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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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आप प्रसन्न होकर मुझे अनुमति प्रदान कीजिये।’ कुछ विवशता प्रकट करते हुए शोक के स्वर में भट्टाचार्य ने कहा- ‘आप स्वतन्त्र ईश्वर हैं, आपकी इच्छा के विरुद्ध बर्ताव करने की शक्ति ही किसमें है? आप दक्षिण-देश के तीर्थों की यात्रा करने के निमित्त अवश्य ही जायँगें, किंतु मेरी हार्दिक इच्छा है कि कुछ काल यहाँ और रहकर मेरी सेवा स्वीकार कीजिये।’
भक्तवत्सल गौरांग अपने परमप्रिय कृपापात्र सार्वभौम भट्टाचार्य के इस अनुरोध की उपेक्षा न कर सके। वे पाँच दिनों तक भट्टाचार्य की सेवा को स्वीकार करके पुरी में ही रहे और नित्यप्रति भट्टाचार्य के ही घर उनकी प्रसन्नता के निमित्त भिक्षा करते रहे। भट्टाचार्य की पत्नी भाँति-भाँति के सुस्वादु पदार्थ बना-बनाकर प्रभु को भि़क्षा कराती थीं। इस प्रकार पाँच दिनों तक भट्टाचार्य के घर भिक्षा करके और उनके चित्त को सन्तुष्ट बनाकर प्रभु ने दक्षिण-यात्रा की तैयारियाँ कीं।
प्रात: काल प्रभु भक्तों के सहित उठकर नित्य-कर्म से निवृत हुए। उसी समय अपने दो-चार प्रधान शिष्यों के सहित सार्वभौम भट्टाचार्य प्रभु के स्थान पर आ पहुँचे। प्रभु उन अपने सभी भक्तों के सहित श्रीजगन्नाथ जी के दर्शनों के लिये गये। मन्दिर में जाकर प्रभु ने श्रद्धा-भक्ति के सहित भगवान के चरणों में साष्टांग प्रणाम किया और उनसे दक्षिण-यात्रा की अनुमति माँगी। उसी समय पुजारी ने भगवान की प्रसाद माला और प्रसादान्न लाकर प्रभु को दिया। प्रभु ने इसे ही भगवत-आज्ञा समझकर प्रसाद को शिरोधार्य किया और मन्दिर की प्रदक्षिणा करते हुए प्रभु सभी भक्तों के सहित समुद्र-तट पर पहुँचे। प्रभु भट्टाचार्य से बार-बार लौट जाने का आग्रह कर रहे थे, किंतु भट्टाचार्य लौटते ही नहीं थे। तब तो प्रभु अत्यन्त ही दु: खित होकर वहाँ बैठ गये और सार्वभौम को भाँति-भाँति से समझाने लगे। सार्वभौम चुपचाप बैठे प्रभु की बातें सुन रहे थे।
रोते-रोते भट्टाचार्य ने कहा- ‘प्रभो! आप दक्षिण की ओर तो जा ही रहे हैं। रास्ते में गोदावरी के तटपर विद्यानगर नामकी एक बड़ी राजधानी पड़ेगी। वह राज्य उत्कल-राज्य के ही अन्तगर्त है। वहाँ का राज्यशासन यहीं के राजा रामानन्दराय करते हैं। वे वैसे जाति के तो कायस्थ हैं, किंतु हैं बड़े भगवत-भक्त। उनकी वैष्णवता श्लाघनीय ही नहीं, साधारण लोगों के लिये अनुकरणीय भी है। उन्हें आप अपने दर्शन देकर अवश्य कृतार्थ करते जायँ। सांसारिक विषयी पुरुष समझकर उनकी उपेक्षा न करें।’
प्रभु ने गद्गद कण्ठ से स्नेह के स्वर में कहा- ‘भट्टाचार्य महोदय ! भला, जिनके लिये आपके हृदय में इतना स्थान है, वे महाभाग चाहे चाण्डाल ही क्यों न हों, मेरे वन्दनीय हैं। आपकी जिनके ऊपर इतनी कृपा है, वे अवश्य ही कोई परमभागवत भगवद्भक्त वैष्णव होंगे। मैं उनके दर्शन करके अपने को अवश्य ही कृतार्थ करूँगा। अब आप अपने घर को लौट जायँ।’
