cc 213
श्री श्री चैतन्य चरितावली
213-
मुकुंद दूसरों के कष्ट को नहीं देख सकते। विशेषकर मेरे शरीर के कष्ट से तो ये क्षुभित हो उठते हैं। इन्हें मेरे संन्यास के नियमों की कठोरता असह्य मालूम पड़ती है। ये मेरे पैदल भ्रमण, कम वस्त्रों में निर्वाह, त्रिकाल स्नान, भिक्षान्न से उदरपूर्ति और जहाँ स्थान मिल गया वहीं पड़ रहने वाले नियमों से मन-ही-मन दु:खी रहते हैं। यद्यपि ये मुख से कुछ भी नहीं कहते, किन्तु इनके मनोगत भाव मुझसे छिपे नहीं रहते। इनके मानसिक दु:ख से मुझे भी क्लेश होता है। मैं अपने नियमों को छोड़ न सकूँगा, ये अपने कोमल स्वभाव को कठोर बना न सकेंगे, इसलिये इन्हें साथ ले जाना मेरे लिये असम्भव है।’
इन सब बातों को सुनकर नित्यानन्द जी ने कुछ खिन्न मन से कहा- ‘प्रभो ! आपकी इच्छा के विरुद्ध करने की सामर्थ्य ही किसमें है; किन्तु मेरी एक अन्तिम प्रार्थना है, इसके लिये मैं बार-बार चरणों में प्रार्थना करता हूँ कि इसे आप अवश्य स्वीकार करेंगे।’
प्रभु ने अत्यन्त ही ममता प्रदर्शित करते हुए कहा- ‘श्रीपाद ! आप यह कैसी बात कर रहे हैं। आप तो मेरे पूज्यमान और गुरुतुल्य हैं। आपकी आज्ञा का मैं कभी उल्लंघन कर सकता हूँ? आप सूत्रधार हैं, मैं तो आपका नृत्य करने वाला पात्र हूँ, जैसे नाचना चाहेंगे, वैसे ही नाचूँगा। बताइये, क्या कहते हैं?’
नित्यानन्द जी ने अत्यन्त ही करुण स्वर में कहा- ‘आप अकेले ही यात्रा में जायँगे, इससे हमें असह्य दु:ख होगा। हममें से किसी को साथ ले जाना न चाहें तो ये कृष्णदास नामके ब्राह्मण हैं, कटवा के समीप ही इनका जन्मस्थान है। ये स्वभाव के बड़े ही सरल हैं। सेवा करने में बड़े ही प्रवीण हैं। प्रभु के पादपपद्मों में इनका दृढ़ अनुराग हैं। ये साथ में रहकर प्रभु की सब प्रकार सेवा करेंगे। आप जब भावावेश में आकर नृत्य करने लगेंगे तो वस्त्रों को कौन संभालेगा। दोनों हाथों से ताली बजा-बजाकर तो आप रास्ते में कीर्तन करते हुए चलेंगे, फिर जलपात्र, कथरी और लँगोटियों को कौन सँभालेगा? अत: हमारी यही प्रार्थना है कि कृष्णदास को साथ चलने की अवश्य अनुमति प्रदान कर दीजिये।’
नित्यानन्द जी के इस अन्तिम आग्रह को प्रभु टाल न सकें। उन्होंने कृष्णदास को साथ चलने की अनुमति दे दी। इस कारण भक्तों को कुछ-कुछ संतोष हुआ। सभी की इच्छा थी कि प्रभु कुछ काल पुरी में और निवास करें किन्तु उनसे आग्रह करने की किसी में हिम्मत नहीं थी। सभी ने सोचा- ‘यदि सार्वभौम प्रभु के पैर पकड़कर प्रार्थना करेंगे तो अवश्य ही कुछ दिन और रह जायँगे। इसलिये प्रभु को सार्वभौम के समीप ले चलना चाहिये।’ यही सोचकर नित्यानन्द जी ने कहा- ‘प्रभो ! भट्टाचार्य सार्वभौम से भी तो इस सम्बन्ध में परामर्श कर लेनी चाहिये, देखें वे क्या कहते हैं।’ यह सुनकर प्रसन्नता प्रकट करते हुए प्रभु ने कहा- ‘अच्छी बात है, चलिये, सार्वभौम से भी इस सम्बन्ध में पूछ लें।’ इतना कहकर प्रभु भक्तों के सहित सार्वभौम के घर की ओर चले।
दक्षिण यात्रा के प्रस्थान….
