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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
210-

मैने आपको उपदेश देने का मिथ्‍या अभिमान किया था, इससे मुझे बड़ा दु:ख हो रहा है, आचार्य गोपीनाथ जी के साथ आपकी कड़ी आलोचना भी की थी, इसलिये अब अपने उन पुराने कृत्‍यों पर बड़ी लज्‍जा आ रही है।’

महाप्रभु ने अत्‍यन्‍त ही स्‍नेह प्रदर्शित करते हुए कहा- ‘आचार्य ! यह आप कैसी भूली-भूली सी बातें कर रहे हैं? हाल तो जहाँ तक मैं समझता हूँ, आपने मेरे सम्‍बन्‍ध न तो कोई अनुचित बात ही कही और न कभी अशिष्‍ट व्‍यवहार ही किया। आप जैसे श्रद्धालु, शास्त्रज्ञ विद्वान से कोई भी इस प्रकार के व्यवहार की आशा नहीं कर सकता। थोड़ी देर के लिये मान भी लें कि आपने कोई अनुचित बर्ताव किया भी तो वह तभी तक था, जब तक कि मेरा आपका प्रगाढ़ प्रेम-सम्‍बन्‍ध नहीं हुआ था। प्रेम-सम्‍बन्‍ध हो जाने पर तो पुरानी सभी बातें भुला दी जाती हैं। प्रेम होने पर तो एक प्रकार के नूतन जीवन का आरम्‍भ होता है, जिस प्रकार जन्‍म होने पर पिछले सभी जन्‍मों की बातें भूल जाती हैं, उसी प्रकार प्रेम हो जाने पर तो पिछली बातों का ध्‍यान ही नहीं रहता। प्रेम में लज्‍जा, भय, संकोच, शिष्‍टाचार, क्षमा, अपराध आदि द्वैधी भाव को प्रकट करने वाली वृत्तियाँ रहती ही नहीं। वहाँ तो नित्‍य नूतन रस का आस्‍वादन करते रहना ही शेष रह जाता है। क्‍यों ठीक है न ?’ सार्वभौम ने इसका कुछ भी उत्तर नहीं दिया। वे क्षणभर चुपचाप ही बैठे रहे। थोड़ी देर के अनन्‍तर उन्‍होंने पूछा- ‘प्रभो ! भगवान के चरण-कमलों में अहैतु की अनन्‍यभक्ति उत्‍पन्‍न हो सके, ऐसा सर्वोत्तम साधन कौन सा है?’

महाप्रभु ने कहा- ‘सबके लिये एक ही रोग में एक ही औषधि नहीं दी जाती। बुद्धिमान वैद्य प्रकृति देखकर औषधि तथा अनुपान में आवश्‍यकतानुसार परिवर्तन कर देता है। भोजन से शरीर को पुष्टि, चित्त की तुष्टि और क्षुधा की निवृत्ति- ये तीनों काम होते हैं, किंतु पुष्टि और क्षुधा-निवृत्ति के लिये एक सा ही भोजन सबको नहीं दिया जाता। जिसे जो अनुकूल पड़े उसी का सेवन करना उसके लिये लाभप्रद है। शास्‍त्रों में भगवत-प्राप्ति के अनेक साधन तथा उपाय बताये हैं, किंतु इस कलिकाल में तो हरि-नाम स्‍मरण के अतिरिक्‍त कोई भी दूसरा साधन सुगमतापूर्वक नहीं हो सकता। वर्तमान समय में तो भगवन्‍नाम ही सर्वोत्तम साधन है।’
सार्वभौम ने पूछा- ‘प्रभो! भगवन्‍नाम स्‍मरण की प्रक्रिया क्‍या है?’

प्रभु ने कहा- ‘प्रक्रिया क्‍या? भगवन्‍नाम की कुछ ऐसी प्रक्रिया नहीं। जब भी समय मिले, जहाँ भी हो, जिस दशा में भी हो, भगवन्‍नामों का मुख से उच्‍चारण करते रहना चाहिये। भगवन्‍नाम का नियत संख्‍या में जप करो, जो भी अपने को अत्‍यन्‍त प्रिय हो ऐसे भगवान के रुप का ध्‍यान करो, भगवन्‍नामों का संकीर्तन करो, भगवान के गुणानुवादों का गायन करो, भगवान की परस्‍पर में कथन और श्रवण करो, सारांश यह है कि जिस-किसी भाँति भी हो सके अपने शरीर, प्राण, मन तथा इन्द्रियों को भगवत्‍परायण ही बनाये रखने की चेष्‍टा करो।

सार्वभौम ने पूछा-‘प्रभो ! ध्‍यान कैसे किया जाय?’

