cc 208
श्री श्री चैतन्य चरितावली
208-
देखिये, वे कितने करुणस्वर से अश्रु बहाते हुए गदगदकण्ठ से प्रभु के सम्मुख प्रार्थना कर रहे हैं- हैं, उनकी ओर भी तो ध्यान दीजिये।
सत्यपि भेदापगमे नाथ! तदाहं न मामकीनस्त्वम्।
सामुद्रो हि तरग: क्वचन समुद्रो न तारंग:।।
हे नाथ! चाहे तुममें और जगत में भेद न हो, तो भी मेरे स्वामी! मैं तुम्हारा हूँ, तुम मेरे नहीं हो। यद्यपि समुद्र तथा तरंग में भेद न हो तो लोग ‘समुद्र की तरंग’ ऐसा ही कहते है, ‘तरंग का समुद्र’ ऐसा कोई नहीं कहता।’ यह उन महापुरुष का वाक्य हैं, जो जगत को त्रिकाल में भी कुछ नहीं मानते। जिनकी दृष्टि में मैं मेरा तथा जन्म-मृत्यु सब कोरी कल्पना ही हैं, किन्तु ये बातें उनके मस्तिष्क की थीं। यह उनके सरस और निष्कपट शुद्ध हृदय के उदगार हैं। तभी तो भगवान व्यासदेव ने कहा है-
आत्मारामाश्च मुनयो निर्ग्रन्था अप्युरुक्रमे।
कुर्वन्त्यहैतुकीं भक्तिमित्थम्भूतगुणो हरि:।।
प्रभु के मुख से इस बात को सुनकर और अपनी झेंप मिटाने के निमित्त सार्वभौम ने कहा-‘हाँ हाँ, इस श्लोक का आप क्या अर्थ करते हैं, हमें भी तो सुनाइये?’
प्रभु ने अत्यन्त ही दीनता के साथ कहा- ‘भला, मैं आपके सामने श्लोक की व्याख्या करने योग्य हूँ? यह काम तो आपका ही है। आप मुझे ही इसकी व्याख्या करके सुनाइये, जहाँ मेरी समझ में न आवेगी वहाँ पूछ लूंगा।’
अब तक तो सार्वभौम कुछ उत्तर देने में असमर्थ थे, इसलिये वे एकटक- भाव से प्रभु के मुख की ओर देखते हुए उनकी बातें सुन रहे थे। अब उन्हें अपने पाण्डित्य प्रदर्शन करने का कुछ अवसर प्राप्त हुआ। इसलिये बड़े हर्ष के साथ नाना भाँति की शंकाओं को उठाते हुए और शास्त्रीय प्रमाण देते हुए उन्होंने इस एक ही छोटे-से श्लोक की नौ प्रकार से व्याख्या की और पृथक-पृथक नौ भाँति के अर्थ करके बताये। अपनी व्याख्या को समाप्त करते हुए अपने पाण्डित्य की प्रशंसा सुनने के उत्सुकता से वे प्रभु के मुख की ओर निहारने लगे।प्रभु ने उनकी भूरि-भुरि प्रशंसा करते हुए कहा- ‘धन्य है, आपके पाण्डित्य को। मैंने जैसी प्रशंसा सुनी थी, उसका परिचय मैंने यहाँ आकर प्रत्यक्ष ही पा लिया। इतनी पाण्डित्यपूर्ण व्याख्या आप ही कर सकते हैं, दूसरे पण्डित का काम नहीं कि इतनी सरलता से नौ प्रकार के अर्थों को बिना खींचातानी के सरलतापूर्वक कह सके, किन्तु इन नौ अर्थों के अतिरिक्त और भी तो कई प्रकार के इस श्लोक के अर्थ हो सकते हैं।’
अत्यन्त ही आश्चर्य प्रकट करते हुए सम्भ्रम के साथ भट्टाचार्य सार्वभौम कहने लगे- ‘क्या कहा, मेरे अर्थों के सिवा और भी इसके अर्थ हो सकते हैं? यदि आप कर सकते हों तो सुनाइये।’
प्रभु ने बड़ी ही सरलता के साथ विनीत स्वर में कहा- ‘मैं क्या कर सकता हूँ। ऐसे ही आप गुरुजनों के मुख से मैंने इसकी कुछ थोड़ी-बहुत व्याख्या सुनी है, उसमें से जो कुछ थोड़ी-बहुत याद हैं, उसे आपकी आज्ञा से सुनाता हूँ।’ यह कहकर महाप्रभु ने अठारह प्रकार से इस श्लोक की व्याख्या की।
