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श्री श्री चैतन्य चरितावली
207-
जहाँ जो बात समझ में न आये, उसे फिर से पूछना चाहिये। कोई शंका उत्पन्न हो तो उसे पूछकर उसका समाधान करा लेना चाहिये। पाठ सुनने के मानी हैं उस विषय में नि:शंक हो जाना। पाठ का विषय इस प्रकार हृदयंगम हो जाय कि फिर कोई शंका उठा ही न सके। कहिये, आपकी समझ में तो सब कुछ आता है न ?’
कुछ लज्जितभाव से प्रभु ने कहा- ‘भला, मैं मूर्ख इस गहन विषय को समझ ही क्या सकता हूँ और थोड़ा-बहूत समझ भी लूं तो आपके सामने शंका करने का साहस ही कैसे कर सकता हूँ।’
सरलता के साथ भट्टाचार्य ने कहा- ‘यह बात नहीं, जो समझ में न आवे उसे पूछना चाहिये। संकोच करने से कैसे काम चलेगा?’
प्रभु ने कुछ लज्जा के कारण सिकुड़ते हुए धीरे से कहा- ‘भगवान व्यासदेव का सरल सूत्रों का शब्दार्थ तो बड़ी सुगमता से मेरी समझ में आ जाता है, किन्तु भाष्य सुनते ही सारा मामला गड़बड़ हो जाता है। मुझे ऐसा प्रतीत होने लगता है कि भगवान भाष्यकारों ने अपने एकदेशीय अर्थ के लिये शब्दों की खूब खींचतान की है और जो अर्थ सूत्र में लक्षित हो नहीं होता, उसकी जबरदस्ती ऊपर से आवृत्ति की है।’
महाप्रभु की इस बात को सुनते ही भट्टाचार्य तथा पाठ सुनने वाले सभी विद्यार्थियों के कान खड़े हो गये। वे आश्चर्य की दृष्टि से प्रभु के मुख की ओर निहारने लगे। भट्टाचार्य ने कुछ आश्चर्य करते हुए कहा- ‘आप यह कैसी बात कह रहे हैं। श्रुति का मुख्य प्रतिपाद्य विषय निर्गुण-निराकार अद्वितीय ब्रह्म की सिद्धि करना ही है। शारीरकभाष्य में उसी नाम-रुप से रहित अद्वितीय ब्रह्म का प्रतिपादन किया गया है।’ प्रभु ने धीरे से कहा- ‘मुझे निराकार-निर्गुण रुप का वर्णन स्वीकार है। मैं यह कब कहता हूँ कि श्रुतियों में निराकार ब्रह्म का वर्णन है ही नहीं; किन्तु भाष्यकार ने सगुण-साकार रुप को जो एकदम गौण और उपेक्षणीय ठहरा दिया है इसे मैं नहीं मानता। यह तो एकपक्षीय सिद्धान्त हो गया। भगवान के सगुण-निर्गुण, साकार निराकार दोनों ही रुप मुख्य और आदरणीय हैं। श्रुति जहाँ ‘एकमेवाद्वितीयम’ ‘नेह नानास्ति किंचन’ ‘सर्व खल्विदं ब्रह्म’ आदि कह-कहकर सर्वव्यापी निर्गुण निराकार रुप का वर्णन करती है वहां-
अपाणिपादो जवनो ग्रहीता
पश्यत्यचक्षु: स श्रृणोत्यकर्ण:
स वेत्ति वेद्यं न च तस्यास्ति वेत्ता
तमाहुरग्रयं पुरुषं महान्तम्।।
‘बहु स्याम्’ ‘स ईक्षत’ इत्यादि श्रुतियों में प्रत्यक्ष रीति से भगवान के सगुण-साकार रूप का वर्णन है तथा उनकी दिव्यलीला और कर्मों का भी वर्णन है। उन्हें गौण कहकर छोड़ देना केवल बुद्धि-वैलक्षण्य का ही द्योतक है। मेरी समझ में तो भगवान भाष्यकार ने केवल बुद्धि को तीक्ष्ण करने के अभिप्राय से ही ऐसी व्याख्या की होगी। जो केवल मस्तिष्क-प्रधान है, उनके लिये विचार की पराकाष्ठा की गयी होगी। सचमुच भाष्यकार ने अपनी प्रत्युत्पन्न मति का बड़ा ही अद्भुत परिचय दिया है। जो विचार को ही प्रधान मानते हैं वे इससे अधिक और विचार कर ही नहीं सकते, किन्तु हृदय-प्रधान सरस भावुक भक्तों को इस खींचतानी की व्याख्या से सन्तोष नहीं होने का।’
सार्वभौम भट्टाचार्य ने कहा- ‘भाई ! यह अपने घर की बात थोड़े ही है। भगवान व्यासदेव जी के अभिप्राय को ही भाष्यकार ने स्पष्ट किया हैं, उन्होंने अपनी तरफ से कुछ थोड़े ही कहा है?’
