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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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जहाँ भी किसी साधु-महात्मा के आगमन का समाचार पाता, वहीं आकर वह उनकी दूर से चरणवन्दना करता। प्रारब्ध-कर्मों से उस परमभागवत वैष्णव के सम्पूर्ण अंग में गलित कुष्ठ हो गया था, इससे उसे तनिक भी क्लेश नहीं होता था। वह उसे प्रारब्ध-कर्मों का भोग समझकर प्रसन्नतापूर्वक सहन करता था। उसके सम्पूर्ण अंगों में घाव हो गये थे और उनमें कीड़े पड़ गये थे। वासुदेव उन कीड़ों को निकालने की कोशिश नहीं करता। यही नहीं किन्तु जो कीड़ा आप-से-आप ही निकलकर पृथ्वी पर गिर पड़ता, उसे उठाकर वह फिर ज्यों-का-त्यों ही अपने शरीर के घावों में रख लेता और पुचकारता हुआ कहता- ‘भैया ! तुम पृथ्वी पर कहाँ जाओगे, किसी के पैरों के नीचे कुचल जाओगे, इसलिये यहीं रहो, यहाँ खाने को भी आहार मिलता रहेगा।’ संसारी लोग उसके इस व्यवहार को देखकर हंसते और उसे पागल बताते, किंतु उसे संसारी लोगों की परवा ही नहीं थी। वह तो अपने प्यारे को प्रसन्न करना चाहता था, संसार यदि बकता है तो उसे बकने दो। उसकी दृष्टि में संसार पागल है और संसार की दृष्टि में वह पागल है।
वासुदेव कुष्ठीका उद्धार…..
उसने प्रात: काल सुना कि ‘कूर्मदेव’ ब्राह्मण के घर में परम तेजस्वी अदभुत रुप-लावण्ययुक्त नूतन अवस्था के एक भगवद्भक्त विरक्त संन्यासी आये हैं, उनके दर्शनमात्र से ही हृदय में पवित्र भावों का संचार होने लगता है और जिह्वा आप-से-आप ही ‘हरिहरि’ पुकारने लगती है।’ इतना सुनते ही वासुदेव उसी समय महाप्रभु के दर्शनों के लिये कूर्म ब्राह्मण के घर दौड़ा आया। वहाँ आकर उसे पता चला कि प्रभु तो थोड़ी ही देर पहले यहाँ से आगे के लिये चले गये हैं। इतना सुनते ही वह कुष्ठी ब्राह्मण भक्त मूर्च्छित होकर भूमि पर गिर पड़ा और करुण स्वर में रुदन करते हुए विलाप करने लगा- ‘हाय ! मैं ऐसा हतभागी निकला कि प्रभु के दर्शनों से वंचित रह गया। हे जगत्पते ! मेरी रक्षा करो! हे अशरणशरण! इस लोकनिन्दित दीन-हीन कंगाल के ऊपर कृपा करके अपने दर्शनों से इस अधम को कृतार्थ करो।हे अन्तर्यामिन ! आप तो घट-घट की जानने वाले हैं। आप ही साधु, संत, भक्त और संन्यासी आदि वेशों से पृथ्वी पर पर्यटन करते हुए संसारी कीचड़ में सने निराश्रित जीवों का उद्धार करते फिरते हैं। भगवन मेरा तो कोई दूसरा आश्रय ही नहीं, कुटुम्ब-परिवार वालों ने मेरा परित्याग कर दिया, समाज में मैं अस्पृश्य समझा जाता हूँ, कोई भी मुझसे बात नहीं करता। बस, केवल आप ही मेरे आश्रयस्थान हैं। मुझे दर्शनों से वंचित रखकर आप आगे क्यों चले गये?’