महाप्रभु के मुख से इस प्रकारकी पाण्डित्यपूर्ण व्याख्या सुनकर सार्वभौम भट्टाचार्य के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। वे अपने आपे को भूल गये और जिस प्रकार स्वप्न में कोई अद्भुत घटना को देखकर आश्चर्य के सहित उसकी ओर देखता रहता है, उसी प्रकार वे प्रभु की ओर देखते रहे! अब उन्हें प्रभु की महिमा का पता चला, अब उनके हृदय में छिपी हुई भक्ति जाग्रत हुई। मानो इस श्लोक की व्याख्या ने ही इनकी अव्यक्त भक्ति को व्यक्त बना दिया। वे अपने पद, मान, प्रतिष्ठा और सम्मान आदि के अभिमान को भुलाकर एक छोटे बालक की भाँति सरलतापूर्वक प्रभु के पादपह्यों में गिर पड़े। उन्होंने अपने हाथों की लाल रंगवाली मोटी-मोटी उंगलियों से प्रभु के दोनों अरुण चरण पकड़ लिये और रोते-रोते ‘पाहि माम्’ ‘रक्ष माम्’ कहकर स्तुति करने लगे-
संसारकूपे पतितो ह्यगाधे
मोहान्धपूर्णे विषयातिसक्त:।
करावलम्बं मम देहि नाथ
गोविन्द दामोदर माधवेति।।
इस संसाररूपी अगाध समुद्र में डूबते हुए विषयासक्त मुझ अधम को अपने हाथों का सहारा देकर हे नाथ! आप उबार लीजिये। हे गोविन्द! हे माधव!!! मैं आपकी शरण हूँ।
इस प्रकार वे प्रभु की भाँति-भाँति से स्तुति करने लगे। उसी समय उन्हें प्रभु के शरीर में अद्भुत षडभुजी मूर्ति के दर्शन हुए। उन दर्शनों से उनके सभी पुराने पाप क्षय हो गये और वे घोर तार्किक पण्डित से आज परम भावगत वैष्णव बन गये।
प्रभु ने उन्हें प्रेमपूर्वक उठाकर आलिंगन किया। प्रभु का आलिंगन पाते ही वे फिर मूर्च्छित होकर गिर पड़े। बहुत देर तक यह करुणापूर्ण दृश्य ज्यों-का-त्यों बना रहा। सभी विद्यार्थी महान आश्चर्य और कुतूहल के सहित इस दृश्य को देखते रहे।
अविश्वास का मुख्य कारण है अप्रेम। जहाँ प्रेम नहीं वहाँ विश्वास भी नहीं और जहाँ प्रेम है वहीं विश्वास भी है। अद्वैतवेदान्त के अनुसार इस सम्पूर्ण दृश्य जगत का अस्तित्व हमारे मन के विश्वास पर ही है। जिस समय हमारे मन से इस जगत की सत्यता पर से विश्वास उठ जायगा, उस दिन यह जगत रहेगा ही नहीं। इसीलिये वेदान्ती कहते हैं,’तुम इस बात का विश्वास करो कि ‘सोऽहम्’ ‘चिदानन्दरुप शिवोऽहं शिवोऽहम्’ अर्थात ‘मैं वही हूं’ मैं चिदानन्दरूपी शिव ही हूँ।’
हमारी वृत्ति बहिर्मुखी है, क्योंकि हमारी इन्द्रियों के द्वार बाहर की ओर हैं, इसलिये हम बाहरी वस्तुओं पर तो विश्वास करते हैं, किन्तु उनमें जो भीतर छिपा हुआ रहस्य है, उसे हम नहीं समझ सकते। जिसने उस भीतर छिपे हुए रहस्य को समझ लिया वह सचमुच में सब बन्धनों से मुक्त हो गया। भगवान के प्रसाद के बहाने से कितने लोग अपनी विषय-वासनाओं को पूर्ण करते हैं। नामका आश्रय ग्रहण करके लोग इस प्रकार के पापकर्मों में प्रवृत्त होते हैं। वास्तव में उन्हें प्रसाद का और भगवन्नाम का माहात्म्य नहीं मालूम है, तभी तो वे चमकते हुए काँच के बदले में हीरा दे देते हैं। जो भगवन्नाम सभी प्रकार के पापों को नष्ट करने में समर्थ है, उसे सोने-चांदी कके ठिकराओं के ऊपर बेचने वालों के हाथ में वे ठिकरा ही रह जाते हैं। भगवन्नाम के असली सुस्वादु मधुरातिमधुर फल से वे लोग वंचित रह जाते हैं। विश्वास ने जिसने एक बार महाप्रसाद पा लिया, फिर उसकी जिह्वा खट्टे-मीठे के भेदभाव को भूल जायगी।
क्रमशः
Comments
Post a Comment