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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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अर्थात श्रीमद्भागवत में सर्ग-विसर्ग, स्थिति, पोषण, ऊति, मन्वन्तर, ईश-कथा, निरोध, मुक्ति और आश्रय- इन दसों का वर्णन हैं। इनमें दसवां विषय जो सबके आश्रयस्वरूप श्रीकृष्ण हैं उन्हीं के तत्त्वज्ञान के निमित्त महात्मा पुरुष यहाँ इन सर्गादि नौ लक्षणों का स्वरूप वर्णन करते हैं। जिनमें श्रुति के द्वारा स्तुति आदि से प्रत्यक्ष वर्णन करते हैं और भाँति-भाँति के आख्यान कहकर अन्त में तात्पर्यरूप से भी उसी का वर्णन करते हैं। सारांश यही कि चाहे तो देवता आदि के द्वारा तू ही सबका आश्रय है, यह कहकर उनका वर्णन किया हो या अम्बरीष आदि की कथा कहकर अन्त में यह तात्पर्य निकालो कि बिना भगवत-शरण प्राप्त किये कल्याण नहीं। कैसे भी कहा जाय। सर्वत्र उसी दसवें ‘आश्रयभूत’ श्रीकृष्ण के चरणों में प्रीति होने के ही निमित्त श्रीमद्भागवत की रचना हुई है। इसलिये ‘मुक्तिपद’ वे ही श्रीकृष्णभगवान हो सकते हैं। यहाँ सार्ष्टि, सामीप्यादि मुक्ति से तात्पर्य नहीं है।’
सार्वभौम ने कहा- ‘प्रभो ! मुझे तो आपकी इस व्याख्या से सन्तोष हो गया और यही यहाँ मुक्तिपद शब्द का भाव होगा किंतु सब लोग तो प्रचलित अर्थ में ही मुक्तिपद का अर्थ करेंगे। इसलिये मुझे भक्ति पाठ ही सुन्दर प्रतीत होता है।’
प्रभु ने हंसकर कहा- ‘यह तो मैंने वैसे ही वाग्विनोद के निमित्त पदों की खींचा-तानी करके ऐसा अर्थ किया है। वास्तव में तो मुक्तिपद का अर्थ संसारी सभी बन्धनों से मुक्त होना ही है। संसार के बन्धनों से मुक्त होने पर प्रभुपद के अतिरिक्त उसे दूसरा कोई आश्रय ही नहीं। बन्धन छूटना चाहिये फिर चाहे उसी के बनकर उसके पादपद्मों में लोट लगाते रहो या उसी में घुल-मिल जाओ। सब एक ही बात है। उनके चरणों का आश्रय पकड़ना ही मुख्य है। इस प्रकार की शब्दों की खींचा-तानी में क्या रखा है? ऐसी खींचा तानी तो पक्षपाती पुरुष अपने पक्ष को सिद्ध करने के निमित्त किया करते हैं। जिसे श्रीकृष्ण के चरणों से ही प्रेम करना है उसे पक्षपात से क्या प्रयोजन?’
प्रभु के ऐसे उपदेश को सुनकर सार्वभौमभट्टाचार्य को बड़ी शान्ति हुई और वे प्रभु को प्रणाम करके अपने घर को चले गये।
दक्षिण यात्रा का विचार….