प्रभु ने कहा- ‘अपनी वृत्ति को बाहरी विषयों की ओर मत जाने दो। काम करते-करते जब भी भगवान का रूप हमारी दृष्टि से ओझल हो जाय तो ऊर्ध्‍व दृष्टि करके (आँखों की पतलियों को ऊपर चढ़ाकर) उस मनमोहिनी मूर्ति का ध्‍यान कर लेना चाहिये।’

इस प्रकार भगवन्‍नाम के सम्‍बन्‍ध में और भी बहुत-सी बातें होती रहीं। अन्‍त में जगदानन्‍द और दामोदर पण्डित को साथ लेकर सार्वभौम अपने घर चले गये। घर जाकर उन्‍होंने जगन्‍नाथ जी के प्रसाद के भाँति-भाँति के बहुत से सुन्‍दर-सुन्‍दर पदार्थ सजाकर इन दोनों पण्डितों के हाथों प्रभु के लिये भेजे और साथ ही अपनी श्रद्धांजलिस्‍वरूप नीचे के दो श्‍लोक भी बनाकर प्रभु की सेवा में समर्पित करने के लिये दिये। वे श्‍लोक ये हैं-

वैराग्‍यविद्यानिजभक्तियोग
शिक्षार्थमेक: पुरुष: पुराण: 
श्रीकृष्‍णचैतन्‍यशरीरधारी
कृपाम्‍बुधिर्यस्‍तमहं प्रपद्ये।
कालान्‍नष्‍टं भक्तियोगं निजं य:
प्रादुष्‍कर्तुं कृष्‍णचैतन्‍यनामा
आविर्भतस्‍तस्‍य पादारविन्‍दे
गाढं गाढं लीयतां चित्तभृंग:।

जगदानन्‍द और दामोदर पण्डित प्रभु के स्‍वभाव से पूर्णतः परिचित थे। वे जानते थे कि महाप्रभु अपनी प्रशंसा सुन ही नहीं सकते। प्रशंसा सुनकर प्रसन्‍नता प्रकट करना तो दूर रहा उलटे वे प्रशंसा करने वाले पर नाराज होते हैं, इसलिये उन्‍होंने इन दोनों सुन्‍दर श्‍लोकों को बाहर दीवाल पर पहले लिख लिया। तब जाकर भोजन सामग्री के सहित वह पत्र प्रभु के हाथ में दिया। प्रभु ने उसे पढ़ते ही एकदम टुकड़े-टुकड़े करके बाहर फेंक दिया। किंतु भक्‍तों ने तो पहले से ही उन्‍हें लिख रखा था। उसी समय मुकुन्‍द उन्‍हें कण्‍ठस्‍थ करके बड़े ही सुन्‍दर स्‍वर से गाने लगे। सभी भक्‍तों को बड़ा आनन्‍द रहा। थोड़े ही दिनों में ये श्‍लोक सभी गौरभक्‍तों की वाणी के बहुमूल्‍य भूषण बन गये।
एक दिन सार्वभौम प्रभु के समीप बैठकर कुछ भक्ति विषयक बातें कर रहे थे। बातों ही बातों में सार्वभौम श्रीमद्भागवत के इस श्‍लोक को पढ़ने लगे-

तत्तेऽनुकम्‍पां सुसमीक्षमाणो
भुंजान एवात्‍मकृतं विपाकम्।
ह्रद्वाग्‍वपुर्भिर्विदधन्‍नमस्‍ते
जीवेत यो मुक्तिपदे स दायभाक्।

सार्वभौम भट्टाचार्य ने इस श्‍लोक के अन्तिम चरण में मुक्ति स्थान में ‘भक्ति’ पाठ पढ़कर यह अर्थ किया कि वह भक्ति का अधिकारी होता है।

महाप्रभु ने हंसते हुए कहा- ‘भट्टाचार्य महाशय ! आपको अपने मनोऽनुकूल अर्थ करने में भगवान व्‍यासदेव के इस श्‍लोक में पाठ-परिवर्तन करने की आवश्‍यकता न पड़ेगी। आप समझते होंगे, इस श्‍लोक से मुक्ति को ही सर्वश्रेष्‍ठता प्राप्‍त हो जाती है।’ यह बात नहीं है। भगवान व्‍यासदेव स्‍वयं ही भगवत-पादसेवन को मुक्ति भी बढ़कर बताते हैं। जैसा कि इस श्‍लोक में कहा है-

सालोक्‍यसार्ष्टिसामीप्‍यसारूप्‍यैकत्‍वमप्‍युत
दीयमानं न गृह्णन्ति विना मत्‍सेवनं जना:।

यानि भक्‍त तो भगवत-सेवा के सामने मुक्ति तक की उपेक्षा कर देते हैं। इस सिद्धान्‍त का प्रतिपादन करने वाले भगवान व्‍यासदेव समस्‍त साधकों को स्थिति का नाम ‘मुक्ति’ कैसे कथन कर सकते हैं।
इस श्‍लोक में ‘मुक्तिपद’ ऐसा पाठ है। इसका अर्थ हुआ ‘मुक्ति पदे यस्‍य स मुक्तिपद:’ अर्थात मुक्ति है पैर में श्रीकृष्‍ण भगवान को प्राप्‍त होता है। अर्थात मुक्ति है पूर्वपद में जिनके ऐसे नवें पदार्थ से आगे दसवें पदार्थ अर्थात श्रीकृष्‍ण को प्राप्‍त होता है।
श्रीमद्भागवत में दस पदार्थों का वर्णन है जैसा कि निम्‍न श्‍लोकों में वर्णन है-

अत्र सर्गो विसर्गश्‍च स्‍थानं पोषणमूतय:।
मन्‍वन्‍तरेशानुकथा निरोधो मुक्तिराश्रय:।
दशमस्‍य विशुद्ध्‍यर्थं नवानामिह लक्षणम्।
वर्णयन्ति महात्‍मान: श्रुतेनार्थेन चांजसा।
क्रमशः

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