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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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सभी प्रभु के इस निश्चय को सुनकर अवाक रह गये। उनमें से नित्यानन्द जी बोल उठे- ‘प्रभो ! आप तो निश्चय करके आये थे कि हम नीलाचल में ही रहेंगे।सभी भक्तों को भी आप इसी प्रकार का आश्वासन दे आये थे, किन्तु अब आप यह कैसी बातें कर रहे हैं? आपके सभी कार्य अलौकिक होते हैं। आप क्या करना चाहते हैं, इसे कोई नहीं जान सकता। आपके मनोगत भावों को समझ लेना मानवीय बुद्धि के परे की बात है। आप सर्वसमर्थ हैं, जो चाहें सो करें, किन्तु पुरी जैसे परम पावन क्षेत्र को परित्याग करके आप दक्षिण की ओर क्यों जाना चाहते हैं?’
महाप्रभु ने कुछ सोचकर कहा- ‘हमारे ज्येष्ठ बन्धु महामहिम विश्वरूप जी दक्षिण देश की ही ओर गये थे, मैं उधर जाकर उनकी खोज करूँगा। संन्यास लेकर उनकी खोज करना मेरा सर्वप्रधान कर्तव्य है।’
कुछ दु:ख की सूखी हंसी हंसते हुए दामोदर पण्डित ने कहा- ‘भाई को खोजने के लिये जा रहे हैं, इसे तो हम खूब जानते हैं, यह तो आपका बहानामात्र है। यथार्थ बात तो कुछ और ही हैं। मालूम होता है, दक्षिण देश को पावन करने की इच्छा है सो हम मना थोड़े ही करते हैं और मना करें भी तो आप स्वतन्त्र ईश्वर हैं, किसी की मानेंगे थोड़े ही।’
दामोदर पण्डित की बात ठीक ही थी। महाप्रभु के अग्रज विश्वरूप ने संन्यास ग्रहण करने के दो वर्ष बाद पूना के पास पण्ढरपुर में इस शरीर को त्याग दिया था, यह बात भक्तों को विदित थी। प्रसिद्ध पदकर्ता वासुदेव घोष उस समय वहीं पण्ढरपुर में ही उपस्थित थे। उन्होंने भक्तों को आकर यह समाचार सुनाया भी था। महाप्रभु ने आज तक यह समाचार न सुना हो, यह सम्भव नहीं। कुछ भी हो विश्वरूप के ढूंढ़ने को उपलक्ष्य बनाकर वे दक्षिण देश को अपनी पदधूलि से पावन करना चाहते थे, इसीलिये उन्होंने ऐसा निश्चय किया।
नित्यानन्द जी ने कुछ रुंधे हुए कण्ठ से कहा- ‘प्रभो। हम आपकी इच्छा के विरुद्ध कोई भी कार्य नहीं कर सकते। किन्तु हमारी यही प्रार्थना है कि हम लोगों को अपने साथ ही ले चलें। हमारा परित्याग न करें।’ प्रभु ने गम्भीरतापूर्वक कहा- ‘मेरे साथ कोई नहीं चल सकता। मैं भीड़ भाड़ के साथ यात्रा में न जा सकूँगा। अकेले ही तीर्थ भ्रमण करूँगा।’
अत्यन्त ही दीनभाव से नित्यानन्द जी ने कहा- ‘प्रभो ! हम आपके किसी कार्य में हस्तक्षेप नहीं करते। हमारे साथ रहने से आपको क्या असुविधा हो सकती है? यदि सबको साथ ले चलना आप उचित न समझते हों। तो मुझे तो साथ लेते ही चलिये। मैंने दक्षिण के सभी तीर्थों की यात्रा की है। सभी स्थान, सभी रास्ते, सभी तीर्थ और देवालय मेरे दिखे हुए हैं। मेरे साथ रहने से किसी भी प्रकार का विक्षेप न होगा।’
