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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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जिसने श्रद्धा-विश्वास के सहित एक बार भगवन्नाम का उच्चारण कर लिया, फिर उसे संसारी किसी पदार्थ की वांछा नहीं रह सकती। एक बड़े भारी महात्मा ने हमें एक कहानी सुनायी थी- एक सरलहृदया स्त्री थी। उसने कभी भी भगवान का नाम नहीं लिया; किन्तु जीवन में कभी कोई खोटा काम भी नहीं किया। उसके द्वारा किसी भी प्राणी को कष्ट नहीं होता था। एक दिन उसने एक बड़े भारी भक्त के मुख से यह श्लोक को सुना-
एकोऽपि कृष्णस्य कृत: प्रणामो
दशाश्वमेधावभृथेन तुल्य:।
दशाश्वमेधी पुनरेति जन्म
कृष्णप्रणामी न पुनर्भवाय।।
अर्थात जिसने एक बार भी कृष्ण के पादपह्यों में श्रद्धा-भक्ति के सहित प्रणाम कर लिया उसे उतना ही फल हो जाता है जितना कि दस अश्वमेधादि यज्ञ करने वाले पुरुष को होता है। किन्तु इन दोनों के फल में एक बड़ा भारी वेद होता है।
सार्वभौम का भगवत-प्रसाद में विश्वास……….
अश्वमेध यज्ञ करने वाला तो लौटकर फिर संसार में आता है, किन्तु श्रीकृष्ण को श्रद्धासहित प्रणाम करने वाला फिर संसार-चक्र में नहीं घूमता। वह तो इस चक्र से मुक्त होकर निरन्तर प्रभु के पादपद्मों में लोट लगाता रहता है। इस श्लोक के भाव को सुनते ही वह सरल हृदया नारी विकल हो उठी। उसके सम्पूर्ण शरीर में रोमांच हो गया। आँखों से अश्रुओं की धारा बहने लगी। गद्गद कण्ठ से लड़खड़ाती हुई वाणी में उसने बड़े ही पश्चात्ताप के स्वर में कहा- ‘हाय ! मैंने अभी तक एक दिन भी भगवान के चरण-कमलों में प्रणाम नहीं किया।’ इतना कहकर ज्यों-ही वह प्रणाम करने को बढ़ी त्यों ही इस नश्वर शरीर को परित्याग करके श्रीहरि के अनन्त धाम के लिये चली गयी। इसका नाम श्रद्धा या विश्वास है। ऐसे ही विश्वास से प्रभु के पादपह्यों की प्राप्ति हो सकती है। इसीलिये कबीरदास जी कहा है-
गाया तिन पाया नहीं, अनगाये ते दूर।
जिन गाया बिस्वास गहि, तिनके सदा हुजूर।।
सार्वभौम भट्टाचार्य को प्रभु के पादपद्मों में पूर्ण श्रद्धा हो गयी थी। शास्त्र का वचन है कि हृदय में भगवान की भक्ति उत्पन्न होने से सभी सद्गुण अपने-आप ही बिना बुलाये हृदय में आकर निवास करने लगते हैं। सद्गुण तो भगवत-भक्ति की छाया है। छाया शरीर को छोड़कर दूसरी जगह रह नहीं सकती। किसी एक में विश्वास होने पर सभी सत्कर्मों में स्वत: ही श्रद्धा हो सकती है।
एक दिन महाप्रभु अरुणोदय के समय श्रीजगन्नाथ जी के शयनोत्थान के दर्शन के लिये गये। प्रभु के दर्शन कर लेने पर पुजारी ने उन्हें प्रसादी माला और प्रसादी अन्न दिया। प्रभु ने बड़े आदर के सहित उस महाप्रसाद को दोनों हाथ फैलाकर ग्रहण किया और अपने वस्त्र में बाँधकर वे सार्वभौम भट्टाचार्य के घर की ओर चले।