह से उल्‍लास के सहित शारिरकभाष्‍य का प्रवचन करने लगे। पाठ पढ़ाते-पढ़ाते आनन्‍द के कारण उनका चेहरा दमकने लगता और वे अपने सम्‍पूर्ण पाण्डित्‍य को प्रदर्शित करते हुए विस्‍तार के सहित पाठ को सुनाते। महाप्रभु चुपचाप एकाग्र दृष्टि से अधोमुख किये हुए पाठ सुनते रहते। बीच में वे एक भी शब्‍द नहीं बोलते। इस प्रकार लगातार सात दिनों तक बराबर वे पाठ सुनते रहे। जब भट्टाचार्य ने देखा, ये तो बोलते ही नहीं, पता नहीं इनकी समझ में यह व्‍याख्‍या आती भी है या नहीं। विषय बहुत ही गूढ़ है, बहुत सम्‍भव है ये उसे न समझ सकते हों। इसीलिये उन्‍होंने पूछा- ‘स्‍वामी जी ! आप तो चुपचाप बैठकर सुनते ही रहते हैं। पाठ अच्‍छा हुआ या बुरा- यह सब आप कुछ नहीं बताते।’

महाप्रभु ने विनीतभाव से कहा- ‘आपने मुझे पाठ सुनने की ही आज्ञा तो दी थी, इसीलिये आपकी आज्ञा को शिरोधार्य करके पाठ सुना करता हूँ।’
कुछ हंसकर प्रेमपूर्वक सार्वभौम भट्टाचार्य ने कहा- ‘सुनने के यह मानी थोड़े ही है कि पत्‍थर की मूर्ति की भाँति मूक बनकर सुनते ही रहना।
क्रमशः

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