मानो वासुदेव की करुण-ध्वनि से दूर से ही प्रभु ने सुन ली। वे सहसा रास्ते से ही लौट पड़े और कूर्म के घर आकर रोते हुए वासुदेव को बड़े प्रेम से उन्होंने हृदय से लगा लिया। भय के कारण काँपता हुआ और जोरों से पीछे की ओर हटता हुआ वासुदेव कहने लगा- ‘भगवन ! आप मेरा स्पर्श न करें। मेरे शरीर में गलित कुष्ठ है। नाथ ! आपके सुवर्ण-जैसे सुन्दर शरीरम में यह अपवित्र पीब लग जायगा। प्रभो ! इस पापी का स्पर्श न कीजिये।’
किन्तु प्रभु कब सुनने वाले थे, वे तो भक्तवत्सल हैं। उन्होंने वासुदेव का दृढ़ आलिंगन करते हुए कहा- ‘वासुदेव ! तुम-जैसे भगवद्भक्तों का स्पर्श करके मैं स्वयं अपने को पावन करना चाहता हूँ।’
प्रभु का आलिंगन पाते ही पता नहीं, वासुदेव के सम्पूर्ण शरीर का कुष्ठ कहाँ चला गया, वह बात-की-बात में एकदम स्वस्थ्य हो गया और उसका सम्पूर्ण शरीर सुन्दर सुवर्ण के समान चमकने लगा। प्रभु की ऐसी कृपालुता देखकर आँखों में से प्रेमाश्रु बहाता हुआ गदगद कण्ठ से वासुदेव कहने लगा- ‘प्रभो ! मुझ-जैसे पापी का उद्धार करके आपने अपने पतितपावन नाम को ही सार्थक किया है। पतितों को पावन करना तो आपका विरद ही है। मैं माया-मोह में फंसा हुआ अल्पज्ञ प्राणी आपकी स्तुति कर ही क्या सकता हूँ? आपकी विशद विदावली का बखान करना मनुष्य-शक्ति के बहार की बात है। आप नररूप साक्षात नारायण हैं, आपकी प्रच्छन्नवेषधारी श्रीहरि हैं। आपकी महिमा अपार है, शेषनाग जी सहस्त्र फणों से सृष्टि के अन्त तक भी आपके गुणों का बखान नहीं कर सकते।’ इतना कहते-कहते उसका कण्ठ भर आया, आगे वह कुछ भी नहीं कह सका और मूर्च्छित होकर प्रभु के पैरों के समीप गिर पड़ा। प्रभु ने उसे अपने हाथ से उठाया और भगवन्नाम का उपदेश करते हुए नित्यप्रति कृष्ण-कीर्तन करते रहने की शिक्षा दी। इस प्रकार दोनों ब्राह्मणों को प्रेम से आलिंगन करके प्रभु फिर वहाँ से आगे की ओर चल दिये।
कूर्माचल तीर्थ से चलकर प्रभु नाना ग्रामों में होते हुए ‘जियड़नृसिंह’ नामक तीर्थ में पहुँचे। वहाँ नृसिंह भगवान की स्तुति-प्रार्थना करके बहुत देर तक संकीर्तन करते रहे और पूर्व की ही भाँति रास्ते के सभी लोगों को भगवन्नाम का उपदेश करते हुए महाप्रभु पुण्यतोया गोदावरी नदी के तटपर पहुँचे। उस स्थान की प्राकृतिक छटा देखकर प्रभु का मन नृत्य करने लगा। उन्हें एकदम वृन्दावन का भान होने लगा। वे सोचने लगे-सार्वभौम भट्टाचार्य ने यहीं पर रामानन्द राय से मिलने के लिये कहा था। वे यहाँ के शासनकर्ता राजा हैं। उनसे किस प्रकार भेंट हो सकेगी। यही सोचते-विचारते प्रभु गोदावरी के बिलकुल तटपर पहुँच गये और वहाँ आकर एक स्थान पर बैठ गये।
राजा रामानन्द राय…..
यौवन, धन, सम्पत्ति और प्रभुत्व-इन चारों का नीतिकारों ने अविवेक के संसर्ग से नाश का हेतु बताया है। सचमुच इन चारों का पाकर मनुष्य पागल-सा हो जाता है। धन-मद, जन-मद, तप-मद, विद्या-मद, अधिकार-मद और यौवन-मद आदि अनेक प्रकार के मदों में अधिकार-मद और धन-मद ये ही दो सर्वश्रेष्ठ मद माने गये हैं। जो अधिकार पाकर प्रमाद नहीं करता और धन पाकर जिसे अभिमान नहीं होता, वह साधारण मनुष्य नहीं है। वह तो कोई अलौकिक महापुरुष ही है। ऐसे महापुरुष की चरणवन्दना करने से अक्षय सुख की प्राप्ति हो सकती है। महाभागवत राय रामानन्द जी ऐसे ही वन्दनीय महानुभावों में से थे। राय रामानन्द जी के पिता का नाम राजा भवानन्द जी था।राजा भवानन्द जी जगन्नाथपुरी से तीन कोस दूर अलालनाथ के समीप रहते थे। वे जाति के करणवंशी कायस्थ थे।
क्रमशः
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