प्रभु ने दक्षिण-यात्रा का निश्चय कर लिया है और इस निश्चय में किसी प्रकार का उलट-फेर न होगा, इसी बात को सोचते हुए भक्तवृन्द प्रभु के साथ-साथ सार्वभौम के गृह पर पहुँचे। भक्तों के सहित प्रभु को आते देखकर जल्दी से उठकर भट्टाचार्य ने प्रभु की चरणवन्दना की, सभी भक्तों को प्रेमाभिवादन किया और सभी के बैठने के लिये यथायोग्य आसन देकर धूप, दीप, नैवेद्यादि पूजन की सामग्री से उन्होंने प्रभु की पूजा की।
कुछ समय तक तो भगवत-सम्बन्धी कथा-वार्ता होती रही। अन्त में प्रभु ने कहा- ‘भट्टाचार्य महाशय! मेरे ये धर्मबन्धु मुझे शांतिपुर से यहाँ तक ले आये और इन्हीं की कृपा से मुझे पुरुषोत्तमभगवान के दर्शन हुए। सुनते हैं तीर्थों का फल कहीं कालान्तर में मिलता है, किन्तु मुझे तो जगन्नाथ जी के दर्शनों का फल दर्शन करते ही प्राप्त हो गया। आज-जैसे महानुभावों से प्रेम होना कोटि तीर्थों के फलस्वरुप ही है। आपसे साक्षात्कार होना मैं भगवान पुरुषोत्तम के दर्शनों का ही महाफल समझता हूँ। आपके सत्संग से मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई और मेरा इतना समय खूब आनन्दपूर्वक व्यतीत हुआ। सम्भवतया आपको पता होगा कि मेरे एक ज्येष्ठ भ्राता विश्वररूप 16 वर्ष की ही अवस्था में गृह त्यागकर संन्यासी हो गये थे। ऐसा सुना जाता है कि वे दक्षिण की ओर गये थे। मेरी इच्छा है कि मैं भी उनके चरण-चिह्नों का अनुसरण करके दक्षिण-देश की यात्रा करूँ। इससे एक पन्थ दो काज होंगे। इसी बहाने से दक्षिण के सभी तीर्थों के दर्शन हो जायँगे और सम्भवतया विश्वरूप जी से किसी-न-किसी तीर्थ में भेंट हो जायगी। अब आप मुझे दक्षिण जाने की अनुमति प्रदान कीजिये।’
इनता सुनते ही भट्टाचार्य सार्वभौम तो मर्माहत होकर कटे वृक्ष की भाँति बेहोश होकर भूमि पर गिर पड़े। उनकी दोनों आँखों से अश्रु बहने लगे। कुछ क्षण के पश्चात संभलकर वे बड़े ही करुणस्वर में कहने लगे- ‘प्रभो ! मैं समझता था कि मेरा सौभाग्य सूर्य अब उदय हो गया। अब मैं बड़भागी बन चुका। अब मुझे प्रभु की संगति का निरन्तर प्राप्त होता रहेगा, किंतु हृदय को बेधने वाली इस विचित्र बात को सुनकर तो मेरे दु:ख का पारावर नहीं रहा। अत्यन्त दरिद्रावस्था से जिस प्रकार कोई राजा बन गया हो और थोड़े ही दिनों में उसे राज्यसिंहासन से गिराकर फिर दीन-हीन कंगाल बना दिया जाय। ठीक वही दशा आज मेरी हो गयी है! प्रभो ! आप मुझे छोड़कर कहीं अन्यत्र न जायँ। यदि कहीं जाना ही हो तो मुझे भी साथ लेते चलें! मैं आपके पीछे अपने कुटुम्ब, परिवार तथा पद-प्रतिष्ठा सभी को छोड़ने के लिये तैयार हूँ।’
प्रभु ने सार्वभौम को धैर्य बँधाते हुए कहा- ‘भट्टाचार्य महाशय! जब आप इतने विद्वान और समझदार होकर इस प्रकार की भूली-भूली सी बातें करेंगे तो फिर अन्य लोगों की बात ही क्या है? आप धैर्य धारण करें। मैं शीघ्र ही यात्रा समाप्त करके यहीं लौटकर आ जाऊँगा।’
भट्टाचार्य ने कहा- ‘प्रभो ! आपके लौटने तक क्या हो, इस बात का किसे पता है। यह जीवन क्षणभंगुर है। आप मुझे निराश्रित छोड़कर अकेले न जाइये!’ प्रभु ने प्रेमपूर्वक कहा- ‘ये भक्त मेरी अनुपस्थिति में यहीं रहेंगे। आप सब मिलकर कृष्णकीर्तन करते रहिये। मैं शीघ्र ही लौट आऊँगा।
क्रमशः
Comments
Post a Comment