प्रभु बिना सूचना दिये ही भीतर चले गये। सार्वभौम उसी समय निद्रा से जगकर भगवन्नामों का उच्चारण करते हुए शय्यापर से उठने ही वाले थे कि तब तक महाप्रभु पहुँच गये। प्रभु को देखते ही सार्वभौम अस्त-व्यस्त भाव से जल्दी-जल्दी शय्या पर से उठे और प्रभु के चरण-कमलों में साष्टांग प्रणाम किया तथा उन्हें बैठने के लिये सुन्दर आसन दिया। आसन पर बैठते ही प्रभु ने अपने वस्त्रों में से भगवान का प्रसाद खोलकर सार्वभौम को दिया। महाप्रभु आज कृपा करके अपने हाथ से महाप्रसाद दे रहे हैं, यह सोचकर सार्वभौम की प्रसन्नता का ठिकाना नहीं रहा। उन्होंने दीन-हीन अभ्यागत की भाँति उस महाप्रसाद को ग्रहण किया और हाथ पर आते ही बिना शौचादि से निवृत होकर वैसे ही बासी मुख से वे प्रसाद को पाने लगे।इस प्रकार सार्वभौम को विश्वास के साथ आनन्दपूर्वक प्रसाद पाते देखकर महाप्रभु के आनन्द की सीमा नहीं रही। वे भट्टाचार्य सार्वभौम का हाथ पकड़ कर नृत्य करने लगे। भट्टाचार्य महाशय भी बेसुध होकर प्रभु के साथ पागल की भाँति नाच रहे थे। सार्वभौम की स्त्री तथा उनके शिष्य और पुत्र इस अपूर्व दृश्य को देखकर इसका कुछ भी कारण न समझ सके। महाप्रभु बार-बार सार्वभौम का आलिंगन करते और गदगदकण्ठ से बार-बार कहते- ‘आज सार्वभौम कृतार्थ हो गये, आज वासुदेव सार्वभौम को भगवान वासुदेव ने अपनी शरण में ले लिया। आज भट्टाचार्य महाशय के सभी संसारी बन्धन छिन्न-भिन्न हो गये। आज मुझे सार्वभौम ने खरीद लिया। इतने भारी शास्त्रज्ञ और शौचाचार को जानने वाले सार्वभौम महाशय का जब महाप्रसाद के प्रति इतना अधिक दृढ़ विश्वास हो गया, तो मैं समझता हूँ, इनसे बढ़कर संसार में कोई दूसरा भक्त होगा ही नहीं।
भट्टाचार्य महोदय ने आज मुझे कृतकृत्य कर दिया। आज मेरा पुरी में आना सफल हो गया।’ प्रभु के मुख से ऐसी बातें सुनकर भट्टाचार्य सार्वभौम कुछ लज्जित-से हुए और बार-बार प्रभु के चरणों की धूलि को अपने सम्पूर्ण शरीर पर मलते हुए कहने लगे- ‘यह सब प्रभु के चरणों की कृपा है। मुझ अधम के ऊपर कृपा करके ही आपने संसार-सागर में डूबते हुए को हाथ पकड़कर उबारा हैं। अब तो मैं आपका दासानुदास हूँ, जब जैसी भी आज्ञा होगी, उसी का पालन करूँगा।’ भट्टाचार्य के मुख से ऐसी बात सुनकर प्रभु कुछ लज्जा का भाव प्रदर्शित करते हुए वहाँ से चले गये। जब गोपीनाथाचार्य ने यह समाचार सुना तब तो वे बड़े प्रसन्न हुए।
शाम को भट्टाचार्य सार्वभौम प्रभु के दर्शन के लिये आये। उसी समय गोपीनाथाचार्य भी वहाँ आ पहुँचे।
प्रभु को प्रणाम करके मुसकराते हुए गोपीनाथाचार्य ने कहा- ‘कहो भट्टाचार्य महाशय! हमारी बात ठीक निकली न? अब बोलो, भागकर कहाँ जाओगे?’
पृथ्वी में सिर टेककर और गोपीनाथाचार्य को प्रणाम करते हुए सार्वभौम ने कहा- ‘यह सब आपके चरणों की कृपा है, नहीं तो मुझ-जैसे संसारी मनुष्य के ऊपर प्रभु कृपा कब कर सकते हैं? आपके ही अनुग्रह से मुझे प्रभु के चरण-कमलों की प्राप्ति हो सकी है।’ इस प्रकार शिष्टाचार की बहुत-सी बातें होने पर सार्वभौम अपने घर को चले आये।
सार्वभौम का भक्तिभाव….
एक दिन भट्टाचार्य महाशय महाप्रभु के वासस्थान पर प्रभु के दर्शन के निमित्त गये। प्रभु ने बड़े ही प्रेम से उन्हें बैठने के लिये आसन दिया। महाप्रभु की आज्ञा से आसन पर बैठने के अनन्तर हाथ जोड़े हुए सार्वभौम ने कहा- ‘प्रभो ! एक बात का स्मरण करके मुझे अपने ऊपर बड़ी भारी ग्लानि हो रही है। मैंने अपने शास्त्रीय ज्ञान के अभिमान में आपको साधारण संन्यासी समझा।
क्रमशः
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