महाप्रभु ने कुछ बनावटी उदासीनता-सी प्रकट करते हुए व्यंग क साथ कहा- ‘श्रीपाद ! आप मेरे ऊपर वैसे ही कृपा बनाये रखें। आपको साथ लेकर तो मैं यात्रा कर चुका। आपका प्रगाढ़ स्नेह मुझे आगे बढ़ने ही न देगा। आप मुझे जो समझते हैं, वास्तव में वह मैं हूँ नहीं। इसीलिये मेरे और आपके बीच में यह बड़ा भारी मतभेद है। शान्तिपुर से यहाँ आने में ही आपने मुझे तंग कर दिया। मेरे दण्ड को आपने तोड़कर फेंक दिया, मुझे धर्म-भ्रष्ट करने में ही आपको मजा मिलता है, इसलिये आपको साथ ले जाना मेरी शक्ति से बाहर की बात है।’ इतने में दामोदर पण्डित बोल उठे- ‘अच्छा, प्रभो! मैं तो कुछ नहीं कहता! मुझे ही साथ ले चलिये। शेष इन तीनों को लौटा दीजिये।’
प्रभु ने हंसते हुए कहा- ‘गुरु महाराज ! आपकी तो दूर से ही चरणवन्दना करनी चाहिये। अभी तक मैं आपके कठोर नियम वाले स्वभाव से एकदम अपरिचित था। वैसे कहने के लिये तो मैंने संन्यास धारण कर लिया है; किन्तु भगवत-भक्त-प्रेमियों की उपेक्षा मुझसे अब भी नहीं की जाती। उनके प्रेम के पीछे मैं नियम-उपनियमों को अपने-आप ही भूल-सा जाता हूँ। आप इससे समझते हैं कि धर्म-विरुद्ध काम करता हूँ। आप कठोर नियमों के बन्धन में ही मुझे जकड़े रहने का उपदेश किया करते हैं। मुझे शरीर का भी तो होश नहीं रहता’ फिर आपके कर्कश और कठोर नियमों का पालन मैं किस प्रकार कर सकूँगा। इसलिये आप मेरे स्वतन्त्र व्यवहार को देखकर सदा मुझे टोकते रहेंगे- यह मेरे लिये असह्य होगा। इसलिये मैं अकेला ही जाऊँगा।’
धीरे से डरते-डरते जगदानन्द जी ने पूछा- ‘प्रभो! यह तो हम आपकी बातों के ढंग से ही समझ गये कि आप किसी को भी साथ न ले जायँगे किन्तु जब प्रसंग छिड़ ही गया है तो मैं भी जानना चाहता हूँ कि मेरा परित्याग किस दोष के कारण किया जा रहा है?’
प्रभु ने जोरों से हंसते हुए कहा- ‘और किसी का तो ले भी जा सकता हूँ, किन्तु जगदानन्द जी को साथ ले आना तो मैं कभी भी पसंद न करूँगा। जब तक इनकी इच्छा के अनुसार मैं व्यवहार करता रहूँ, तब तक तो ये प्रसन्न रहते हैं, जहाँ इनके मनोभावों में तनिक-सी भी ठेस लगी कि ये फूलकर कुप्पा हो जाते हैं। इनकी मनोवांछा को पूर्ण करना मेरी शक्ति के बाहर की बात है। इनके मनोऽनुकूल बर्ताव करने से तो मैं सन्यास-धर्म का पालन कर ही नहीं सकता। ये मुझे खूब बढ़िया पदार्थ खाते देखकर सुखी होते हैं, मुझे अच्छे वस्त्रों में देखना चाहते हैं। मैं खूब सुन्दर शय्या पर शयन करूँ तब ये प्रसन्न होते हैं। मैं सन्यास-धर्म के विरुद्ध संसारी विषयों का उपभोग कभी कर नहीं सकता। इसलिये इनके साथ से तो अकेला ही अच्छा हूँ।’
इतना कहकर प्रभु मुकुन्द के मुख की ओर देखने लगे।मुकुन्द चुपचाप बैठे थे, उनकी आँखों में लबालब जल भरा हुआ था; किन्तु वह बाहर नहीं निकलता था। प्रभु की ममताभरी चितवन से वह जल अपने-आप ही आँखों की कोरों द्वारा बहने लगा।
प्रभु ने ममत्व प्रदर्शित करते हुए कहा– ‘कहो, तुम भी अपना दोष सुनना चाहते हो?’
महाप्रभु के पूछने पर मुकुन्द चुपचाप ही अश्रु बहाते रहे, उन्होंने प्रभु की बात का कुछ भी उत्तर नहीं दिया। तब नित्यानन्द जी की ओर देखते हुए प्रभु कहने लगे- ‘मुकुन्द का स्वभाव बड़ा ही कोमल है, स्वयं तो ये भारी कष्टसहिष्णु हैं।
क्रमशः
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