कुछ मुसकराते प्रभु ने कहा- ‘आपके सामने अधिक बोलना ही धृष्टता होगी, किन्तु प्रसंगवश कहना ही पड़ता है। भगवान व्यासदेव के अभिप्राय को ठीक-ठीक इन्होंने ही व्यक्त किया है, इसे हम कैसे कह सकते हैं। इन्हीं सूत्रों का भाष्य भगवान रामानुज ने विशिष्टा द्वैतपरक किया है और भगवान मध्वाचार्य ने शारीरक भाष्य के ठीक प्रतिकुल इन्ही सूत्रों से द्वैतमत का प्रतिपादन किया है। ये सभी-के-सभी पूज्य, मान्य और आदरणीय महापुरुष हैं। इनमें से किसकी बात को झूठ समझें। इसलिये यही कहना पड़ता है कि इन तीनों ने ही अपने-अपने दृष्टिकोण से ठीक ही व्याख्या की है। इन सभी ने किसी एक विषय का प्रतिपादन किया है। इनमें से यही व्याख्या सर्वमान्य हो सकती है, इसे मैं नहीं मानता। ये सभी व्याख्याएँ एकदेशीय हैं। आप ही सोचिये, जिन्होंने छ: शास्त्र और अठारह पुराण तथा पंचम वेद महाभारत को बनाकर भी शान्ति प्राप्त नहीं की और पूर्ण शान्ति लाभ करने के ही निमित्त जिन्होंने सभी वेद-शास्त्रों का सार संग्रह करके श्रीमद्भागवत की रचना की और उसे रचकर ही अनन्त शान्ति प्राप्त की। वे ही भगवान व्यासदेव श्रीमद्भागवत में क्या कहते हैं-
अहो भाग्यमहो भाग्यं नन्दगोपव्रजौकसाम्।
यन्मित्रं परमानन्दं पूर्णं ब्रह्म सनातनम्।
अर्थात ‘व्रज में रहने वाले नन्द आदि ग्वालबालों के भाग्य की सराहना कौन कर सकता है, जिनके मित्र परम आनन्दस्वरूप साक्षात सनातन पूर्ण ब्रह्म हैं।’ इस प्रकार के उद्गारों को व्यक्त करने वाले व्यासदेव इस बात का आग्रह करें कि ‘नहीं, ब्रह्म का निर्गुण-निराकार रूप ही यर्थाथ है, शेष सभी कल्पित और मिथ्या हैं!’ तो यह बात कुछ समझ में नहीं आती। जो श्रीकृष्ण को सनातन पूर्ण ब्रह्म बताकर गाँव के गँवार गोप-ग्वालों के भाग्य की भूरि-भूरि प्रशंसा कर रहे हैं, वे इस प्रकार का हठ करेंगे, यह कुछ विचारणीय विषय है।
कुछ निरुत्तर-से होकर सार्वभौम ने क्षणभर सोचकर कहा- ‘तब तो भगवान शंकर के सारे सिद्धान्त का खण्डन हो जाता है। उन्होंने तो अपने सभी ग्रन्थों में निर्विशेष ब्रह्म का ही भाँति-भाँति से प्रतिपादन किया है और इस नाम-रूपात्मक दृश्य जगत को मिथ्या बताकर अपने-आपको ही ब्रह्म मानने के लिये कहा है।’
प्रभु ने कुछ जल्दी से कहा- ‘इसमें खण्डन-मण्डन की कौन-सी बात है? बुद्धि भी तो भगवद्दत्त ही है। ये सब बुद्धि के चमत्कार हैं। भगवान शंकर ने अद्वैत-सिद्धान्त का प्रतिपादन करके सचमुच विचारों का अन्त ही करके दिखा दिया है! तर्कशक्ति और विचारशक्ति को पराकाष्ठा पर पहुँचा दिया है। जीव ही ब्रह्म है, यह उनके मस्तिष्क सर्वोच्च विचारों का सर्वोत्कृष्ट एक भाव ही है। उसने हृदय से तो पूछिये यथार्थ बात क्या है? जो आयुभर ‘अहं ब्रह्मास्मि’ ‘मैं ब्रह्म हूँ, मैं बह्म हूँ’ इसी सिद्धान्त का प्रचार करते हुए अभेदभाव का प्रचार करते रहे, उन्हीं के मुख से एकान्त में सुरसरि के तीर पर अश्रु बहाते हुए जो उदगार आप-से-आप ही निकल पड़े है, उनकी ओर भी तो ध्यान दीजिये।
क्रमशः
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