लौटने का नाम सुनते ही फिर भट्टाचार्य विकल हो गये, उन्होंने रोते-रोते प्रभु के पैर पकड़ लिये और अपने मस्तक को उनसे रगड़ते हुए कहने लगे- ‘पता नहीं, अब कब इन अरुण चरणों के दर्शन होंगे।’ प्रभु ने दु:खित मन से भट्टाचार्य का आलिंगन किया। प्रभु के कमलनयन भी सजल बने हुए थे। भट्टाचार्य प्रभु का प्रेमालिंगन पाते ही मूर्च्छित हो गये। प्रभु उन्हें ऐसी ही अवस्था में छोड़कर जल्दी से आगे चले गये और भट्टाचार्य दु:खित मन से सर्वस्व गंवाये हुए व्यापारी की भाँति अपने घर लौट आये।इधर प्रभु जल्दी-जल्दी समुद्र के किनारे-किनारे आगे की ओर बढ़ रहे थे, वे भक्तों से बार-बार लौटने का आग्रह कर रहे थे, किन्तु भक्त लौटते ही नहीं थे, इसी प्रकार ‘अब लौटेंगे, अब लौटेंगे’ कहते हुए नित्यानन्द प्रभृति भक्तों के सहित प्रभु अलालनाथ पहुँचे।
अलालनाथ पहुँचने पर बहुत-से लोग प्रभु के दर्शनों के लिये वहाँ आकर एकत्रित हो गये। इतने में ही गोपीनाथाचार्य प्रभु के लिये चार कौपीन, एक काषाय रंग का बहिर्वास (ओढ़ने का वस्त्र) और भगवान् का महाप्रसाद लेकर अलालनाथ में आ पहुँचे। नित्यानन्द जी प्रभु को लोगों से दूर हटाकर समुद्र-किनारे ले गये और वहाँ से स्नान कराकर मन्दिर में ले आये। मन्दिर में आकर भक्तों ने प्रभु को प्रसादान्न का भोजन कराया। प्रभु ने बड़े ही स्नेह के साथ गोपीनाचार्य के लाये हुए महाप्रसादान्न का भोजन किया। प्रभु के भोजन कर लेने के अनन्तर सब भक्तों ने भी भोजन किया और वह रात्रि प्रभु ने वहीं कथा-कीर्तन और भगवत-चिन्तन करते हुए भक्तों के साथ बितायी।
प्रात: काल नित्यकर्म से निवृत्त होकर प्रभु ने आगे चलने का विचार किया। भक्तों से अब प्रभु ने आग्रहपूर्वक लौट जाने के लिये कहा। प्रभु के वियोग का स्मरण करके सभी का हृदय फटने लगा। सभी प्रेम में बेसुध होकर रुदन करने लगे। प्रभु ने उन रोते हुए भक्तों को एक-एक करके आलिंगन किया। सभी मूर्च्छित होकर प्रभु के पैरों में लोटने लगे। प्रभु उन सबको रोते ही छोड़कर आगे को चले गये। पीछे-पीछे कृष्णदास प्रभु के कमण्डलु तथा वस्त्रों को लेकर चल रहे थे। आगे-आगे मत्त गजेन्द्र की भाँति श्रीकृष्ण-प्रेम में छके हुए प्रभु निर्भय भाव से चले जा रहे थे। रास्ते में वे भगवान के इन नामों का कीर्तन करते जाते थे-
कृष्ण ! कृष्ण ! कृष्ण ! कृष्ण ! कृष्ण ! कृष्ण ! कृष्ण ! हे।
कृष्ण ! कृष्ण ! कृष्ण ! कृष्ण ! कृष्ण ! कृष्ण ! कृष्ण ! हे।
कृष्ण ! कृष्ण ! कृष्ण ! कृष्ण ! कृष्ण ! कृष्ण ! रक्ष माम्।
कृष्ण ! कृष्ण ! कृष्ण ! कृष्ण ! कृष्ण ! कृष्ण ! पाहि माम्।
राम राघव ! राम राघव ! राम राघव ! रक्ष माम्।
कृष्ण केशव ! कृष्ण केशव ! कृष्ण केशव ! पाहि माम्।
वासुदेव कुष्ठीका उद्धार…..
जीवन में मस्ती हो, संसारी लोगों के मानापमान की परवा न हो, किसी नियत स्थान में नियत समय पर पहुँचने पर दृढ़ संकल्प न हो और किसी विशेष स्थान में ममत्व न हो; बस, तभी तो यात्रा में मजा मिलता है। ऐसे यात्री का जीवन स्वाभाविक ही तपोमय जीवन होगा और प्राणिमात्र के प्रति उसके हृदय में प्रेम तथा ममता के भाव होंगे। असल में ऐसे ही लोगों की यात्रा सफल यात्रा कही जा सकती है। ऐसे यात्री नरदेहधारी नारायण हैं, उनकी पदधूलि से देश पावन बन जाते हैं। पृथ्वी पवित्र हो जाती है। तीर्थों की कालिमा धुल जाती है और रास्ते के किनारे के नगरवासी स्त्री-पुरुष कृतार्थ हो जाते हैं। माँ वसुन्धरे ! अनेक रत्नों को दबाये रहने से तुझे इतना सुख कभी न मिलता होगा।
क्रमशः
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