सचमुच महापुरुषों का स्वभाव बड़ा ही विलक्षण होता है। इनके अभी काम, सभी चेष्टाएँ, सभी व्यवहार लोकोत्तर ही होते हैं। इनमें सभी वैषम्य गुणों का समावेश पाया जाता है। इनका हृदय अत्यन्त ही प्रेममय होता है। एक बार जिसके ऊपर इनकी कृपा हो गयी, जिसने एक क्षण को भी इनकी प्रसन्नता प्राप्त कर ली, बस, समझो कि सम्पूर्ण जीवनपर्यन्त उसके लिये इन महापुरुषों के हृदय में स्थान हो गया। इनका प्रणय स्थायी होता है और कभी किसी पर दैववशात इन्हें क्रोध भी आ गया तो वह पानी की लकीर के समान होता है, जिस समय आया उसी समय नष्ट हो गया। इतने पर भी ये अपने जीवन को संग से रहित बनाये रहते हैं और त्याग की मात्रा इनमें इतनी अधिक होती है प्यारे से प्यारे को भी क्षण भर में शरीर से परित्याग कर सकते हैं।
इन्हीं सब बातों को तो देखकर महाकवि भवभूति ने कहा है- ‘वज्रादपि कठोराणि मृदूनि कुसुमादपि’ अर्थात ये पुष्प से भी अधिक मुलायम होते हैं, भक्तों की तनिक-सी प्रार्थना पर पिघल जाते हैं और समय पड़ने पर कठोर भी इतने हो जाते हैं कि वज्र भी इनके सामने अपनी कठोरता में कम ठहरता है। ऐसे महापुरुषों का जो अनुकरण करना चाहते हैं, उनकी पीछे दौड़ना चाहते हैं, उनके व्यवहारों की नकल करना चाहते हैं, वे पुरुष धन्यवाद के पात्र तो अवश्य हैं, किन्तु ऐसे विरले ही होते हैं। इन स्वेच्छाचारी स्वच्छन्दगति महानुभावों का अनुकरण या अनुसरण करना हंसी-खेल नहीं है। ये अपने निश्चय के सामने किसी के आग्रह की, किसी की अनुनय-विनय की; किसी की प्रार्थना की परवा ही नहीं करते। जो निश्चय हो चुका सो चुका। साधारण लोगों के स्वभाव में और महापुरुषों के स्वभाव में यही तो अन्तर है, ये ही तो उनकी महानता है। इसी से तो वे जगत-वन्द्य बन सकते हैं।
महाप्रभु का हृदय जितना ही कोमलातिकोमल और प्रेमपूर्ण था उनका निश्चय उतना ही अधिक दृढ़, अटल और असन्दिग्ध होता था। वे अपने सत्यसंकल्प के सामने किसी की परवा नहीं करते थे। माघ मास के शुक्लपक्ष में कटवा से संन्यास-दीक्षा लेकर महाप्रभु श्रीअद्वैताचार्य के घर शान्तिपुर में आये थे। वहाँ आठ या दस दिन रह कर फिर आपने पुरी के लिये प्रस्थान किया और मार्ग के सभी पुण्य-तीर्थों को पावन बनाते हुए फाल्गुन मास में श्रीनीलाचल में पहुँचे।वहाँ पर फाल्गुन और चैत्र मास में सार्वभौम भट्टाचार्य की मौसी के घर में भक्तों के सहित प्रभु ने निवास किया। उस समय तक पुरी में प्रभु की इतनी अधिक ख्याति कैसे नहीं हुई थी। नीलाचल बड़ा तीर्थक्षेत्र है, नित्यप्रति सैकड़ों साधु महात्मा वहाँ आते जाते रहते हैं, वहाँ कौन किसकी परवाह करता है। जब सार्वभौम भट्टाचार्य जैसे प्रकाण्ड पण्डित प्रभु के पादपद्मों के शरणापन्न हुए तब तो लोगों का झुकाव कुछ कुछ प्रभु की ओर हुआ। वे परस्पर एक दूसरे से प्रभु के सम्बन्ध में आलोचना प्रत्यालोचना करने लगे। संसारी लोगों का स्वभाव होता है कि वे जहाँ तक हो सकता है किसी को बढ़ने नहीं देते, उसकी निन्दा करके, उसे चिढ़ा के अथवा संसारी प्रलोभन देकर शक्तिभर नीचे ही गिराने का प्रयत्न करते हैं। वे जब तक पूर्णरीत्या विवश नहीं हो जाते तब तक किसी की मान प्रतिष्ठा अथवा पूजा अर्चा नहीं करते।
जब उसके असह्य तेज को सहने करने में असमर्थ हो जाते हैं तो अन्त में उन्हें उसकी प्रतिष्ठा करने के लिये विवश हो जाना पड़ता है और फिर वे उसकी पूजा-प्रतिष्ठा और प्रशंसा किये बिना रह ही नहीं सकते। महाप्रभु जनसंसद से पृथक एकान्त में, बिना किसी प्रदर्शन के गोप्य भाव से भक्तों के सहित रहते थे किन्तु कूड़े के अंदर छिपी हुई अग्नि कब तक अप्रकट रह सकती है? धीरे धीरे लोग महाप्रभु के दर्शनों के लिये आने लगे। तभी महाप्रभु ने दक्षिण देश के तीर्थों में परिभ्रमण करने का विचार किया। उनकी इच्छा थी कि संन्यासी के धर्म के अनुसार हमें कुछ काल तक देश विदेशों में भ्रमण करना चाहिये। यही प्राचीन ऋषि महर्षियों का सनातन आचार है। यह सोचकर प्रभु ने अपनी इच्छा भक्तों पर प्रकट की।
क्रमशः
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